दे० 'श्रीमद्भगवद्गीता'। महाभारत के भीष्मपर्व में यह पायी जाती है। महाभारतयुद्ध के पूर्व अर्जुन का व्यामोह दूर करने के लिए कृष्ण ने इसका उपदेश किया था। इसमें कर्म, उपासना और ज्ञान का समुच्चय है। नीलकण्ठ ने अपनी टीका में इसके विषय में कहा है :
मधुसूदन सरस्वती ने अपनी टीका गीतागूढ़ार्थदीपिका में गीता के उद्देश्य का विशद विवेचन किया है :
सहेतुकस्य संसारस्यात्यन्तोपरमात्मकम्।
परं निःश्रेयसं गीताशास्त्रस्योक्तं प्रयोजनम्।। आदि भगवद्गीता के अतिरिक्त और भी गीताएँ हैं, जैसे भागवतपुराण में गोपीगीता, अध्यात्मरामायण में रामगीता, आश्वमेधिक पर्व में ब्राह्मणगीता, अनुगीता, देवी भागवत में भगवतीगीता आदि।
अनेक आचार्यों ने गीता पर साम्प्रदायिक टीकाएँ तथा भाष्य लिखे हैं। इनमें शांकरभाष्य बहुत प्रसिद्ध है। यह अद्वैतवादी तथा निवृत्तिमार्गी भाष्य है। आधुनिक टीकाकारों तथा निबन्धकारों में लोकमान्य तिलक का 'गीतारहस्य', श्री अरविन्द का 'एसेज ऑन दी गीता' तथा महात्मा गान्धी का 'अनासक्तियोग' उल्लेखनीय हैं।
गीतातात्पर्यनिर्णय
गीता पर स्वामी मध्वाचार्यरचित एक निबन्ध ग्रन्थ। इसमें द्वैतवादी दर्शन तथा कृष्ण भक्ति का प्रतिपादन किया गया है।
गीताधर्म
भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को राजयोग का उपदेश करके भागवत धर्म का पुनरारम्भ किया। इसका तात्पर्य यह है कि गीताधर्म सृष्टि के आरम्भ से चला आ रहा था। बीच में उसका लोप हो जाने पर श्री कृष्ण द्वारा उसका पुनरारम्भ हुआ। गीताधर्म अध्यात्म पर आधारित समुच्चयवादी धर्म था। मनुष्य की मुक्ति का मार्ग त्रिविध माना जाता था-- ज्ञान, कर्म और भक्ति समन्वित। एकान्तवादी सम्प्रदायों ने इन तीन विद्याओं को वैकल्पिक मान लिया। इससे जीवन एकाङ्गी हो गया। भगवान् कृष्ण ने तीनों के समन्वयमार्ग की पुनः प्रतिष्ठा की।
गीताभाष्य
गीताभाष्य ग्रन्थ कई आचार्यों द्वारा रचे गये हैं। वे आचार्य हैं-- शङ्कर, रामानुज, मध्व, केशव काश्मीरी, बलदेव विद्याभूषण आदि। इन भाष्यों में साम्प्रदायिक दर्शन एवं धर्म का प्रतिपादन किया गया है।
गीतार्थसंग्रह
श्रीवैष्णव सम्प्रदाय के यामुनाचार्य द्वारा रचित संस्कृत ग्रन्थ 'गीतार्थसंग्रह' भगवद्गीता की व्याख्या उपस्थित करता है। इसमें विशिष्टाद्वैत दर्शन का प्रतिपादन किया गया है।
गीतार्थसंग्रहरक्षा
आचार्य वेङ्कटनाथ ने तमिल में लगभग 108 ग्रंथों की रचना है। 'गीतार्थसंग्रहरक्ष' उनमें से एक है। इसमें भगवद्भक्ति कूट-कूट कर भरी है। जनता में यह बहुत प्रिय है।
गीतावली
(1) चैतन्य सम्प्रदाय के आचार्यों में सनातन गोस्वामी प्रमुख हैं। उन्हीं की यह पद्यमयी रचना है। श्लोकों में भगवान् कृष्ण का चरित्र वर्णित है।
गीतावली (2)
राम भक्ति सम्बन्धी साहित्यभंडार में गोस्वामी तुलसीदास का प्रमुख योगदान है। गीतावली में तुलसीदास ने रामकथा को गीतों में कहा है। इसके गीत गेय तो हैं ही, साहित्यिक दृष्टि से बड़े उच्चकोटि के हैं।
गीताविवृत
मध्वमतावलम्बी श्री राघवेन्द्र स्वामीकृत एक ग्रन्थ। इसकी भाषा सरल है, रचना 17वीं शताब्दी की है।
गीतासार
भगवान् कृष्ण ने अर्जुन को जो उपदेश किया है वह गरुड पुराण (ध्याय 233) में 'गीतासार' के नाम से प्रसिद्ध है। मोक्ष के लिए समस्त योग, ज्ञान आदि के प्रतिपादक शास्त्रों का सार इसमें संक्षेप से संगृहीत है।