शब्दाद्वैतवाद के सबसे प्रथम दार्शनिक व्याख्याता भर्तृहरि थे। उनके पश्चात् भर्तृमित्र हुए, जिनका स्फोट पर 'स्फोटसिद्धि' नामक ग्रन्थ अब उपलब्ध हो गया है। इनके बाद इस सिद्धान्त का पूर्ण वर्णन पुण्यराज एवं कैयट के व्याख्यानिबन्धों में पाया जाता है, जो क्रमशः 'वाक्यपदीय' और 'पातञ्जलि महाभाष्य' पर हैं। कैयट का समय 11वीं शताब्दी है और ये कश्मीरदेशीय थे। इनकी टीका के बल पर ही पश्चात्कालीन विद्वान् महाभाष्य को समझने में समर्थ हो सके। टीका के उपक्रम में इनका कहना है :
महाभाष्य की दुर्बोधता को लेकर श्री हर्ष जैसे महाकवि 'नैषधचरित' में एक अद्भुत उपमा दी है। उन्होंने नल की राजधानी शत्रुओं के लिए वैसी ही अभेद्य बतलायी है जैसी पंडितों के लिए महाभाष्य की फक्किकाएँ अबोध थीं। कैयट ने इन्हें सुबोध्य बना दिया।
कैलास
हिमालय का सर्वाधिक पवित्र शिखर। मानसरोवर से कैलास लगभग 20 मील दूर है। पूरे कैलास की आकृति विराट् शिवलिङ्ग जैसी है, जो मानों पर्वतों के एक षोडशदल कमल के मध्य स्थित है। कैलास शिखर आस-पास के समस्त शिखरों से ऊँचा है। इसकी परिक्रमा 32 मील की है जिसे यात्री प्रायः तीन दिनों में पूरी करते हैं। कैलास का ऊर्ध्व भाग तो प्रायः अगम्य है, उसका स्पर्श यात्रामार्ग से लगभग डेढ़ मील सीधी चढ़ाई पार करके किया जा सकता है और यह चढ़ाई पर्वतारोहण की विशिष्ट तैयारी के विना शक्य नहीं है। कैलास के शिखर की ऊँचाई समुद्रस्तर से 19000 फुट कही जाती है। कैलास के दर्शन एवं परिक्रमा करने पर जो अद्भुत शान्ति एवं पवित्रता का अनुभव होता है वह स्वयं अनुभव की वस्तु है।
कैलास शब्द की व्युत्पत्ति कई प्रकार से की गयी है : क अर्थात् जल में जिसका लसन अथवा लास्य हो (के जले लासो लसनं दीप्तिरस्य) वह कैलास कहलाता है। दूसरी व्युत्पत्ति है : केलियों का समूह कैल; 'कैल' के साथ यहाँ 'आस' निवास किया जाता है (केलीनां समूहः कैलम्, कैलेनास्यते अत्र)। यहाँ शिव पार्वती के साथ निवास करते हैं और उनके गण इतस्ततः किलोल किया करते हैं।
भागवत पुराण में सुमेरु पर्वत के पूर्व में जठर और देवकूट, पश्चिम में पवन औऱ पारियात्र तथा दक्षिण में कैलास और करवीर पर्वत स्थित कहे गये हैं।
कैलासनाथ
कैलास क्षेत्र के स्वामी, कुबेर, जो यक्षों के राजा और धन के देवता हैं। इनकी राजधानी अलकापुरी कैलास की द्रोणी में बसी हुई और मानवों के लिए अगोचर है। कैलास के शिरोभाग पर शंकरजी का निवास है, अतः वे भी कैलासनाथ कहलाते हैं।
कैलाससंहिता
शिवपुराण के सात खण्ड हैं: 1. विश्वेश्वर संहिता 2. रुद्रसंहिता, 3. शतरुद्रसंहिता, 4. कोटिरुद्रसंहिता, 5. उमासंहिता, 6. कैलाससंहिता एवं 7. वायवीय संहिता (पूर्व एवं उत्तर दो खण्ड युक्त) कैलाससंहिता में कुल 23 अध्याय हैं। दे० 'शिवपुराण'।
कैवद्यदीपिका
यह मानभाउ संप्रदाय का एक ग्रन्थ है, जो संस्कृत में रचा गया है। 'मानभाउ' या महानुभाव मत महाराष्ट्र की ओर प्रचलित है।
कैवर्त
एक वर्णसंकर जाति। ब्रह्मवैवर्तपुराण के अनुसार क्षत्रिय पुरुष और वैश्य स्त्री से उत्पन्न संतान इस जाति की होती है। इसके पर्याय हैं दाश, धीवर, दाशेरक, जालिक। मनुस्मृति (10.34) में भी कैवर्त की गणना संकर जातियों में की गयी है :
सब उपाधियों से रहित केवल (शुद्ध मात्र) की अवस्था (भाव)। यह मोक्ष अथवा मुक्ति का पर्याय है। पातञ्जलि योगसूत्र के कैवल्य पाद में कहा गया है :
पुरुषार्थशून्यानां गुणानां प्रतिप्रसवः कैवल्यं स्वरूप-प्रतिष्ठा वा चितिशक्तिरिति। (सूत्र 33)
[जब सभी गुणों-- सत्व, रज और तम का पुरुषार्थ (कार्य) समाप्त हो जाता है और उससे जो स्थिति उत्पन्न होती है वही सभी विकारों से रहित स्थिति कैवल्य है। अथवा अपने स्वरूप (शुद्ध ज्ञानरूप) में प्रतिष्ठा (सम्यक् स्थिति) कैवल्य है।]
कैवल्यसार
वीरशैव मत का पन्द्रहवीं शती में रचित एक ग्रन्थ। इसके रचयिता मरितोण्टदार्य नामक आचार्य हैं।
कैवल्योपनिषद्
एक शैव उपनिषद्, जो अथर्वशिरस् उपनिषद् की ही समकालीन है।
कोकिलाव्रत
मुख्यतः महिलाओं के लिए इस व्रत का विधान है। आश्विन पूर्णिमा की सन्ध्या को इसका संकल्प करना चाहिए, आषाढ़ी पूर्णिमा के पश्चात् एक मास तक सुवर्ण अथवा तिलों की कोकिला के रूप में गौरी बनाकर उसका पूजन करना चाहिए। एक मास तक नक्त भोजन का विधान है। मासान्त में एक ताम्रपात्र में रत्नों की आँखे, चाँदी की चोंच तथा पैर बनवाकर कोकिला का दान करना चाहिए। ऐसा कहा जाता है कि भगवान् शिव ने दक्ष के यज्ञ का विध्वंस करने के बाद गौरी को कोकिला हो जाने का शाप दिया था। सुवर्ण की एक कोकला बनाकर, जिसकी आँखे मोतियों की हों तथा पैर चाँदी के हों, षोडशोपचारपूर्वक पूजन करना चाहिए। सुख, समृद्धि के लिए यह व्रत वांछनीय है। तमिलनाडु के पंचाङ्गों में इसका अनुष्ठान ज्येष्ठ 14 (मिथुन) को बतलाया गया है।