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Hindu Dharmakosh (Hindi-Hindi)

गणपति-उपासना
महाभारत, अनुशासन पर्व के 151 वें अध्याय में गणेश्वरों और विनायकों का स्तुति से प्रसन्न हो जाना और पातकों से रक्षा करना वर्णित है। इस नाते गजानन एवं षडानन दोनों गणाधीश हैं और भगवान् शंकर के पुत्र हैं। परन्तु गजानन तो परात्पर ब्रह्म के अवतार माने जाते हैं औऱ परात्पर ब्रह्म का नाम `महागणाधिपति` कहा गया है। भाव यह है कि महागुणाधिपति ने ही अपनी इच्छा से अनन्त विश्व और प्रत्येक विश्व में अनन्त ब्रह्माण्डों की रचना की और प्रत्येक ब्रह्माण्ड में अपने अंश से त्रिमूर्तियाँ प्रकट कीं। इसी दृष्टि से सभा सम्प्रदायों के हिन्दुओं में सभी मंगल कार्यों के आरम्भ में गौरी-गणेश की पूजा सबसे पहले होती है। यात्रा के आरम्भ में गौरी-गणेश का स्मरण किया जाता है। पुस्तक, पत्र बही आदि किसी भी लेख के आरम्भ में पहले `श्री गणेशाय नमः` लिखने की पुरानी प्रथा चली आती है। महाराष्ट्र में गणपतिपूजा भाद्र शुक्ल चतुर्थी को बड़े समारोह से हुआ करती है और गणेशचतुर्थी के व्रत तो सारे भारत में मान्य हैं। गणपति विनायक के मन्दिर भी भारतव्यापी हैं और गणेशजी आदि अनादि देव माने जाते हैं। इन्हीं के नाम से गाणपत्य सम्प्रदाय प्रचलित हुआ।

गणपतिकुमारसम्प्रदाय
शङ्करदिग्विजय' में आनन्दगिरि औऱ धनपति ने गाणपत्य सम्प्रदाय की छः शाखाओं का वर्णन किया है। इनमें एक शाखा 'गणपतिकुमारसम्प्रदाय' है। इस सम्प्रदाय वाले हरिद्रा-गणपति को पूजते हैं। वे भी अपने उपास्य देव को परब्रह्म परमात्मा कहते हैं और ऋग्वेद के दूसरे मण्डल के 23 वें सूक्त को प्रमाण मानते हैं। दे० 'गणपति'।

गणपतिचतुर्थी
भविष्यपुराण के अनुसार प्रत्येक चतुर्थी का व्रत गणपतिचतुर्थीव्रत कहलाता है। जब गणेश की पूजा भाद्र शुक्ल चतुर्थी को होती है तो इस तिथि को शिवाचतुर्थी, यदि माघ शुक्ल चतुर्थी को हो तो शान्ता चतुर्थी और यदि शुक्ल चतुर्थी को मंगल का दिन पड़े तो उसे सुखा चतुर्थी कहते थे। आजकल यह पूजा डेढ़ दिन, पाँच दिन, सात दिन अथवा अनन्तचतुर्दशी तक चलती है। अन्तिम दिन मूर्ति कूप, तालाब, नदी अथवा समुद्र में गाजे-बाजे के साथ विसर्जित की जाती है।
दो मास की चतुर्थियों के दिनों में व्रती को निराहार रहने का विधान है। उस दिन ब्राह्मण को तिल से बने पदार्थ खिलाने चाहिए। वही पदार्थ रात्रि में स्वयं भी खाने चाहिए। दे० हेमाद्रि, 1.519-520।

गणपतितापनीयोपनिषद्
नृसिंहतापनीयोपनिषद् की बहुग्राहकता वा प्रचार देख अन्य सम्प्रदायों ने भी इसी ढंग के उपनिषद्ग्रन्थ प्रस्तुत किये। राम, गणपति, गोपाल, त्रिपुरा आदि तापनीय उपनिषदें प्रस्तुत हुईँ। गणपतितापनीयोपनिषद् में गाणपत्य मत के दर्शन का विवेचन किया गया है।

गणेश उत्सव
महाराष्ट्र प्रदेश में यह उत्सव उसी उल्लास से मनाया जाता है जैसे बंगाल में दुर्गोत्सव, उड़ीसा में रथयात्रा तथा द्रविड देश में पोंगल मास। मध्ययुग में मराठा शक्ति के उदय के साथ गणेशपूजन का महत्त्व बढ़ा। उस समय गणेश (जननायक) की विशेष आवश्यकता थी। गणेश उसके धार्मिक प्रतीक थे। आधुनिक युग में लोकमान्य बालगंगाधर तिलक ने इस उत्‍सव का पुरुद्धार किया। इसमें लगभग एक सप्ताह का कार्यक्रम बनता है। इसमें पूजन, कथा, व्याख्यान, मनोरञ्जन आदि का आयोजन किया जाता है। यह उत्सव बड़े सांस्कृतिक एवं राष्ट्रीय महत्त्व का है।

गणेश उपपुराण
गाणपत्य सम्प्रदाय का उपपुराण। इसमें भगवान् गणपति की अनेक कथाएँ दी गयी हैं।

गणेशकुण्ड
करवी स्टेशन से चित्रकूट जाते समय मार्ग में करवी संस्कृत पाठशाला मिलती है। यहाँ से लगभग ढाई मील दक्षिण-पूर्व पगडण्डी के रास्ते जाने पर गणेशकुण्ड नामक सरोवर तथा प्राचीन मन्दिर मिलते हैं। अब ये सरोवर तथा मन्दिर जीर्ण दशा में अरक्षित हैं।

गणेशखण्ड
ब्रह्मवैवर्तपुराण के चार खण्डों--ब्रह्मखण्ड, प्रकृतिखण्ड, गणेशखण्ड और कृष्णजन्मखण्ड में से एक। गणेशखण्ड में गणेश के जन्म, कर्म तथा चरित का विस्तृत वर्णन है। इसमें गणेश कृष्ण के अवतार के रूप में वर्णित हैं।

गणेशचतुर्थीव्रत
भाद्र शुक्ल चतुर्थी को इस व्रत का प्रारम्भ होता है। एक वर्षपर्यन्त इसका आचरण होना चाहिए। इसमें गणेशपूजन का विधान है। हेमाद्रि, 1.510 के अनुसार चतुर्थी के दिन गणेशपूजन का विधान वैश्वानरप्रतिपदा की तरह ही होना चाहिए। दे० 'गणपतिचतुर्थी'।

गणेशयामलतन्त्र
कुलचूडामणितनत्र में उद्धृत 64 तन्त्रों की सूची में आठ यामल तन्त्र सम्मिलित हैं। 'यामल' शब्द यमल (युग्म) से गठित है तथा विशेष देवता तथा उसकी शक्ति के ऐव्य का सूचक है। गणेशयामलतन्त्र उन आठों में से एक है।


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