वैष्णवसंहिताओं की तालिका में गणेशसंहिता का उल्लेख पाया जाता है, जो गाणपत्य सम्प्रदाय से सम्बन्धित है। गणेशस्तोत्र इसी का एक अंश है, जिसमें गणेश की स्तुतियों का संग्रह है।
गणोद्देशदीपिका
यह चैतन्य सम्प्रदाय के आचार्य रूप गोस्वामी कृत 16वीं शती का एक संस्कृत ग्रन्थ है। इसमें चैतन्य महाप्रभु के साथियों को गोपियों का अवतार कहा गया है।
गण्डकी
हिमालय से प्रवाहित होनेवाली उत्तर भारत की एक प्रसिद्ध नदी। इसका प्राचीन नाम सदानीरा था। दूसरा नाम नारायणी भी है,क्योंकि इसके प्रवाहवेग द्वारा गोलाकार होनेवाले पाषाणखण्डों से नारायण (शालग्राम) निकलते हैं। परवर्ती स्मृतियों के अनुसार,
गण्डक्याश्चैकदेशे च शालग्रामस्थलं स्मृतम्। पाषाणं तद्भवं यत्तत् शालग्राममिति स्मृतम्।।
वराहपुराण (सोमेश्वरादि लिङ्गमहिमा, अविमुक्तक्षेत्र, त्रिवेण्यादिमहिमा नामाध्याय) में शालग्राम-उत्पत्ति का विस्तृत वर्णन पाया जाता है :
[गण्डकी ने दीर्घकाल तक विष्णु की आराधना की, विष्णु ने उसको दर्शन देकर वर माँगने को कहा। गंडकी ने वर माँगा कि आप मेरे गर्भ से पुत्र रूप में उत्पन्न हुआ करें। भगवान् बोले कि शालग्राम शिलारूप में मैं तुमसे उत्पन्न होता रहूँगा; इससे तुम सभी नदियों में पवित्र एवं दर्शन-पान-स्नान से अमित पुण्यदायिनी हो जाओगी।]
गदाधर (भाष्यकार)
गदाधर ने कात्यायनसूत्र (यजुर्वेदीय) तथा पारस्करगृह्यसूत्र (यजु०) पर भाष्य लिखे हैं। पारस्करगृह्यसूत्र वाला गदाधर का भाष्य कर्मकाण्ड पर प्रमाण माना जाता है। भाष्य और निबन्ध का यह मिश्रण है।
गद्यत्रय
आचार्य रामानुजकृत एक ग्रन्थ, जिसकी टीका वेङ्कटनाथ ने लिखी है। इसमें विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त (तत्त्वत्रय, चित्-अचित-ईश्वर) का प्रतिपादन किया गया है।
गन्धव्रत
पूर्णिमा के दिन इस व्रत का आरम्भ होकर एक वर्षपर्यन्त आचरण होता है। पूर्णिमा को उपवास का विधान है। वर्ष की समाप्ति के पश्चात् सुगन्धित पदार्थों से निर्मित देवप्रतिमा किसी ब्राह्मण को दान की जाती है। दे० हेमाद्रि, 2.241।
गन्धर्व
यह अर्धदेव योनि है। स्वर्ग का गायक है। इसकी व्युत्पत्ति है : 'गन्ध' अर्थात् सङ्गीत, वाद्य आदि से उत्पन्न प्रमोद को 'अव' प्राप्त करता है जो। स्तुतिरूप तथा गीतरूप वाक्यों अथवा रश्मियों का धारण करने वाला गन्धर्व है। उसकी विद्या गान्धर्व विद्या वा गान्धर्व उपवेद है। गन्धर्व उन देववर्गों का नाम है जो नाचते, गाते और बजाते हैं। गीत, वाद्य और नृत्य तीनों का आनुषङ्गिक सम्बन्ध है। गाने का अनुसरण वाद्य करता है और वाद्य का नृत्य। साधारणतः लौकिक सङ्गीतशास्त्र के प्रवर्त्तक भरत समझे जाते हैं और दिव्य के भगवान् शङ्कर। परलोक में किन्नर, गन्धर्व आदि सङ्गीतकला का व्यवसाय करने वाले समझे जाते हैं। इनकी गणना शङ्कर के गणों में है।
