यह स्नान मध्य प्रदेश में छतरपुर के पास स्थित है। प्राचीन काल में चन्देल राजाओं की यहाँ राजधानी थी। अपने समय में यह तीर्थस्थल था। आर्य शैली (नागर शैली) के मन्दिरों में भारतीय वास्तुकला का सुन्दरतम विकास खजुराहो के मन्दिरों में पाया जाता है। इनका निर्माण चन्देल राजाओं के संरक्षण में 950 ई० से 1050 ई० के मध्य हुआ, जो संख्या में लगभग 30 हैं तथा वैष्णव, शैव और जैन मतों से सम्बन्धित हैं। प्रत्येक मन्दिर लगभग एक वर्गमील के क्षेत्रफल में स्थित है। कन्दरीय महादेव का मन्दिर इस समुदाय में सर्वश्रेष्ठ है। मन्दिरों में गर्भगृह, मण्डप, अर्द्धमण्डप, अन्तराल एवं महामण्डप पाये जाते हैं। गर्भगृह के चतुर्दिक् प्रदक्षिणापथ भी है। वैष्णव तथा शैव मन्दिरों की बाहरी दीवारों पर मिथुन मूर्तियों का अङ्कन प्रचुर मात्रा में पाया जाता है, जो शिव-शक्ति के ऐक्य अथवा शिव-शक्ति के योग से सृष्टि की उत्पत्ति का प्रतीक है। यहाँ पर चौंसठ योगिनियों का एक मन्दिर भी था जो अब भग्नावस्था में है।
अध्यात्म उपदेश सम्बन्धी संस्कृत नाटक 'प्रबोधचन्द्रोदय' की रचना कृष्णमिश्र नामक एक ज्ञानी पंडित द्वारा यहीं पर 1065 ईं० में सम्पन्न हुई, जो कीर्तिवर्मा नामक चन्देल राजा की सभा में अभिनीत हुआ था। इस नाटक से तत्कालीन धार्मिक एवं दार्शनिक सम्प्रदायों पर प्रकाश पड़ता है। दे० 'प्रबोधचन्द्रोदय' तथा 'कृष्णमिश्र'।
खट्वाङ्ग
शिव का विशेष शस्त्र। इसकी आकृति खट्वा (चारपाई) के अङ्ग (पाये) के समान होती थी। यह दुर्लङ्गय और अमोघ होत है। महिम्नस्तोत्र में वर्णन है :
वैशाख शुक्ल सप्तमी को गङ्गासप्तमी कहते हैं। इस व्रत में गंगापूजन होता है। कहा जाता है कि जह्नु ऋषि क्रोध में आकर गङ्गाजी को पी गये थे तथा इसी दिन उन्होंने अपने दाहिने कान से गङ्गाजी को बाहर निकाला था।
खण्डदेव
प्रसिद्ध मीमांसक विद्वान्। पूर्वमीमांसा के दार्शनिक ग्रन्थों में खण्डदेव (मृत्युकाल 1665 ई०) द्वारा रचित 'भट्टदीपिका' का बहुत सम्मानित स्थान है। इसकी प्रसिद्धि का मुख्य कारण इसकी तार्किकता है। यह ग्रन्थ कुमारिल भट्ट के सिद्धान्तों का पोषक है।
खदिर
यज्ञोपयोगी पवित्र वृक्ष। इसका यज्ञयूप (यज्ञस्तम्भ) बनता है। इसकी शाखाओं में छोटे-छोटे चने जैसे काँटे भरे रहते हैं और लकड़ी दृढ़ होती है। इसमें से कत्था भी निकलता है।
खण्डनकुठार
अद्वैत वेदान्तमत के उद्भट लेखक वाचस्पति मिश्र द्वारा रचित एक ग्रन्थ। वेदान्तब्रह्म सिद्धान्तों की इसमें तीव्र आलोचना की गयी है।
खण्डनखण्डखाद्य
वेदान्त का एक प्रसिद्ध ग्रन्थ। पण्डित रत्न श्रीहर्ष कृत 'खण्डनखण्डखाद्य' का अन्य नाम 'अनिर्वचनीयतासर्वस्व' है। शङ्कराचार्य का मायावाद अनिर्वचनीय ख्याति के ऊपर ही अवलम्बित है। उनके सिद्धान्तानुसार कार्य और कारण भिन्न, अभिन्न अथवा भिन्नाभिन्न भी नहीं हैं, अपितु अनिर्वचनीय हैं। इस अनिर्वचनीयता के आधार पर ही कारण सत् है और कार्य मायामात्र है। श्रीहर्ष के खण्डनखण्डखाद्य में सब प्रकार के विपक्षों का बड़ी तीक्ष्णता के साथ खण्डन किया गया है तथा उनके सिद्धान्त का ही नहीं अपितु जिनके द्वारा वे सिद्ध होते हैं उन प्रत्यक्षादि प्रमाणों का भी खण्डन कर अद्वितीय, अप्रमेय एवं अखण्ड वस्तु की स्थापना की गयी है।
ग्रन्थ का शब्दार्थ है : 'खण्डनरूपी खाँड की मिठाई'।
खाकी साधु
दादूपन्थी साधुओं की पाँच श्रेणियाँ हैं। उनमें खाकी साधु भी एक हैं। ये भस्म लपेटे रहते हैं और भाँति भाँति की तपस्या करते हैं। भस्म अथवा खाक शरीर पर लपेटने के कारण ही ये खाकी कहलाते हैं।
दादूपन्थियों के अतिरिक्त शैव-वैष्णवों में भी ऐसे संन्यासी होते हैं।
खादिरगृह्यसूत्र
यह गृह्यसूत्र शुक्लयजुर्वेद का है। ओल्डेनवर्ग द्वारा इसका अंग्रेजी अनुवाद 'सेक्रेड बुक्स ऑफ दि ईस्ट', सिरीज में प्रस्तुत किया गया है। इसमें गृह्य संस्कारों और ऋतुयज्ञों का वर्णन पाया जाता है।