वायुपुराण में गयामाहात्म्य का विस्तारपूर्वक वर्णन किया गया है। इसके अन्तिम आठ अध्याय गया माहात्म्य पर ही हैं। यह अलग ग्रन्थ के रूप में भी प्रसिद्ध है, जो वायुपुराण से ही लिया गया है। दे० 'गया'।
गरीबदास
ये महात्मा (1717-82 ई०) छीड़ानी या चुरनी (रोहतक जिला) गाँव में रहते थे। इनके 'गुरुग्रन्थ' में 24000 पंक्तियाँ हैं। इनका सम्प्रदाय आज भी प्रचलित है, किन्तु इनका एक ही मठ है तथा साधारण जनता इनकी शिष्यता या सदस्यता नहीं प्राप्त कर सकती। इनके साधु केवल द्विज ही हो सकते हैं। इनके मतावलम्बियों को गरीबदासी कहते हैं। निर्गुण-निराकार-उपासक यह पंथ भी अनेक पंथों की तरह कबीरपंथ से प्रभावित है।
गरुड
एक पुराकल्पित पक्षी, जिसका आधा शरीर पक्षी और आधा मनुष्य का है। पुराणकथाओं में गरुड़ विष्णु के वाहन के रूप में वर्णित है। विष्णु सूर्य के ही सर्वव्यापी रूप हैं जो अनन्त आकाश का तीव्रता से चक्कर लगाते हैं। इसलिए इनके लिए एक शक्तिमान् और द्रुतगामी वाहन की आवश्यकता थी। विष्णु के वाहन के रूप में गरुड़ की कल्पना इसी का प्रतीक है। इस सम्बन्ध में उल्लेख करना अनुचित न होगा कि स्वयं सूर्य का सारथि अरुण (लालिमा) है, जो गरुड़ का अग्रज है।
पौराणिक कथाओं के अनुसार गरुड़ दक्षकन्या विनता और कश्यप के पुत्र हैं, इसीलिए 'वैनतेय' कहलाते हैं। विनता का अपनी सपत्नी कद्रू से वैर था, जो सर्पों की माता है। अतः गरुड भी सर्पों के शत्रु हैं। गरुड़ जन्म से ही इतने तेजस्वी थे कि देवताओं ने अग्नि समझ कर उनका पूजन प्रारम्भ कर दिया। इनका सिर, पक्ष और चोंच तो पक्षी के हैं और शेष शरीर मानव का। इनका सिर श्वेत, पक्ष लाल और शरीर स्वर्ण वर्ण का है। इनकी पत्नी उन्नति अथवा विनायका है। इनके पुत्र का नाम सम्पाति है। ऐसा कहा जाता है कि अपनी माता विनता को कद्रू की अधीनता से मुक्त करने के लिए गरुड ने देवताओं से अमृत लेकर अपनी विमाता को देने का प्रयत्न किया था। इन्द्र को इसका पता लग गया। दोनों में युद्ध हुआ। इन्द्र को अमृत तो मिल गया, किन्तु युद्ध में उसका वज्र टूट गया। गरुड के अनेक नाम हैं, यथा काश्यपि (पिता से), वैनतेय (माता से), सुपर्ण गरुत्मान् आदि।
गरुडाग्रज
गरुड के बड़े भाई अरुण। महाभारत (1.31. 24--34) में अरुण के गरुडाग्रज होने की कथा दी हुई है।
गरुडोपनिषद्
एक अथर्ववेदीय उपनिषद्। इसमें विष निवारण की धार्मिक विधि है।
गरुड़पञ्चशती
वेदान्ताचार्य वेङ्कटनाथ द्वारा तिरुपाहिन्द्रपुर में रचित यह ग्रन्थ तमिल लिपि में लिखा गया है। इसमें भगवान् विष्णु के मुख्य पार्षद या वाहन गरुड की स्तुति की गयी है। इसमें भगवान् विष्णु के मुख्य पार्षद या वाहन गरुड की स्तुति की गयी है।
गरुडध्वज
विष्णु की ध्वजा में गरुड का चिह्न या आवास रहता है, इससे वे गरुडध्वज कहलाते हैं।
गरुडपुराण
गरुड और विष्णु का संवादरूप पुराण ग्रन्थ। नारदपुराण के पूर्वांश के 108वें अध्याय में गरुडपुराण की विषयसूची दी गयी है। मत्स्यपुराण के अनुसार गरुडपुराण में अठारह हजार श्लोक हैं और रेवामाहात्म्य, श्रीमद्भागवत, नारदपुराण तथा ब्रह्मवैवर्त्तपुराण के अनुसार यह संख्या उन्नीस हजार है। जो गरुडपुराण हिन्दी विश्वकोशकार श्री नगेन्द्रनाथ वसु को उपलब्ध हुआ था, उसकी उन्होंने (पूर्वखण्ड के दो सौ तैंतालीस अध्यायों की और उत्तरखण्ड की पैंतालीस अध्यायों की) सूची दी है। यह सूची नारदीय पुराण के लक्षणों से मिलती है परन्तु श्लोकसंख्या में न्यूनता है।
यह पुराण हिन्दुओं में बहुत लोकप्रिय है, विशेषकर अन्त्येष्टि के सम्बन्ध में इसके एक भाग को पुण्यप्रद समझा जाता है। इस पुराण भाग का श्रवण श्राद्धकर्म का एक अङ्ग माना जाता है। इसमें प्रेतकर्म, प्रेतयोनि, प्रेतश्राद्ध, यमलोक, यमयातना, नरक आदि विशेष रूप से वर्णित हैं।
त्रिवेणीस्तोत्र, पञ्चपर्वमहात्म्य, विष्णुधर्मोत्तर, वेङ्कटगिरिमाहात्म्य, श्रीरङ्गमाहात्म्य, सुन्दरपुरामाहात्म्य इत्यादि अनेक छोटे ग्रन्थ गरुडपुराण से उद्धृत बताये जाते हैं।
गरुडस्तम्भ
श्रीरङ्गम् शैली के विष्णुमन्दिरों में सभामण्डप के बाहर और भगवान् की दृष्टि के सम्मुख एक ऊँचा स्तम्भ बनाया जाता है। नीचे कोणों का उसका वप्र और नसेनी जैसा शिखर होता है। स्तम्भकाष्ठ पर धातु (प्रायः सोने) का पत्र चढ़ा रहता है। इस पर गरुड का आवास माना जाता है। हेलियोडोरस नामक यूनानी क्षत्रप द्वारा ईसापूर्व प्रथम शती में स्थापित बेसनगर का गरुडस्तम्भ इतिहास में बहुत विख्यात है।
गर्ग
एक ऋषि का नाम, जिनका उल्लेख किसी भी संहिता में नहीं पाया जाता किन्तु उनके वंशजों 'गर्गाः प्रावरेयाः' का काठक संहिता में उल्लेख है। कात्यायनसूत्र के भाष्यकार के रूप में गर्ग का नाम उल्लेखनीय है। ज्योतिष साहित्य में इनका महत्त्वपूर्ण स्थान है। आगे चलकर गोत्र ऋषियों में गर्ग की गणना होने लगी।
यादवों के पुरोहित रूप में भी गर्गाचार्य प्रसिद्ध हैं।