logo
भारतवाणी
bharatavani  
logo
Knowledge through Indian Languages
Bharatavani

Hindu Dharmakosh (Hindi-Hindi)

कौल
शाक्तों के वाममार्गी संप्रदाय में कौल एक शाखा है। इसका आधारभूत साहित्य है कौलोपनिषद् तथा परशुरामभार्गवसूत्र। दूसरे ग्रन्थ में कौल प्रणाली की सभी शाखाओं का सम्पूर्ण विवरण है। दिव्य, घोर और पशु इन तीन भावों में से दिव्य भाव में लीन ब्रह्मज्ञानी को 'कौल' कहते हैं। कुलार्णवतन्त्र में 'कौल' की निम्नांकित परिभाषा पायी जाती है :
दिव्यभावरतः कौलः सर्वत्र समदर्शन।'
[दिव्य भाव में रत, सर्वत्र समान रूप से देखनेवाला 'कौल' होता है।] महानीलतन्त्र में कथन है :
पशोर्वक्त्राल्लब्धामन्त्रः पशुरेव न संशयः। वीराल्लब्धमनुर्वीरः कौलाच्च ब्रह्मविद् भवेत्।।
[पशु के मुख से मन्त्र प्राप्त कर मनुष्य निश्चय ही पशु रहता है, वीर से मन्त्र पाकर वीर और कौल के मुख से मन्त्र पाकर ब्रह्मज्ञानी होता है।] दे० 'कौलाचार'।

कौलाचार
तान्त्रिक गण सात प्रकार के आचारों में विभक्त हैं। कुलार्णवतन्त्र के अनुसार वेद, वैष्णव, शैव, दक्षिण, वाम, सिद्धान्त एवं कौल ये सात आचार हैं। कौलाचार सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। किन्तु प्रथम तीन अन्तिम चार की निन्दा भी करते हैं। प्रत्येक आचार के अनेक तन्त्र हैं। तन्त्रों में कौलाचार का वर्णन इस प्रकार है :
दिक्कालनियमो नास्ति तिथ्यादिनियमो न च। नियमो नास्ति देवेशि महामन्त्रस्य साधने।। क्वचित् शिष्टः क्वचिद् भ्रष्टः क्वचिद् भूतपिशाचकः। नानावेशधराः कौला विचरन्ति महीतले।। कर्दमे चन्दनेऽभिन्नं मित्रे शत्रौ तथा प्रिये। श्मशाने भवने देवि तथैव काञ्चने तृणे।। न भेदो यस्य देवेशि स कौलः परिकीर्तितः।। (नित्यातन्त्र)
[ देश एवं काल का नियम नहीं है, तिथि आदि का भी नियम नहीं है। हे देवेशि! महामन्त्र-साधन का भी नियम नहीं है। कभी शिष्ट, कभी भ्रष्ट और कभी भूत-पिशाच के समान, इस तरह नाना वेषधारी कौल महीतल पर विचरण करते हैं। कर्दम और चन्दन में, मित्र और शत्रु में, श्मशान और गृह में, स्वर्ण और तृण में जिनका भेदज्ञान नहीं, उन्हें ही 'कौल' कहा जा सकता है।]
कौलों के विषय में और भी कथन है :
अन्तः शाक्ता बहिः शैवाः सभामध्ये तु वैष्णवाः। नाना रूपधराः कौला विचरन्ति महीतले।।
[भीतर से शाक्त, बाहर से शैव, सभा में वैष्णव; नाना रूप धारण करके कौल लोग पृथ्वी पर विचरण करते हैं।]
कौलाचार में जो वस्तुएँ मूल में रूपकात्मक थीं वे आगे चलकर व्यवहार में अपने भौतिक रूप में प्रयुक्त होने लगीं। कौलों की साधना में पञ्चमकार (मद्य, मांस, मत्स्य, मुद्रा और मैथुन) का उन्मुक्त प्रयोग होता है। इन पञ्च मकारों से जगदम्बिका का पूजन होता है। काली अथवा तारा का मन्त्र ग्रहण करके जो पञ्च मकार का सेवन नहीं करता वह कलियुग में पतित है; वह जप, होम आदि कार्यों में अनधिकारी होता है तथा मूर्ख कहलाता है। उसका पितृतर्पण श्वानमूत्र के समान है। काली और तारा का मन्त्र पाकर जो वीराचार नहीं करता वह शूद्रत्व को प्राप्त होता है। सुरा सभी कार्यों में प्रशस्त मानी जाती है। पृथ्वी में यह एक मात्र मुक्तिदायिनी समझी जाती है। इसका नाम ही तीर्थ है।

