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Hindu Dharmakosh (Hindi-Hindi)

कोजागर (कौमुदीमहोत्सव)
आश्विन पूर्णिमा के दिन इसका अनुष्ठान होता है। इसमें लक्ष्मी तथा ऐरावतारूढ़ इन्द्र का पूजन रात्रि में करना चाहिए। घी अथवा तिल के तिल के बहुसंख्यक दीपक मुख्य सड़कों पर, मन्दिरों में, बागों में तथा घरों में प्रज्वलित करने चाहिए। दूसरे दिन प्रातःकाल इन्द्र की पूजा होनी चाहिए। ब्राह्मणों को अत्यन्त स्वादिष्ठ भोजन कराना चाहिए। लिङ्गपुराण के अनुसार दयालुता की मूर्ति लक्ष्मी मध्य रात्रि के समय परिभ्रमण करती हुई कहती है: "कौन जाग रहा है?" मनुष्यों को नारियल में भरा हुआ पानी (रस) पीना चाहिए तथा पासों से खेलना चाहिए। 'को जागर्ति' इन दो शब्दों में 'कोजागर' व्रत की ध्वनि विद्यमान है। इसे 'कौमुदीमहोत्सव' भी कहा जाता है। सम्भवतः 'कोजागर' शब्द 'कौमुदीजागर' का ही संकेतात्मक तथा संक्षिप्त रूप है। कौमुदीमहोत्सव के लिए दे० कृत्यकल्पतरु (राजधर्म), पृ० 182-183; राजनीतिप्रकाश (वीरमित्रोदय), पृ० 419-421।
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कोटिमाहेश्वरी
हिमालय स्थित एक तीर्थस्थान। यह स्थान कालीमठ से दो मील दूर है। यहाँ कोटिमाहेश्वरी देवी का मन्दिर है। यात्री यहाँ पितृतर्पण तथा पिण्डदान करते हैं।

कोटिरुद्रसंहिता
शिवपुराण के सात खण्डों में से चौथे खण्ड का नाम। इसमें कुल 43 अध्याय हैं। दे० 'शिवपुराण'।

कोटिहोम
मत्स्यपुराण (93.5-6) के अनुसार नवग्रहहोम उस समय अयुतहोम कहलाता है जब आहुतियों की संख्या दस सहस्र हो। इसी क्रम से बढ़ते हुए एक अन्य प्रकार का होम लक्षहोम है तथा तीसरा कोटिहोम है। वस्तुतः नवग्रहमख अशुभ शकुनों तथा क्रूर ग्रहों के प्रशमनार्थ होता है। मत्स्यपुराण (93) में उपर्युक्त तीनों होमों का वर्णन है। बाणभट्ट के हर्षचरित के अनुसार जिस समय प्रभाकरवर्द्धन मृत्युशय्या पर था उस समय कोटिहोम का आयोजन किया गया था।

कोटीश्वरीव्रत
भाद्र शुक्ल तृतीया को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। चार वर्ष तक इसका आचरण करना चाहिए। इस दिन उपवास का विधान है। एक लाख अक्षत अथवा तिल दूध में डालने चाहिए। तदनन्तर देवी पार्वती की एक स्थूल प्रतिमा बनाकर उसका पूजन करना चाहिए। इस पूजन से न तो दारिद्र्य रहेगा न कोई अन्य विपत्ति, आठ सन्तान और सुन्दर पति की प्राप्ति होगी। इसका नाम लक्षेश्वरी भी है।
कोटितीर्थ या कोटीश्वर या शिवकोटि शंकरजी की एक करोड़ मूर्तियों का भी नाम है। ऐसा एक तीर्थ प्रयागराज में गंगाजी के बड़े रेल पुल के पास है। यहाँ लंकाविजय कर लौटते समय रामचन्द्रजी एक करोड़ शिवमूर्तियों का एकतन्त्र में पूजन कर रावणवध के पाप से मुक्त हुए थे।

कोटेश्वर
हिमालय में स्थित एक तीर्थस्थान। देवप्रयाग से खर्साड़ा 10 मील और यहाँ से कोटेश्वर 4 मील दूर है। यहाँ कोटेश्वर महादेव का मन्दिर है।

