logo
भारतवाणी
bharatavani  
logo
Knowledge through Indian Languages
Bharatavani

Hindu Dharmakosh (Hindi-Hindi)

क्षुद्रसूत्र
ऋचाओं को साम में परिणत करने की विधि के सम्बन्ध में सामवेद के बहुत से सूत्र ग्रन्थ हैं। इनमें एक 'क्षुद्रसूत्र' भी है। इसमें तीन प्रपाठक हैं।

क्षुरिकोपनिषद्
योग सम्बन्धी उपनिषदों में से एक। इसमें योग की प्रक्रियाओं का वर्णन किया गया है। मनोविकारों को यह उपनिषद् (चिन्तन) छुरी की तरह काट देती है।

क्षेत्रपाल
खेत अथवा भूमिखण्ड का रक्षक देवता। गृहप्रवेश या शान्तिकर्मों में क्षेत्रपाल को बलि देकर प्रसन्न किया जाता है। सिन्दूर, दीपक, दही, भात आदि सजाकर चौराहे पर क्षेत्रपाल के लिए रखने की विधि है।

क्षेमराज
अभिनवगुप्त के शिष्य क्षेमराज का जन्म 11वीं शती में कश्मीर में हुआ। कश्मीरी शैवमत के आचार्यों में इनकी गणना होती है। इन्होंने वसुगुप्त रचित 'शिवसूत्र' पर 'शिवसूत्रविमर्शिनी नामक व्याख्या लिखी है।' इस ग्रन्थ में अनेकों आगमों के उद्धरण पाये जाते हैं।

क्षेमव्रत
चतुर्दशी के दिन यह व्रत किया जाता है। इसमें यक्ष-राक्षसों के पूजन का विधान है। दे० हेमाद्रि, 2.154। चतुर्दशी तिथि ऐसे ही प्राणियों के पूजनार्थ निश्चित है।

क्षौरकर्म
सामान्यतः क्षौरकर्म शारीरिक प्रसाधन है, जिसमें केश, दाढ़ी-मूँछ, नखों को कतर कर देह सजा दी जाती है। परन्तु व्रतों और संस्कारों में इसका धार्मिक महत्त्व भी है। व्रतादि में क्षौरकर्म न करने से दोष होता है :
व्रतानामुपवासानां श्रद्धादीनाञ्चं संयमे। न करोति क्षौरकर्म अशुचिः सर्वकर्मसु।। (ब्रह्मवैवर्त, प्रकृतिखण्ड, 27 अध्याय)
[जो व्रत, उपवास, श्राद्ध, संयम आदि में क्षौरकर्म नहीं करता है वह सभी कर्मों में अपवित्र रहता है।] 'शुद्धितत्त्व' में क्षौर का विधान इस प्रकार है : 'केशश्मश्रुलोमनखानि वापयीत शिखावर्जम्'। [शिखा छोड़कर केश (सिर के बाल), दाढ़ी, रोयें और नख को कटाना चाहिए।] निम्नांकित तिथियों और कर्मों में क्षौर कर्म निषिद्ध है :
रोहिण्याञ्च विशाखायां मैत्रे चैवोत्तरासु च। मघायां कृत्तिकायाञ्च द्विजैः क्षौरं विसर्जितम्।। कृत्वा तु मैथुनं क्षौरं यो दवान् तर्पये पितृन्। रुधिरं तद्भवेतोयं दाता च नरकं व्रजेत्।। (ब्रह्मवैवर्तपुराण)
कर्मलोचन' नामक पद्धति में क्षौर कर्म सम्बन्धी और भी निषेध पाये जाते हैं :
नापितस्य गृहे क्षौरं शक्रादपि हरेत् श्रियम्। रवौ दुःख सुखं चन्द्रे कुजे मृत्युर्बुधे धनम्।। मानं हन्ति गुरोर्वारे शुक्रे शुक्रक्षयो भवेत्। शनौ च सर्वदोषाः स्युः क्षौर मत्र विवर्जयेत्।।
[नापित के घर में जाकर क्षौरकर्म कराना इन्द्र की शोभा को भी हर लेता है। रविवार को क्षौरकर्म दुःख, चन्द्रवार को सुख, मंगल को मृत्यु, और बुध को धन उत्पन्न करता है। गुरुवार को मान का हनन करता है। शुक्र को क्षौरकर्म से शुक्रक्षय होता है। शनिवार को क्षौर से सभी दोष होते हैं, अतः इन दिनों में क्षौर वर्जित है।] किन्तु नट भाण, भृत्य, राजसेवक आदि के लिए तथा व्रत, तीर्थ आदि में निषेध नहीं है। भोजन के पश्चात् क्षौर नहीं कराना चाहिए। शिशु के प्रथम क्षौरकर्म को 'चूड़ाकरण' कहते हैं। दे० 'चूड़ाकरण'।

