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Hindu Dharmakosh (Hindi-Hindi)

कोसल (कोशल)
जनपद का नाम, जिसकी राजधानी अयोध्या थी (दे० 'अयोध्या')। वाल्मीकि रामायण (1.4.5) में इसका उल्लेख है :
कोसलो नाम मुदितः स्फीतों जनपदो महान्। निविष्टः सरयूतीरे प्रभूत धनधान्यवान्।।
[कोसल नामक महान् जनपद विस्तृत और सुखी था। यह सरयू के किनारे स्थित और प्रभूत धन-धान्य से युक्त था।] कहीं-कहीं अयोध्या नगरी के लिए ही इसका प्रयोग हुआ है।

कौकूस्त
शतपथ ब्राह्मण (4.6.1.13) में 'कौकूस्त' एक यज्ञ में पुरोहितों को दक्षिणा देनेवाला कहा गया है। काण्व शाखा इस शब्द का पाठ 'कौक्थस्त' के रूप में करती है।

कौत्स
यह एक प्रसिद्ध ऋषि का नाम है।

कौथुमी
सामवेद की एक शाखा। सामसंहिता के सभी मन्त्र गेय हैं। जिन यज्ञों में सोमरस काम में लाया जाता था उनमें (अर्थात् सोमयागों में) उद्गाताओं का यह कर्तव्य था कि वे सामगान करें। ब्रह्मचारियों को आचार्य इस संहिता के छन्दों के सस्वर पाठ करने की विधि सिखाते थे, तथा वे इसे बार-बार गाकर कंठस्थ भी कर लेते थे। उन्‍हें यह भी शिक्षा दी जाती थी कि किस यज्ञ में किस ऋचा या छन्द का गान होगा। कौथुमीसंहिता सामवेद की तीन शाखाओं में से एक है। यह शाखा उत्तर भारत में प्रचलित है, जबकि 'जैमिनीय' एवं 'राणायनीय' का प्रचार कर्णाटक एवं महाराष्ट्र में है। कौथुमी शाखा के आचार्य अपने ब्रह्मचारियों (उद्गाता की शिक्षा लेने वालों) को 585 स्वरों की शिक्षा देते थे, जिनका सम्बन्ध उतने ही छन्दों से होता था। वैसे तो सामवेद की 1000 शाखाएँ कही जाती हैं, किन्तु प्रचलित हैं केवल तेरह। इन तेरहों में भी आजकल दो ही प्रधान हैं-- कौथुमी (उत्तर भारत में काशी, कान्यकुब्ज, गुजरात और वङ्ग) तथा राणायनीय (दक्षिण में)।

कौटिल्य
कौटिल्य चाणक्य एवं विष्णुगुप्त नाम से भी प्रसिद्ध हैं। इनका व्यक्तिवाचक नाम विष्णुगुप्त, स्थानीय नाम चाणक्य (चणकावासी) और गोत्रनाम कौटिल्य (कुटिल से) था। ये चन्द्रगुप्त मौर्य के प्रधानमन्त्री थे। इन्होंने 'अर्थशास्त्र' नामक एक ग्रन्थ की रचना की, जो तत्कालीन राजनीति, अर्थनीति, इतिहास, आचरण शास्त्र, धर्म आदि पर भली भाँति प्रकाश डालता है। 'अर्थशास्त्र' मौर्य काल के समाज का दर्पण है, जिसमें समाज के स्वरूप को सर्वाङ्ग देखा जा सकता है। अर्थशास्त्र से धार्मिक जीवन पर भी काफी प्रकाश पड़ता है। उस समय बहुत से देवताओं तथा देवियों की पूजा होती थी। न केवल बड़े देवता-देवी अपितु यक्ष, गन्धर्व, पर्वत, नदी, वृक्ष, अग्नि, पक्षी, सर्प, गाय आदि की भी पूजा होती थी। महामारी, पशुरोग, भूत, अग्नि, बाढ़, सूखा, अकाल आदि से बचने के लिए भी बहुतेरे धार्मिक कृत्य किये जाते थे। अनेक उत्सव, जादू टोने आदि का भी प्रचार था। कौटिलीय अर्थशास्त्र के अनुसार राजा का मुख्य कर्तव्य था प्रजा द्वारा वर्णाश्रम धर्म और नैतिक आचरण का पालन कराना। दे० 'अर्थशास्त्र'।

कौतिकव्रत
इसमें नौ वस्तुओं के उपयोग का विधान है, यथा दूर्वा, अंकुरित यव, बालक नामक पौधा, आम्रदल, दो प्रकार की हल्दी, सरसों, मोर के पंख तथा साँप की केंचुल। विवाह के समय उपर्युक्त वस्तुएँ वर-वधु के कङ्कण में बाँधी जाती हैं। दे० हेमाद्रि, 1.49; व्रतराज, 16। कालिदास कृत रघुवंश के अष्टम सर्ग के प्रथम श्लोक में 'विवाहकौतुक' शब्द आया है। ये सभी मांगलिक वस्तुएँ हैं तथा अनुराग, काम और सर्जन क्रिया को इंगित करती हैं।

कौमुदी
संस्कृत व्याकरण के ग्रन्थों में कौमुदी का प्रचार अधिक देखा जाता है। इसके तीन संस्करण हैं--सिद्धान्त, मध्य एवं लघु। भट्टोजिदीक्षित ने 'सिद्धान्तकौमुदी' लिखी जिसके प्रचार से अष्टाध्यायी की पठनप्रणाली उठ सी गयी। सिद्धीन्तकौमुदी पर भट्टोजिदीक्षित ने ही 'प्रौढमनोरमा' नाम की टीका लिखी। मध्यकौमुदी एवं लघुकौमुदी वरदराज ने लिखी। कौमुदी पाणिनिसूत्रों पर ही अवलम्बित है। संस्कृत भाषा के अध्ययन में यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। कहावत है "कौमुदी कण्ठलग्ना चेद् वृथा भाष्ये परिश्रमः।"
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कौमुदीव्रत
आश्विन शुक्ल एकादशी से यह व्रत किया जाता है। उपवास तथा जागरण का इसमें विधान है। द्वादशी को विभिन्न प्रकार के कमलों से वासुदेव की पूजा की जाती है। वैष्णवों द्वारा त्रयोदशी को यात्रोत्सव, चतुर्दशी को उपवास तथा पूर्णिमा को वासुदेव की पूजा की जाती है। 'ओं नमो भगवते वासुदेवाय' मन्त्र के जप का इसमें विशेष महत्त्व है। हेमाद्रि के अनुसार इस व्रत को भगवान् विष्णु के जागरण तक अर्थात् कार्तिक शुक्ल एकादशी तक जारी रखना चाहिए।

कौरष्य
एक शैव संप्रदायाचार्य। शिव के लकुलीश (संन्यासी रूप में शिव) अवतार के चार शिष्य थे--कुशिक, गार्ग्य, मित्र (मैत्रेय) एवं कौरष्य। इन्होंने चार उपसम्प्रदायों की स्थापनी की।

कौर्म उपपुराण
यह उन्तीस उपपुराणों में से एक उपपुराण है।


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