कोणार्क
भुवनेश्वर से लगभग 42 मील दक्षिणपूर्व उड़ीसा का यह एक सौर तीर्थ है। स्थानीय जनश्रुति के अनुसार एक बार भगवान् श्रीकृष्ण के पुत्र साम्ब को कुष्ठ रोग हो गया था। भगवान् की आज्ञा से इस स्थान पर कोणादित्य की आराधना करने से उनका कुष्ठ दूर हुआ। पश्चात् साम्ब ने यहाँ सूर्यमूर्ति स्थापित की थी (यह मूर्ति अब पुरी में है)। यह उपाख्यान सूर्यपूजा सम्बन्धी पौराणिक कथा का रूपान्तर है। वास्तव में मूल सूर्यमन्दिर पंजाब में चन्द्रभागा (चेनाव) और सिन्धुनद के संगम पर मुलतान =मूलस्थान में था। तुर्कों द्वारा उसके नष्ट होने पर कोणार्क वाला सूर्यमन्दिर सन् 1250 में बना और नया चन्द्रभागातीर्थ स्थापित हुआ।
इस मन्दिर में भास्कर्य कला-परम्परा का सम्पूर्ण वैबव दृष्टिगोचर होता है। किन्तु यह आज भग्नावस्था में है। भारत के लगभग सभी सूर्यमन्दिरों की यही अवस्था है। वास्तव में सौर मत का प्रभाव समाप्त होता गया और उचित संरक्षण न मिलने से यह मन्दिर भी ध्वस्त हो गया है। इसका जगमोहन मात्र आज खड़ा है। वर्ष में एक बार यहाँ देश के कोने-कोने से बचे-खुचे सूर्योपासक इकट्ठे होकर इस स्थान, मन्दिर एवं वातावरण को प्राणवान् कर देते हैं। यह तीर्थ भी चन्द्रभागा के नाम से प्रसिद्ध है। यहाँ पर चन्द्रभागा नदी समुद्र में मिलती है। परन्तु स्पष्टतः यह पुराने तीर्थ (चन्द्रभागा या चेनाव और सिन्धु के संगम) का स्थानान्तरण है।
कोणार्क का सूर्यमन्दिर अपनी वास्तुकला लिए प्रसिद्ध है। यहाँ पर सूर्य की अनेक सर्जनात्मक क्रियाएँ प्रतीकात्मक रूप से विविध आकारों में अंकित हैं।

कोयिलपुराण
यह शैव सिद्धान्त की तमिलशाखा का चौदहवीं शती में निर्मित एक ग्रन्थ है।

कोलाहल पण्डित
यामुनाचार्य के समसामयिक पाण्ड्यराज का सभापण्डित। राजा इसके प्रति अत्यन्त श्रद्धाभाव रखता था। जो पण्डित कोलाहल से शास्त्रार्थ में हार जाते थे, उन्हें राजा की आज्ञा के अनुसार दण्डस्वरूप कुछ वार्षिक कर कोलाहल पण्डित को देना पड़ता था। कोलाहल सम्राट की तरह अधीनस्थ पण्डितों से कर वसूलता था। यामुनाचार्य के गुरु भाष्याचार्य भी उसे कर दिया करते थे। एक बार भाष्याचार्य ने दो तीन वर्ष तक कर नहीं दिया। कोलाहल का एक शिष्य कर माँगने आकर भाष्याचार्य को अनुपस्थित पा अनाप-शनाप बकने लगा। ऐसि स्थिति में यामुन ने, जो 12 वर्ष के बालक थे, कोलाहल से शास्त्रार्थ करने को कहा। शिष्य ने जाकर कोलाहल से कहा। उधर राजा-रानी को भी पता चला। दोनों में तर्क हुआ। रानी ने कहा कि यामुन जीतेगा; यदि न जीतेगा तो मैं आपकी क्रीतदासी की दासी होकर रहूँगी।
राजा ने कहा कोलाहल जीतेगा; यदि न जीतेगा तो मैं अपना आधा राज्य यामुन को दे दूंगा। रानी की बात रह गयी यामुन जीत गये। कोलाहल पण्डित हार गया। यामुन को राजा ने सिंहासन पर बैठा दिया। दे० 'यामुनाचार्य'।

कोष
उपनिषदों में आत्मा के पाँच कोष बताये गये हैं :
1. अन्नमय कोष (स्थूल शरीर, जो अन्न से बनता है)
2. प्राणमय कोष (शरीर के अन्तर्गत वायुतत्त्व)
3. मनोमय कोष (मन की संकल्प-विकल्पात्मक क्रिया)
4. विज्ञानमय कोष (बुद्धि की विवेचनात्मक क्रिया)
5. आनन्दमय कोष (आनन्द की स्थिति)।
ये आत्मा के आवरण माने गये हैं। इनके क्रमशः भेदन से जीवात्मा अपना स्वरूप पहचानता है। आत्मा इन सबका आधार और इनसे परे है। दे० 'आत्मा'।
पञ्चदशी (3.1-11) में इन कोषों का विस्तृत वर्णन है।


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