व्यञ्जन वर्णों के अन्तर्गत कवर्ग का द्वितीय अक्षर। वर्णाभिधानतन्त्र में इसका स्वरूप इस प्रकार कहा गया है:
ख: प्रचण्डः कामरूपी शुद्धिर्वह्निः सरस्वती। आकाश इन्द्रियं दुर्गा चण्डी सन्तापिनी गुरुः।। शिखण्डी दन्तों जातीशः कफोणिर्गरुडो गदी। शून्यं कपाली कल्याणी सूर्पकर्णोऽजरामरः।। शुभाग्नेयश्चण्डलिंगे जनो झंकारखड्गकौ।।
वर्णोद्धारतन्त्र में इसका ध्यान इस प्रकार बतलाया गया है :
बन्धूकपुष्पसंकाशां रत्नालङ्कारभूषिताम्। वराभयकरी नित्यां ईषद्हास्यमुखी पराम्। एवं ध्यात्वा खस्वरूपां तन्मन्त्रं दशधा जपेत्।।
मातृकान्यास में यह अक्षर बाहु में स्थापित किया जाता है।
ख के अर्थ हैं इन्द्रिय, शून्य, आकाश, सूर्य, परमात्मा।

खखोल्क
काशीपुरी में स्थित एक सूर्य देवता। इनका माहात्म्य काशीखण्ड में वर्णित है।
काशीवासिजनानेकरूपपापक्षयंकरः........................। विनतादित्य इत्याख्यः खखोल्कस्तत्र संस्थितः.। काश्यां पैलंगिले तीर्थे खखोल्कस्य विलोकनात्। नरश्चिन्तितमाप्नोति नीरोगो जायते क्षणात्।।
कहते हैं कि नागमाता कद्रू और गरुडमाता विनता (दोनों सौतें) लड़ती हुई सूर्य की ओर गयीं तो कद्रू ने घबड़ाहट में सूर्य को उल्का समझा और 'ख, ख, उल्का' ऐसा कह दिया। विनता ने इसी को सूर्य का नाम मानकर प्रतिष्ठित कर दिया।

खगासन
खग= गरुड है आसन जिसका, विष्णु। विष्णु का आसन गरुड कैसे हुआ, इसका वर्णन महाभारत (1.33.12-18) में पाया जाता है:
तमुवाचाव्ययो देवो वरदोऽस्मीति खेचरम्। स वव्रे तव तिष्ठेयमुपरीत्यन्तरीक्षगः।। उवाच चैनं भूयोऽपि नारायणमिदं वचः। अजरश्चामरश्च स्याममृतेन विनाप्यहम्।। एवमस्तिवति तं विष्णुरुवाच विनतासुतम्। प्रतिगृह्य वरौ तौ च गरुडो विष्णुमब्रवीत्।। भवतेऽपि वरं दद्यां वृणोतु भगवानपिं। तं वव्रे वाहनं विष्णुर्गरुत्मन्तं महाबलम्।। ध्वजञ्च चक्रे भगवानुपरि स्थास्यसीति तम्। एवमत्सिवति तं देवमुक्त्वा नारायणं खगः। वव्राज तरसा वेगाद् वायुं स्पर्द्धन् महाजवः।।
[भगवान् (विष्णु) ने आकाश में उड़ने वाले गरुड़ से कहा, मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ। आकाशगामी गरुड़ ने वर माँगते हुए कहा, आपके ऊपर मैं बैठूँ। उसने फिर नारायण से यह वचन कहा, अमृत के विना मैं अजर और अमर हो जाऊँ। विष्णु ने गरुड़ से कहा, ऐसा ही हो। उन दोनों वरों को ग्रहण कर गरुड़ ने विष्णु से कहा, मैं आपको वर देना चाहूँगा, वरण कीजिए। विष्णु ने कहा, मैं तुम्हें वाहनरूप में ग्रहण करता हूँ। उन्होंने ध्वज बनाया और कहा, तुम इसके ऊपर स्थित होगे। गरुड़ ने भगवान् नारायण से कहा, ऐसा होगा। इसके पश्चात् अत्यन्त गति वाला गरुड़ वायु से स्पर्द्धा करता हुआ अत्यन्त वेग से प्रस्थान कर गया।] दे० 'विष्णु' और 'गरुड़'।

खगेन्द्र
खग (पक्षियों) का इन्द्र (राजा), गरुड़। महाभारत (1.31.31) में कथन है :
पतत्रिणाञ्च गरुड़ इन्द्रत्वेनाभ्यषिच्यत।'
[गरुड़ का पक्षियों के इन्द्र के रूप में अभिषेक हुआ।] दे० 'गरुड़'।


logo