आश्विन कृष्ण त्रयोदशी को यदि मघा नक्षत्र हो तथा सूर्य हस्त नक्षत्र पर हो तो इस व्रत का अनुष्ठान होता है। यह श्राद्ध का समय है। शातातप (हेमाद्रि, काल पर चतुर्वर्गचिन्तामणि) के अनुसार यदि इस अमावस को सूर्यग्रहण हो तो उसका गजच्छाया कहते हैं। इस समय का श्राद्ध अक्षय होता है।
गजनीराजनाविधि
आश्विन पूर्णिमा के दिन मध्याह्नोत्तर काल में गजों (हाथियों) के सामने लहरों में जलते हुए दीपकों को आवर्तित करने को गजनीराजनाविधि कहते हैं। यह राजाओं के लिए मांगलिक कृत्य माना जाता है।
गजपूजाविधि
आश्विन पूर्णिमा के दिन सुख-समृद्धि के अभिलाषियों के लिए इस व्रत का विधान है। दे० हेमाद्रि, 2.222-25। इसमें गज की पूजा होती है।
गजानन
गणेश का पर्याय। गणेश गजानन कैसे हुए यह कथा ब्रह्मवैवर्त (गणेशखण्ड, अध्याय 6) तथा स्कन्दपुराण (गणेशखण्ड, अध्याय 11) में विभिन्न रूपों में कही गयी है। ब्रह्मवैवर्त में कहा गया है :
[शनिदेव की दृष्टि पड़ने से गणेशजी का मस्तक कट गया, तब हाथी का मस्तक लगा देने पर वे गजानन कहे गयो। भाग्य प्रबल है।] दे० 'गणेश'।
गजायुर्वेद
आयुर्वेद का यह एक पशुचिकित्सीय विभाग है। गाय, हाथी, घोड़े आदि पशुओं के सम्बन्ध में आयुर्वेद ग्रन्थ अवश्य रहे होंगे, क्योंकि अग्निपुराण (281-291 अध्याय तक) में इन विविध आयुर्वेंदों की चर्चा की गयी है। गजायुर्वेद में गज (हाथी) के प्रकार तथा तत्सम्बन्धी चिकित्सा का विस्तृत विधान है। 'शालोत्र' भी पशु चिकित्सा का प्रमुख ग्रन्थ है।
गढ़मुक्तेश्वर
मेरठ से 26 मील दक्षिण-पूर्व गङ्गा के दाहिने तट पर यह नगर है। यहाँ तक मोटर बसें जाती हैं। प्राचीन काल में विस्तृत हस्तिनापुर नगर का यह एक खण्ड था। यहाँ मुक्तेश्वर शिव का मन्दिर है। कई अन्य प्राचीन मन्दिर भी हैं। कार्तिक पूर्णिमा को यहाँ विशाल मेला लगता है।
गण
गण का अर्थ 'समूह' है। रुद्र के अनुचरों को भी गण कहा गया है। कुछ देवता गण (समुदाय) रूप में प्रसिद्ध हैं :
मरुतों के गण, इन्द्र और रुद्र दोनों के सैनिक हैं। ज्योतिषरत्नमाला में अश्विनी आदि जन्मनक्षत्रों के अनुसार, देव मानुष और राक्षस तीन गण माने गये हैं।
गणगौरीव्रत
चैत्र शुक्ल तृतीया को विशेष रूप से सधवा स्त्रियों के लिए गौरीपूजन का विधान है। कुछ लोग इसे गिरिगौरीव्रत कहते हैं। दे० अहल्याकामधेनु, पत्रात्मक 257। भारत के मध्य भाग, राजस्थान आदि में यह बहुत प्रचलित है।
गणपति (गणेश)
गणपति का प्रथम उल्लेख ऋग्वेद (2.23.1) में मिलता है :
शुक्ल यजुर्वेद के अश्वमेधाध्याय में भी गणपति शब्द आया है। ऐसा लगता है कि प्रारम्भिक गणराज्यों के गणपतियों के सम्बन्ध में जो भावना थी उसी के आधार पर देवमण्डल के गणपति की कल्पना की गयी। परन्तु यह शब्द देवताओं के एक विरुद के रूप में प्रयुक्त हुआ है, स्वतन्त्र देवता के रूप में नहीं। किन्तु रुद्र (वैदिक शिव) के गणों से गणपति का सम्बन्ध स्वतन्त्र देवता रूप में ही है।
पुराणों में रुद्र के मरुत् आदि असंख्य गण प्रसिद्ध हैं। इनके नायक अथवा पति को विनायक या गणपति कहते हैं। समस्त देवमण्डल के नायक भी गणपति ही हैं, यद्यपि शिवपरिवार से इनका सम्बन्ध बना हुआ है। डॉ० सम्पूर्णानन्द ने अपने ग्रन्थों-'गणेश' तथा 'हिन्दू देवपरिवार का विकास' में गणेश को आर्येतर देवता माना है, जिसका क्रमशः प्रवेश और आदर हिन्दू देवमण्डल में हो गया। बहुतेरे लोगों का कहना है कि हिन्दू लघु देवमण्डल, अर्धदेवयोनि तथा भूत-पिशाच परिवार में बहुत से आर्येतर तत्त्व मिलते हैं। परन्तु गणपति अथवा गणेश में आर्येतर तत्त्व ढूढ़ना कल्पना मात्र है। गणपति का सम्बन्ध प्रारम्भ से ही आर्य गणों, रुद्रगण तथा शिवपरिवार से है। उनकों विघ्नकारी और भयंकर गुण ऋक्थ में रुद्र से मिले हैं तथा सिद्धिकारी और माङ्गलिक गुण शिव से।
