अष्टाध्यायी के सूत्रों में जिन पूर्ववर्ती वैयाकरणों का नाम आया है, गालव उनमें एक हैं। ऋषियों (7.1.74) की सूची में भी गालव की गणना है।
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गिरनार (गिरिनगर)
सौराष्ट्र (पश्चिम भारत) का एक प्रसिद्ध तीर्थ स्थान। प्राचीन काल से यह योगियों और साधकों को आकृष्ट करता रहा है। काठियावाड़ का प्राचीन नगर जूनागढ़ गिरनार की उपत्यका में बसा हुआ है। नगर का एक द्वार गिरनारदरवाजा कलाता है। द्वार के बाहर एक ओर बाधेश्वरी देवी का मन्दिर है। वही वामनेश्वर शिवमन्दिर भी है। यहाँ अशोक का शिलालेख लगा हुआ है। आगे मुचकुन्द महादेव का मन्दिर है। ये स्थान पहाड़ के दातार शिखर के नीचे की ओर हैं। यहाँ पर कई देवालय बने हुए हैं। महाप्रभु वल्लभाचार्य के वंशजों की हवेली (आवास) भी है।
प्राचीन काल में यह पर्वत 'ऊर्जयन्त' अथवा 'उज्जयन्त' कहलाता था (दे० स्कन्दगुप्त का गिरनार अभिलेख)। इस पर्वत की एक पहाड़ी पर दत्तात्रेय की पादुका के चिह्न बने हुए हैं। अशोक के शिलालेख से प्रकट है कि तृतीय शती ई० पू० में यह तीर्थ रूप में प्रसिद्ध हो चुका था। रुद्रदामा के जूनागढ़ अभिलेख के प्रारम्भ में ही इसका उल्लेख है (एपिग्रागिया इण्डिका, जिल्द 8, पृ० 36-42) वस्त्रापथ क्षेत्र का यह केन्द्र माना जाता था (स्कन्दपुराण, 2.2.1-3)। यहाँ सुवर्णरेखा नामक पवित्र नदी बहती है।
गिरि
(1) गिरि अथवा पर्वत हिन्दू धर्म में पूजनीय माने गये हैं। पूजा का आधार धारणशक्ति अथवा गुरुत्व है (गिरति धारयति पृथ्वीं, ग्रिये स्तूयते गुरुत्वाद्वा)। पर्वतों में कुलपर्वत विशेष पूजनीय है :
गिरि (पर्वत) हिमालय अथवा हिमालयाधिष्ठित देवता से जन्मी हुई पार्वती। दे० 'उमा', 'पार्वती'।
गिरितनयाव्रत
इस व्रत का अनुष्ठान भाद्रपद, वैशाख अथवा मार्गशीर्ष शुक्ल तृतीया को होता है। एक वर्ष पर्यन्त इसमें गौरी अथवा ललिता का पूजन होना चाहिए। द्वादश मासों में गौरी के भिन्न भिन्न नामों का स्मरण करते हुए भिन्न-भिन्न पुष्पों से पूजा करनी चाहिए।
गिरिधर
(1) श्रीकृष्ण का एक पर्याय। गोवर्धन पर्वत (गिरि) धारण करने के कारण उनका यह नाम पड़ा।
(2) एक वैष्णव सन्त कवि का नाम भी गिरधर है। मराठा भक्तों ने मानभाऊ लोगों की सर्वदा उपेक्षा की है। मानभाऊ भी मराठी भाषाभाषी एक प्रकार के पाञ्चरात्र वैष्णव हैं। जिन-जिन मराठी लेखकों तथा कवियों की रचनाओं से यह अपेक्षा का भाव परिलक्षित होता है, उनमें गिरिधर, एकनाथ आदि हैं। सम्भवतः अपनी परम्परावादी स्मार्त प्रवृत्तियों के कारण ही ये मानभाऊ सन्तों की उपेक्षा करते थे।
गिरिधरजी
वल्लभाचार्य के पुष्टिमार्गीय साहित्य में 'शुद्धाद्वैतमार्ताण्ड' का विशिष्ट स्थान है। इसके रचयिता गिरिधरजी 1600 ई० के आसपास हुए थे। ये अपने समय में वल्लभीय अनुयायियों के अध्यक्ष थे। नाभाजी एवं तुलसीदास भी इनके समसामयिक थे।
गिरिनगर
दे० गिरनार।
गिरिशिष्यपरम्परा
शङ्कराचार्य के चार प्रधान शिष्यों में से सुरेश्वराचार्य (मण्डन) प्रमुख थे तथा उन चारों के दस शिष्य थे, जो 'दसनामी' के नाम से प्रसिद्ध हैं। ये चार गुरुओं के नाम पर चार मठों में बँटकर रहने लगे। सुरेश्वर के तीन शिष्य--गिरि, पर्वत और सागर ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) के अन्तर्गत थे। इस प्रकार गिरि-शिष्यपरम्परा जोशी मठ में सुरक्षित हैं।
गीतगोविन्द
शृंगार रस प्रधान संस्कृत का गीतकाव्य। इसके रचयिता लक्ष्मणसेन के राजकवि जयदेव थे। इसमें राधा-कृष्ण के विहार का ललित वर्णन है।
राधा का नाम सर्वप्रथम 'गोपालतापिनी उपनिषद्' में आता है। राधापूजक सम्प्रदायों द्वारा यह ग्रन्थ अतिसम्मानित है। जिन सम्प्रदायों में राधा की आराधना होती है उनमें विष्णुस्वामी एवं निम्बार्कों का नाम प्रथम आता है। राधा की पूजा एवं गींतों द्वारा प्रशंसा उत्तर भारत में माध्वकाल के पूर्व प्रचलित थी, क्योंकि जयदेवरचित गीतागोविन्द बारहवीं शती के अन्त की रचना है। बंगाल में जयदेव को निम्बार्क मतावलम्बी कहते हैं, किन्तु गीतगोविन्द की राधा प्रेयसी हैं, पत्नी नहीं जबकि निम्बार्कों के मतानुसार राधा कृष्ण की पत्नी हैं।