ऋचाओं को साम में परिणत करने की विधि के सम्बन्ध में सामवेद के बहुत से सूत्र ग्रन्थ हैं। इनमें एक 'क्षुद्रसूत्र' भी है। इसमें तीन प्रपाठक हैं।
क्षुरिकोपनिषद्
योग सम्बन्धी उपनिषदों में से एक। इसमें योग की प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है। मनोविकारों को यह उपनिषद् (चिन्तन) छुरी की तरह काट देती है।
क्षेत्रपाल
खेत अथवा भूमिखण्ड का रक्षक देवता। गृहप्रवेश या शान्तिकर्मों में क्षेत्रपाल को बलि देकर प्रसन्न किया जाता है। सिन्दूर, दीपक, दही, भात आदि सजाकर चौराहे पर क्षेत्रपाल के लिए रखने की विधि है।
क्षेमराज
अभिनवगुप्त के शिष्य क्षेमराज का जन्म 11वीं शती में कश्मीर में हुआ। कश्मीरी शैवमत के आचार्यों में इनकी गणना होती है। इन्होंने वसुगुप्त रचित 'शिवसूत्र' पर 'शिवसूत्रविमर्शिनी नामक व्याख्या लिखी है।' इस ग्रन्थ में अनेकों आगमों के उद्धरण पाये जाते हैं।
क्षेमव्रत
चतुर्दशी के दिन यह व्रत किया जाता है। इसमें यक्ष-राक्षसों के पूजन का विधान है। दे० हेमाद्रि, 2.154। चतुर्दशी तिथि ऐसे ही प्राणियों के पूजनार्थ निश्चित है।
क्षौरकर्म
सामान्यतः क्षौरकर्म शारीरिक प्रसाधन है, जिसमें केश, दाढ़ी-मूँछ, नखों को कतर कर देह सजा दी जाती है। परन्तु व्रतों और संस्कारों में इसका धार्मिक महत्त्व भी है। व्रतादि में क्षौरकर्म न करने से दोष होता है :
[जो व्रत, उपवास, श्राद्ध, संयम आदि में क्षौरकर्म नहीं करता है वह सभी कर्मों में अपवित्र रहता है।] 'शुद्धितत्त्व' में क्षौर का विधान इस प्रकार है : 'केशश्मश्रुलोमनखानि वापयीत शिखावर्जम्'। [शिखा छोड़कर केश (सिर के बाल), दाढ़ी, रोयें और नख को कटाना चाहिए।] निम्नांकित तिथियों और कर्मों में क्षौर कर्म निषिद्ध है :
[नापित के घर में जाकर क्षौरकर्म कराना इन्द्र की शोभा को भी हर लेता है। रविवार को क्षौरकर्म दुःख, चन्द्रवार को सुख, मंगल को मृत्यु, और बुध को धन उत्पन्न करता है। गुरुवार को मान का हनन करता है। शुक्र को क्षौरकर्म से शुक्रक्षय होता है। शनिवार को क्षौर से सभी दोष होते हैं, अतः इन दिनों में क्षौर वर्जित है।] किन्तु नट भाण, भृत्य, राजसेवक आदि के लिए तथा व्रत, तीर्थ आदि में निषेध नहीं है। भोजन के पश्चात् क्षौर नहीं कराना चाहिए। शिशु के प्रथम क्षौरकर्म को 'चूड़ाकरण' कहते हैं। दे० 'चूड़ाकरण'।
ख
व्यञ्जन वर्णों के अन्तर्गत कवर्ग का द्वितीय अक्षर। वर्णाभिधानतन्त्र में इसका स्वरूप इस प्रकार कहा गया है:
कहते हैं कि नागमाता कद्रू और गरुडमाता विनता (दोनों सौतें) लड़ती हुई सूर्य की ओर गयीं तो कद्रू ने घबड़ाहट में सूर्य को उल्का समझा और 'ख, ख, उल्का' ऐसा कह दिया। विनता ने इसी को सूर्य का नाम मानकर प्रतिष्ठित कर दिया।
खगासन
खग= गरुड है आसन जिसका, विष्णु। विष्णु का आसन गरुड कैसे हुआ, इसका वर्णन महाभारत (1.33.12-18) में पाया जाता है:
[भगवान् (विष्णु) ने आकाश में उड़ने वाले गरुड़ से कहा, मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ। आकाशगामी गरुड़ ने वर माँगते हुए कहा, आपके ऊपर मैं बैठूँ। उसने फिर नारायण से यह वचन कहा, अमृत के विना मैं अजर और अमर हो जाऊँ। विष्णु ने गरुड़ से कहा, ऐसा ही हो। उन दोनों वरों को ग्रहण कर गरुड़ ने विष्णु से कहा, मैं आपको वर देना चाहूँगा, वरण कीजिए। विष्णु ने कहा, मैं तुम्हें वाहनरूप में ग्रहण करता हूँ। उन्होंने ध्वज बनाया और कहा, तुम इसके ऊपर स्थित होगे। गरुड़ ने भगवान् नारायण से कहा, ऐसा होगा। इसके पश्चात् अत्यन्त गति वाला गरुड़ वायु से स्पर्द्धा करता हुआ अत्यन्त वेग से प्रस्थान कर गया।] दे० 'विष्णु' और 'गरुड़'।
खगेन्द्र
खग (पक्षियों) का इन्द्र (राजा), गरुड़। महाभारत (1.31.31) में कथन है :
पतत्रिणाञ्च गरुड़ इन्द्रत्वेनाभ्यषिच्यत।'
[गरुड़ का पक्षियों के इन्द्र के रूप में अभिषेक हुआ।] दे० 'गरुड़'।