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Hindu Dharmakosh (Hindi-Hindi)

क्रतुरत्नमाला
शाङ्खायन श्रौतसूत्र पर लिखा गया एक भाष्य क्रतुरत्नमाला के नाम से प्रसिद्ध है। इसके रचयिता श्रीपति के पुत्र विष्णु कहे जाते हैं।

क्रमदीपिका
केशव काश्मीरी निम्बार्कों के एक दिग्विजयी नेता, विद्वान् एवं भाष्यकार हो गये हैं। उनकी क्रम-दीपिका नामक पुस्तक यज्ञ, पूजार्चन आदि पर एक गौरवपूर्ण रचना है, जो गौतमीय तन्त्र की चुनी हुई सामग्रियों का संग्रह है। इसकी रचना 16वीं शती के प्रारम्भ में हुई थी।

क्रमपूजा
कृत्यरत्नाकर में (141-144, देवीपुराण से उद्धृत) लिखा है कि चैत्र शुक्ल पक्ष में दुर्गा का पूजन होना चाहिए। कुछ विशेष तिथियों तथा नक्षत्रों के अवसर पर इससे पुण्य, सुख, समृद्धि की प्राप्ति होती है।

क्रममुक्ति
क्रमशः मुक्ति प्राप्त करने का सिद्धान्त। इस विषय पर शङ्कर द्वारा वेदान्तसूत्र (3.3.29) पर व्याख्यान प्राप्त होता है। उनका कहना है कि देवयान और पितृयान दो मार्ग हैं। पितृयान जन्म-मरण का मार्ग है। देवयान से क्रममुक्ति का मार्ग प्रारम्भ होता है। परन्तु निर्गुण ब्रह्म का सर्वोच्च ज्ञान रखने वाले संत तो पहले ही ब्रह्म के साथ एकत्व की प्राप्ति कर चुकते हैं तथा उनके लिए किसी देवयान (देवपथ) पर चलने की आवश्यकता नहीं हैं। जो लोग केवल सगुण ब्रह्म का ही ज्ञान रखते हैं, वे इस पथ पर अग्रसर होते हैं। वे ब्रह्म को प्राप्त कर पुनः लौटते नहीं। सगुण ब्रह्म से एकत्व प्राप्त कर अन्त में पूर्ण ज्ञान प्राप्त करने हैं। इस प्रतीक्षाकाल तथा अपूर्ण ज्ञान के काल में आत्मा को पूर्ण आनन्द एवं अजेय इच्छाशक्ति प्राप्त होती है (यही ऐश्वर्य कहलाता है)। जब वह सर्वोच्च प्रकाश के समीप पहुँचता है, उसे नया स्वरूप प्राप्त होता है तथा वास्तव में वह मुक्त हो जाता है। इसे 'क्रममुक्ति' का सिद्धान्त कहते हैं।

क्रमसंदर्भ
चैतन्य महाप्रभु के संप्रदाय में जीव गोस्वामी के रचे ग्रंथों का प्रमुख स्थान हैं। 'क्रमसंदर्भ' भागवत पुराण का उन्हीं के द्वारा संस्कृत में किया गया भाष्य है। रचना 1580-1610 ई० के मध्य की है। इस प्रकार की सैद्धांतिक रचनाओं के जीव गोस्वामीकृत छः निबन्ध हैं, जिनकी भाषा अत्यन्त प्रौढ और प्रांजल है। ये 'षट्संदर्भ' वैष्णवों के आकर ग्रंथ (निधि) माने जाते हैं।

क्रवण
ऋग्वेद में एक स्थान (5.44.9) पर उल्लिखित यह शब्द लुडविग के मत से एक होता (पुरोहित) का नाम है। राथ इसे विशेषण मानकर 'कायर' अर्थ करते हैं। सायण इसका अर्थ 'पूजा करता हुआ' और ओल्डेनवर्ग इसका अर्थ अनिश्चित बताते हैं, किन्तु सम्भवतः वे इसका अर्थ 'बलिपशु का वधिक' लगाते हैं।