कौलोपनिषद्
कौलमार्ग (शाक्तों की एक शाखा) का यह आधारग्रन्थ है। यह संक्षिप्त ग्रन्थ है और सरल गद्य में संकेतों के साथ लिखा गया है। अतः पहेली के समान सरलता से समझ में न आने वाला है तथा इसका निर्देश अस्पष्ट है। इसका कथन है कि पूजा-पाठ एवं यज्ञादि से मुक्ति नहीं मिलता। इसे प्राप्त करने के लिए सामाजिक परम्परा से चले आ रहे अन्धविश्वासी बन्धनों से मुक्ति पानी चाहिए। कौल धर्म वीरों का मार्ग है, कायरों का नहीं।

कौशाम्बी
प्राचीन प्रसिद्ध वत्स जनपद की राजधानी, जो प्रयोग से दक्षिण है। इसका गौतम बुद्ध के जीवन तथा बौद्ध धर्म से घनिष्ठ सम्बन्ध था। यह इतिहासप्रसिद्ध राजा उदयन की राजधानी थी। इस स्थान का नाम अब कोसम है। यहाँ भूखनन से बहुत-सी मूर्तियाँ, स्थापत्य के भग्न खण्ड और अन्य वस्तुएँ निकली हैं। यह जैनों का भी तीर्थस्थल है।
वाल्मीकिरामायण (1.32.5) के अनुसार कुशाम्ब नामक एक पौरव राजा ने इसकी स्थापना की थी :
कुशाम्बस्तु महातेजा कौशाम्बीमकरोत् पुरीम्।'
गंगा की बाढ़ से जब हस्तिनापुर नष्ट हो गया तो वहाँ से हटकर पौरव राज वत्स जनपद में आ गया था।

कौशिक
इन्द्र का एक नाम, जिसे कुशिकों से सम्बन्धित कहा गया है। विश्वामित्र को भी कौशिक (कुशिक के पत्र) कहते हैं। बृहदारण्यक उपनिषद् के प्रारम्भिक दो वंशों में कौशिक नामक आचार्य का नाम कौण्डिन्य के शिष्य के रूप में आया है। पुराणों में बतलाया गया है कि किस प्रकार इन्द्र ने राजा कुशिक की तपस्या से भयभीत होकर उसका पुत्रत्व स्वीकार किया। हरिवंश (27.13--16) में यह कथा इस प्रकार है :
कुशिकस्तु तपस्तेपे पुत्रमिन्द्रसमं विभुः। लभेयमिति तं शक्रस्त्रासादम्य़ेत्य जज्ञिवान्।। पूर्णे वर्षसहस्रे वै तन्तु शक्रो ह्यपश्यत। अत्युग्रतपसं दृष्ट्वा सहस्राक्षः पुरन्दरः।। समर्थ पुत्रजनने स्वमेवांशमवासयत्। पुत्रत्वे कल्पयामास स देवेन्द्रः सुरोत्तमः।। स गाधिरभवद्राजा मघवान् कौशिकः स्वयम्।।

