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Braj Bhasha Soor-Kosh (Vol-X)

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स्थायी
बहुत दिन तक चलने या बना रहनेवाला।
वि.
(सं. स्थायिन्)

स्थायी
संगीत में किसी गीत का पहला चरण, टेक (दूसरा पद 'अंतरा' होता है)।
संज्ञा
पुं.

स्थायी भाव
वे तत्व या भाव जो मनुष्य के मन में सदा निहित रहते और विशिष्ट कारण से जाग्रत होते हैं और रस-परिपाक में, बिरुद्ध-अविरुद्ध भावों को अपने में समा लेते हुए, अंत तक बने रहते हैं। इनके आधार पर साहित्य में नौ रस माने गये हैं जिनके नाम और उनके स्थायी भाव ये हैं- श्रृंगार रस का स्थायीभाव रति, हास्य का हास, करूण का शोक , रौद्र का क्रोध, वीर का उत्‍साह, भयानक का भय, बीभत्स का घृणा, अदभुत का विस्मय और शांत का निर्वेद।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थाली
हंडी, हँडिया।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थाली
मिट्टी की तश्तरी।
संज्ञा
स्त्री.
(सं.)

स्थालीपुलाक न्याय
(हाँडी में पकते चावलों में से एक देखकर सबकी स्थिति जान लेने की तरह) एक बात देखकर अन्य बातें समझ लेना।
संज्ञा
पुं.
(सं.)

स्थावर
अचल, स्थिर।
वि.
(सं.)
उ.- मुरली अति गर्व काहु बदति नाहिं आजु¨¨¨¨¨¨। स्थावर चर, जंगम जड़ करति जीति जीति-६५३।

स्थावर
जो अपने स्थान से हट ही न सके, 'जंगम' का विरुद-द्यार्थक।
वि.
(सं.)

स्थावर
स्थायी।
वि.
(सं.)

स्थावर
पहाड़, पर्वत।
संज्ञा
पुं.


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