क्रव्याद
क्रव्य=कच्चा मांस+ अद= भक्षक अर्थात दानव। शव दहन करने वाले अग्नि का यह नाम है। महाभारत (1.6.7) में कथा है कि भृगु ने पुलोमा के अपहरण पर अग्नि को शाप दिया कि वह सर्वभक्षी हो जाय। सर्वभक्षी होने पर मांसादि सभी अमेध्य वस्तुओं को अग्नि को ग्रहण करना पड़ा। परन्तु प्रश्न यह उपस्थित हो गया कि अशुद्ध अग्निमुख से देव और पितर किस प्रकार आहुति ग्रहण करेंगे। देवताओं के अनुरोध से ब्रह्मा ने अपने प्रभाव को अग्नि पर प्रकट करते हुए अपने आहुत भाग को स्वीकार किया। इसके पश्चात् देव-पितरों ने भी अपना-अपना भाग अग्निमुख से लेना प्रारम्भ किया।
शान्तिकर्म आदि में क्रव्यादि अग्नि का अपसारण (दूरीकरण) ऋग्वेद (10.16.9) के मन्त्र से किया जाता है।

क्रिया
सृष्टि-विकास के प्रथम चरण को 'क्रिया' कहते हैं। प्रारंभिक सृष्टि की पहली अवस्था में शक्ति का जागरण दो चरणों में होता है--1. 'क्रिया' और 2. 'भूति' तथा उनके छः गुणों का विकास होता है।
शिक्षा, पूजा, चिकित्सा और सामान्य धार्मिक विधियों के लिए भी 'क्रिया' शब्द का प्रयोग होता है :
आरम्भो निष्कृतिः शिक्षा पूजानं सम्प्रधारणम्। उपायः कर्मचेष्टा च चिकित्सा च नवक्रियाः।। (भावप्रकाश)
धर्मशास्त्र में व्यवहारपाद (न्यायविधि) का एक पादविशेष क्रिया कहलाता है। वह दो प्रकार की होती है--- मानुषी और देवी। प्रथम साक्ष्य, लेख्य और अनुमान भेद से तीन प्रकार की होती है। दूसरी घट, अग्नि, उदक, विष, कोष, तण्डुल, तप्तमाषक, फाल, धर्म भेदों से नौ प्रकार की होती है। दे० 'व्यवहरतत्त्व' में बृहस्पति।

क्रियापद
शैव आगमों के समान ही वैष्णव संहिताओं के चार भाग हैं--1. ज्ञानपाद, 2. योगपाद, 3. क्रियापद, और 4. चर्यापाद। क्रियापाद के अन्तर्गत मन्दिरों तथा मूर्तियों के निर्माण का विधान और वर्णन पाया जाता है।
धर्मशास्त्र में व्यवहार (न्याय) का तीसरा पाद क्रिया कहलाता है---
पूर्वपक्षः स्मृतः पादो द्वितीयश्चोत्तरः स्मृतः। क्रियापादस्तथा चान्यश्चतुर्थो निर्णयः स्मृतः।। (बृहस्पति, व्यवहारतत्त्व)
[व्यवहार का प्रथम पाद पूर्वपक्ष, द्वितीय पाद उत्तर, तृतीय क्रियापाद और चतुर्थ निर्णयपाद कहलाता है।]

क्रियायोग
देवाराधन तथा उनके पूजन के लिए मन्दिर निर्माण आदि पुण्यकर्मों को क्रियायोग कहते हैं। अग्निपुराण के वैष्णव क्रियायोग के यमानुशासन अध्याय में इसका विस्तृत वर्णन पाया जाता है।
पातञ्जलि योगसूत्र के अनुसार तप, स्वाध्याय और ईश्वरप्रणिधान क्रियायोग के अन्तर्गत सम्मिलित हैं (तपःस्वाध्यायेश्वरप्रणिधानानिक्रियायोगाः)।


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