कौशिकसूत्र
यह अथर्ववेद से सम्बन्धित प्रथमतः गृह्यसूत्र है। इसमें ऐन्द्रजालिक उत्सवों का वर्णन भी विशद रूप से मिलता है तथा जो बातें अथर्ववेद में अस्पष्ट हैं वे सुस्पष्ट कर दी गयी हैं।
गोपथब्राह्मण के अनुसार अथर्ववेदसंहिता के पाँच सूत्रग्रन्थ हैं--कौशिकसूत्र, वैतानसूत्र, नक्षत्रकल्पसूत्र, आङ्गिरसकल्पसूत्र एवं शान्तिकल्पसूत्र। कौशिकसूत्र को ही 'संहिताविधिसूत्र' भी कहते हैं। बहुत से सूत्रग्रन्थों में अथर्ववेद के प्रतिपाद्य कर्मों का विधान अत्यन्त सूक्ष्म रूप से किया गया है, जिससे वे दुर्बोध हो गये हैं। इन्हें ही सुबोध कर देने के लिए कौशिकसूत्र का संग्रह हुआ है। कौशिकसूत्र में 1. स्थालीपाकविधान में दर्शपूर्णमास विधि 2. मेधाजनन 3. ब्रह्मचारीसम्पद् 4. ग्राम-दुर्ग-राष्ट्रादिलाभ विषय 5. पुत्र-पशु-धन-धान्य-प्रजा-स्त्री-करि-तुरगरथ-दोलकादि सर्वसम्पत्साधक समूह 6. मानवगण में ऐकमत्य सम्पादक सौमस्यादि विषयों का वर्णन है।

कौषीकाराम
आपस्तम्ब सूत्र के भाष्यकारों में से एक कौशिकाराम भी है।

कौषीतकि आरण्यक
वेद के चार भाग हैं-- संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषद्। ऋग्वेद का यह आरण्यक भाग है। आरण्यकों में ऋषियों का निर्जन अरण्यों में रहकर ब्रह्मविद्या अध्ययन तथा उनके द्वारा अनेक गम्भीर अनुभूत विचार लोककल्याणार्थ दिये हुए हैं। कौषीतकि आरण्यक के तीन खंड हैं, जिनमें दो खंड प्रधान हैं, जो कर्मकांड से भरे पड़े हैं। तीसरा खंड कौषीतकि उपनिषद् कहलाता है। यह एक सारगर्भ उपादेय ग्रन्थ है। आनन्दमय धाम में कैसे प्रवेश किया जाय और उस आनन्द का उपभोग किस प्रकार किया जाय इस बात पर अनेक अध्यायों में विचार हुआ है। गृह्यकृत्य, पारिवारिक बन्धन आदि में बँधे हुए लोगों के मन के भीतर उस समय में अत्यन्त कोमल हृदय की वृत्तियों ने किस प्रकार विकास किया है, इसका बहुत ही सुन्दर चित्र दूसरे अध्याय में मिलता है। तीसरे अध्याय में ऐतिहासिक वृत्तान्त और इन्द्र के युद्धादि के उपाख्यान दिये गये हैं। चौथा अध्याय भी आख्यानों से भरा है। काशिराज वीरेन्द्रकेशरी ने एक ज्ञानी ब्राह्मण को जो उपदेश दिया था वह भी इस अध्याय में वर्णित है। इसमें भौगोलिक बातें भी हैं। हिमवान् और विन्ध्यादि पर्वतों के नाम और पहाड़ियों के नाम भी पाये जाते हैं। सायणाचार्य ने ऐतरेय एवं कौषीतकि दोनों आरण्यकों के भाष्य लिखे हैं।

कौषीतकि उपनिषद्
ऋग्वेद के कौषीतकि नामक ब्राह्मण के इसी नाम वाले आरण्यक का तीसरा खण्ड 'कौषीतकि उपनिषद्' कहलाता है। विशेष विवरण के लिए दे० 'कौषीतकि आरण्यक'।

कौषीतकिब्राह्मण
ऋग्वेद की दो शाखाओं--ऐतरेय एवं कौषीतकि के इन्हीं नामों के दो ब्राह्मण हैं। कौषीतकि को शाङ्खायन भी कहते हैं। कृष्ण यजुर्वेद के ब्राह्मण भाग के अतिरिक्त सामान्ययज्ञादि विषयक महत्त्वपूर्ण छः ब्राह्मणग्रन्थ हैं। ये हैं--ऐतरेय; कौषीतकि, पञ्चविंश, तलवकार, तैत्तिरीय एवं शतपथ। कौषीतकि ब्राह्मण का अंग्रेजी अनुवाद प्रो० कीथ द्वारा एवं विश्लेषण डॉयसन द्वारा हुआ है।


logo