अग्नि के द्वारा खाण्डववन जलाने की कथा महाभारत की मुख्य कथा से सन्बन्धित है। राजा श्वेतकि के द्वादश वर्षीय यज्ञ में अग्नि ने घृत का बड़ी मात्रा में भोजन किया और इससे उनको अजीर्ण रोग हो गया। पश्चात् दूसरे यजमानों की यज्ञवस्तुओं के भक्षण हो गये तथा इस सम्बन्ध में उन्होंने ब्रह्मा से पार्थना की। ब्रह्मा ने अग्नि को खाण्डव वन जलाकर उसके ऐसे जन्तुओं का भक्षण करने की अनुमति दी, जो देवों को कष्ट पहुँचाते थे। अग्नि ने ब्राह्मण का वेष धारण कर अर्जुन एवं कृष्ण के पास जाकर खाण्डव वन को जलाने में सहायता माँगी, क्योंकि खाण्डव वन इन्द्र द्वारा सुरक्षित था। कृष्ण और अर्जुन ने होकर वन के दो सिरों पर खड़े पशुओं को वन से भागने से रोकते हुए इन्द्र को अग्नि के कार्य में बाधा देने से रोकने का कार्य सँभाला। इस प्रकार सारा वन जल गया। अग्नि पन्द्रह दिन तक प्रज्वलित रहा। कहा गया है कि अग्नि ने इसे एक बार और जलाया था। यह पौराणिक कथा प्रतीत होती है। इसके पीछे यह अर्थ स्पष्ट है कि पाण्डवों ने इस वन को जलाकर 'खाण्डवप्रस्थ' (इन्द्रप्रस्थ) नाम की अपनी राजधानी बसायी।
खशा
दक्ष की कन्या और कश्यप की एक पत्नी। गरुडपुराण (अध्याय 6) में इसका उल्लेख है :
सिक्ख धर्म की एक शाखा 'खालसा' (शुद्ध) कहलाती है। गुरु गोविन्दसिंह ने देखा कि उन्हें मुगलों से अवश्य लड़ना पड़ेगा। इस कारण उन्होंने एक ऐसा सैनिक दल तैयार किया, जिसको धार्मिक आधार प्राप्त हो। उन्होंने अपने सैनिकों को 'खड्ग दी पहुल' (खड्ग संस्कार) तथा अन्य अनेक प्रतिज्ञाओं के पालन करने के लिए तैयार किया। इन प्रतिज्ञाओं में पाँच वस्तुओं (केश, कच्छा, कृपाण, कड़ा तथा कंघा) का धारण, नियमित ईश्वराराधना, एक साथ भोजन करना तथा मूर्तिपूजा, तीर्थयात्रा, सती होने, शिशुवध, तम्बाकू एवं मादक द्रव्यों के सेवन से दूर रहने की प्रतिज्ञाएँ थीं। हर एक की उपाधि 'सिंह' रखी गयी। इनमें जातिभेद न रहा और इस प्रकार ये खालसा (शुद्ध) कहलाये।
खिलपर्व
उन्तीस उपपुराणों के अतिरिक्त महाभारत का खिलपर्व, जिसे हरिवंश भी कहते हैं, उपपुराणों में गिना जाता है। इसमें विष्णु भगवान् के चरित्र का कीर्तन है और विशेष रूप से कृष्णावतार की कथा है।
खेचर
(आकाश में चलने वाले) विद्याधर। इन्हें कामरूपी भी कहते हैं, अर्थात् ये जैसा रूप चाहें धारण कर सकते हैं। ऐसा विश्वास किया जाता है कि आकाश में विचरण करने वाली यक्ष, गन्धर्व आदि कई देवयोनियाँ हैं, उन्हीं में विद्याधर भी हैं। पक्षी और नक्षत्र भी खेचर कहलाते हैं।
खेचरी
आकाशचारिणी, देवी। आकाश में चलने की एक सिद्धि, जो योगियों को प्राप्त होती है; हठयोग की एक मुद्रा (शारीरिक स्थिति), जिसमें जीभ को उलटकर तालुमूल में लगाते हैं। इसकी पहेली प्रसिद्ध है:
महात्मा दादूदयाल (दादूपन्थ चलाने वाले) के एक शिष्य कवि खेमदास थे। इनके रचे हुए भजन या पद जनता में खूब प्रचलित हैं।
ख्याति
दार्शनिक सिद्धान्तवाद, यथा अनिर्वचनीय ख्याति, असत्ख्याति, सत्ख्याति आदि। सांख्यदर्शन के अनुसार अन्तिम ज्ञानरूपा वृत्ति। इस मत में तीन प्रकार के तत्त्व हैं-- (1) व्यक्त (2) अव्यक्त और ज्ञ। मूल प्रकृति को व्यक्त कहा जाता है। मूल प्रकृति के परिणाम को व्यक्त कहा जाता है। इसके तेईस भेद हैं जो कार्य-कारण परम्परा से परिणत होते हैं। ज्ञ चेतन है। सांख्यसिद्धान्त में ये पचीस तत्त्व अथवा प्रमेय हैं। इन्हीं तत्त्वों के सम्यक् ज्ञान अर्थात् प्रकृति-पुरुष के पार्थक्य के बोध से दुःख की निवृत्ति होती है। सांख्यकारिका (2) में कथन है :
व्यक्ताव्यक्त-ज्ञ-विज्ञानात्।'
[व्यक्त, अव्यक्त और ज्ञ के विज्ञान से दुःख निवृत्ति।] इस ज्ञान को ही ख्याति कहते हैं। परन्तु यह भी एक प्रकार की चित्तवृत्ति (अक्लिष्टा) का परिणाम है। रज और तम से रहित सत्त्वगुणप्रधान प्रशान्तवाहिनी प्रज्ञा ख्याति है। इसमें वृत्तिसंस्कार का चक्र बना रहता है। चित्तनिरोध की अवस्था में यह संस्काररूप से चलता रहता है। अभ्यास के द्वारा संस्कारों का भी क्षय होकर विदेह कैवल्य प्राप्त होता है, जिसमें ख्याति भी निवृत्ति हो जाती है। दे० शिशुपालवध (4.55)।
ग
व्यञ्जनों के कवर्ग का तृतीय वर्ण। कामधेनुतन्त्र में इसके स्वरूप का वर्णन इस प्रकार है :
[ हे परमेश्वरी देवी! ग वर्ण सदा पञ्चदेवात्मक है। तीन गुणों से संयुक्त होते हुए भी सदा निर्गुण, निरीह और निर्मल है। यह वर्ण पञ्च प्राणों से युक्त और सभी शक्तियों से संपन्न है। लालवर्ण सूर्य के समान शोभा वाले कुण्डलिनीशक्ति स्वरूप इस वर्ण को प्रणाम करता हूँ।]
वर्णोद्धारतन्त्र के अनुसार इसके ध्यान की विधि इस प्रकार है :