जटाधर के अनुसार गन्धर्वों के निम्नलिखित भेद हैं :
हाहा हूहूश्चित्ररथो हंसो विश्वावसुस्तथा। गोमायुस्तुम्बुरुर्नन्दिरेवमाद्याश्च ते स्मृताः।।
अग्निपुराण के गणभेद नामक अध्याय में गन्धर्वों के ग्यारह गण अथवा वर्ग बताये गये हैं :
शब्दार्थचिन्तामणि के अनुसार दिव्य और मर्त्य भेद से गन्धर्वों के दो भेद हैं। दिव्य गन्धर्व तो स्वर्ग और आकाश में रहते हैं, मर्त्य गन्धर्व पृथ्वी पर जन्म लेते हैं। दिव्य गन्धर्व का उल्लेख ऋग्वेद (10.139.:5) में मिलता है :
स तमास्थाय भगवान् राजराजो महारथम्। प्रययौ देवगन्धर्वैः स्तूयमानो महाद्युतिः।। मर्त्य गन्धर्व की चर्चा इस प्रकार है :
अस्मिन् कल्पे मनुष्यः सन् पुण्यपाकबिशेषतः। गन्धर्वत्वं समापन्नो मर्त्यगन्धर्व उच्यते।।
स्कन्दपुराण के काशीखण्ड में गन्धर्वलोक का सविस्तर वर्णन है। यह लोक गुह्यकलोक के ऊपर और विद्याधर लोक के नीचे है।
गन्धर्ववेद
शौनिक के चरणव्यूह के अनुसार सामवेद का उपवेद गन्धर्ववेद है। दे० 'उपवेद'। गन्धर्वसम्बन्धित सङ्गीतरूप कला अथवा विद्या जिससे जानी जाय वह गन्धर्ववेद है।
गन्धाष्टक
आठ सुगन्धित पदार्थों का समूह। सभी व्रतों में गन्ध से परिपूर्ण अष्ट द्रव्यों का सम्मिश्रण थोड़ी भिन्नता के साथ पृथक्-पृथक् देवताओं को अर्पित करनी चाहिए। देवताओं में शक्ति, विष्णु, शिव तथा गणेशादि की गणना है। 'शारदातिलक' के अनुसार देवताभेद से गन्धाष्टक निम्नलिखित प्रकार के हैं :
हिन्दुओं के पितरों की श्राद्धभूमि। इसके ऐतिहासिक्, पौराणिक तथा शिल्पकला सम्बन्धी अवशेषों के वर्णन से ग्रन्थों के सैकड़ों पृष्ठ भरे पड़े हैं। किन्तु गया के सम्बन्ध में दिये गये प्राय: सभी मत कुछ न कुछ सीमा तक विवादास्पद हैं। गया के पुरोहित मध्वाचार्य द्वारा स्थापित वैष्णव सम्प्रदाय में आस्था रखते हैं औऱ प्रायः महन्तों का जैसा आचरण करते हैं। कहा जाता है कि गया भगवान् विष्णु का पवित्र स्थल है। परन्तु वनपर्व में यह संकेत है कि गया यम (धर्मराज), ब्रह्मा तथा शिव का भी एक प्रमुख पवित्र स्थान है।
वेदों और पुराणों में 'गया' शब्द विभिन्न स्थलों पर भिन्न-भिन्न रूपों में प्रयुक्त हुआ है। गय नाम ऋग्वेद की कुछ ऋचाओं के रचयिता के लिए प्रयुक्त हुआ है। वेदसंहिताओं में तो यह नाम असुरों और राक्षसों के लिए भी आया है। इनमें गयासुर का नाम उल्लेखनीय है। निरुक्त (12.19) में गयशिर नाम आया है, जिस पर भगवान् विष्णु पाँव रखते थे। महाभारत, विष्णुधर्मसूत्र तथा वामनपुराण (22.20) में गयशिर नाम के स्थल को ब्रह्मा की पूर्वी वेदी माना गया है और बौद्ध ग्रन्थों में भी यह नाम गया के प्रमुख स्थल के लिए आया है। अश्वघोष के बुद्धचरित से प्रकट है कि महात्मा बुद्ध एक राजर्षि के आश्रम (गया) में गये और वहाँ उन्होंने नयरंजना (निरंजना) नदी के तट पर अपना निवासस्थान बनाया। वहाँ यह भी बताया गया है कि बुद्धगया में वे कश्यप ऋषि के उरुबिल्व नामक आश्रम में गये थे, जहाँ उन्हें सम्बोधि की प्राप्ति हुई। विष्णुधर्मसूत्र (85.40) के अनुसार विष्णुपद गया में ही स्थित है। वह श्राद्ध के लिए सबसे पवित्र स्थल है। इसी प्रकार उससे यह भी पता चलता है कि 'समारोहण' नाम का भी कोई स्थल गया में फल्गु नदीं के तट पर स्थित है।