पुराणों में रूपकों की भरमार है इसलिए गणपति की उत्पत्ति और उनके विविध गुणों का आश्चर्यजनक रूपकों में अतिरंजित वर्णन है। अधिकांश कथाएँ ब्रह्मवैवर्तपुराण में पायी जाती हैं। गणपति कहीं शिव-पार्वती के पुत्र माने गये हैं और कहीं केवल पार्वती के ही। इनके विग्रह की कल्पना भी विचित्र है। इनका रक्त रंग अथवा मोटा शरीर और लम्बा उदर है। इनके चार हाथ और हाथी का सिर है, जिसमें एक ही दाँत हैं, इनके एक हाथ में शंख, दूसरे में चक्र, तीसरे में गदा अथवा अकुंश तथा चौथे में कुमुदिनी है। इनकी सवारी मूषक है।
गणेश के गजानन और एकदन्त होने के सम्बन्ध में पुराणों में अनेक कथाएँ दी हुई हैं। दे० 'गजानन'। एक कथा के अनुसार पार्वती को अपने शिशु गणेश पर बड़ा गर्व था। उन्होंने शनिग्रह से उसको देखने को कहा। शनि की दृष्टि पड़ते ही गणेश का सिर जलकर भस्म हो गया। पार्वती बहुत दुखी हुई। ब्रह्मा ने उनसे कहा कि जो भी प्रथम सिर मिंले उसको गणेश के ऊपर रख दिया जाय। पार्वती को सबसे पहले हाथी का ही सिर मिला, जिसको उन्होंने गणेश के ऊपर रख दिया। इस प्रकार गणेश गजानन हो गये। दूसरी कथा के अनुसार एक बार पार्वती स्नान करने गयीं और गणेश को दरवाजे पर बैठा गयीं। शिव आकर पार्वती के भवन में प्रवेश करना चाहते थे। गणेश ने रोका। शिव ने क्रोध में आकर गणेश का सिर काट दिया, परन्तु पार्वती को सन्तुष्ट करने के लिए हाथी का सिर लाकर गणेश के शरीर में जोड़ दिया। तीसरी कथा के अनुसार पार्वती ने स्वयं अपनी कल्पना से गणेश का सिर हाथी का बनाया। एकदन्त होने की कथा इस प्रकार है कि एक बार परशुराम कैलास में शिवजी से मिलने गये। पहरे पर बैठे गणेश ने उनको रोका दोनों में युद्ध हुआ। परशुराम के परशु (फर्से) से गणेश का एक दाँत टूट गया। ये सब कथाएँ काल्पनिक हैं। इनका प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि गणपति का सिर हाथी के समान बड़ा होना चाहिए जो बुद्धिमानी और गम्भीरता का द्योतक है। इनके आयुध भी दण्डनायक के प्रतीक हैं। गणपति विघ्ननाशक, मंगल और ऋद्धि-सिद्धि के देने वाले, विद्या और बुद्धि के आगार हैं। प्रत्येक मङ्गलकार्य के प्रारम्भ में इनका आवाहन किया जाता है। प्रत्येक शिव मन्दिर में गणेश की मूर्ति पायी जाती है। गणेश के स्वतन्त्र मन्दिर दक्षिण में अधिक पाये जाते हैं। गणपति की पूजा का विस्तृत विधान है। इनकों मोदक (लड्डू) विशेष प्रिय है। गणेश की मूर्ति का ध्यान निम्नांकित है :
वन्दे शैलसुतासुतं गणपतिं सिद्धिप्रदं कामदम।। तन्त्रसार में एक दूसरा ध्यान वर्णित है :
सिन्दूराभं त्रिनेत्रं पृथुतरजठरं हस्तपद्मैर्दधानं, दन्तं पाशाङ्कुशेष्टान्युरुकरविलसद्बीजपूराभिरामम्। बालेन्दुद्योतिमौलिं करिपतिवदनं दानपूरार्द्रगण्डम्, भोगीन्द्राबद्धभूषं भजत गणपतिं रक्तवस्त्राङ्गरागम्।। पूजापद्धति में गणपति नमस्कार की विधि इस प्रकार है:
राघवभट्ट कृत शारदातिलक की टीका के अनुसार इकावन (51) गणपति और उतनी ही उनकी शक्तियाँ हैं।
गणपति उपनिषद्
गाणपत्य साहित्य का उदय गणपतिपूजा से होता है। गणपति तापनीय उपनिषद् एवं गणपति उपनिषद् में गाणपत्य धर्म वा दर्शन प्राप्त होता है। गणपति उपनिषद् अथर्वशिरस् का ही एक भाग है। इसका अंग्रेजी अनुवाद केनेडी ने प्रस्तुत किया है।