अनुशासनपर्व में अश्मपृष्ठ (प्रेतशिला), निरविन्द पर्वत तथा क्रौञ्चपदी तीनों को गया का पवित्र स्थल माना गया है, किन्तु वनपर्व में इनका उल्लेख नहीं है। फिर भी इनको वनपर्व में वर्णित विष्णुपद, गयशिर तथा समारोहण स्थलों से अतिरिक्त समझना चाहिए। अश्मपृष्ठ में पहली ब्रह्महत्या का अपराधी शुद्ध हो जाता है, निरविन्द पर दूसरी का तथा क्रौञ्चपदी पर तीसरी ब्रह्महत्या का अपराधी भी बिशुद्ध हो जाता है।
डा० कीलहार्न के अनुसार राजकुमार यक्षपाल ने भगवान् मौलादित्य तथा अन्य देवताओं की मूर्तियों कि लेए मन्दिर बनवाये। वहीं एक उत्तरमानस नामक पुष्कर अथवा झील का भी निर्माण कराया। उसने गया के अक्षयवट के पास एक सत्र (भोजनालय) भी बनवाया था। डा० वेणी माधव बरुआ के अनुसार पालशासक नयपाल के अभिलेखों से यह पता चलता है कि उत्तर मानस का निर्माण 1040 ई० के आसपास हुआ था। इस प्रकार अनुमानतः गया का माहात्म्य 11वीं शताब्दी के बाद ही अधिक बढ़ा होगा। किन्तु वायुपुराण (77.108) से लगता है कि उत्तरमानस का निर्माण 8वीं या 9वीं शताब्दी तक अवश्य हो गया होगा। वस्तुतः गया का माहात्म्य कब से बढ़ा यब विवादास्पद प्रश्न है। महाभारत और स्मृतियाँ भिन्न-भिन्न मत मतान्तरों से युक्त हैं। वनपर्व (87) में यह उल्लेख है कि आठ पुत्रों में से यदि कोई एक भी गया जाकर पितृपिण्ड यज्ञ करे तो पितर लोग प्रतिष्ठित और कृतज्ञ होते हैं। उसमें आगे यह भी कहा गया है कि फल्गु नामक पवित्र नदी, गयशिर पर्वत तथा अक्षयवट ऐसे स्थल हैं जहाँ पितरों को पिण्ड दिया जाता है। गया में पूर्वजों या पितरों का श्राद्ध करने से पितृगण प्रसन्न होते हैं। फलतः उस व्यक्ति को भी जीवन में सुख मिलता है। अत्रिस्मृति (55.58) के अनुसार पुत्र अपने पितरों के हित के लिए ही गया जाता है और फल्गु नदी में स्नान करके उनको तर्पण करता है। इस सन्दर्भ में गया के गदाधर (विष्णु) और गयशिर का दर्शन उसके लिए आवश्यक है। लिखितस्मृति के अनुसार यदि कोई भी किसी व्यक्ति के नाम से गयशिर में पिण्डदान करे तो नरक में स्थित व्यक्ति स्वर्ग को और स्वर्गस्थित व्यक्ति मोक्ष प्राप्त करता है। कूर्मपुराण में युक्ति तो यह है कि मनुष्य को कई संतानों की कामना करनी चाहिए जिससे उनमें से यदि कोई एक भी गया जाकर श्राद्ध करे तो पितरों को मुक्ति मिल जायेगी और वह स्वयं मोक्ष को प्राप्त होगा। मत्स्यपुराण (22.4.6) में गया को पितृतीर्थ कहा गया है।