प्रतिवर्ती निषेधाधिकार संयुक्त राज्य अमेरिका में जब राष्ट्रपति द्वारा प्रयुक्त निषेधाधिकार को कांग्रेस दो-तिहाई बहुमत से निरस्त कर देती है तो इसे `प्रतिवर्ती निषेधाधिकार` कहा जाता है। भारत के संविधान के अनुसार संसद् के साधारण बहुमत से ही राष्ट्रपति के निषेधाधिकार को निरस्त किया जा सकता है। तथापि भारत में राष्ट्रपति का निषेधाधिकार केवल सैद्धांतिक है और इस बात का प्रमाण यह है कि आज तक इस अधिकार का प्रयोग नहीं हुआ है।
Revisionism
संशोधनवाद मार्क्स के देहावसान के उपरांत यूरोप में अनेक विचारकों ने, जिनमें बर्नस्टाइन का नाम सर्वाधिक विख्यात है, मार्क्सवाद को मानवतावादी बनाने और प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र से उसका समन्वय करने के उद्देश्य से उसमें संशोधन के प्रस्ताव किए। इन विचारकों को संशोधनवादी और उनके दर्शन को `संशोधनवाद` कहा गया। आगे चलकर, लेनिन और स्टालिन ने सोवियत संघ में मार्क्सवाद को जो स्वरूप प्रदान किया उसे विशुद्ध मार्क्सवाद कहा जाने लगा और उससे हटकर अथवा उसमें शिथिलता उदार परिवर्तन लाने के प्रत्येक प्रयास को `संशोधनवाद` कहा जाने लगा। इसके बाद चीन में माओ के विचारों को विशुद्ध मार्क्सवाद और खुश्चेव के उपरांत सोवियत संघ में आनेवाले सुधारों को `संशोधनवाद` की संज्ञा दी जाने लगी। इस प्रकार `संशोधनवाद` एक स्थिर अवधारणा न होकर सापेक्ष संकल्पना है।
Revolutionary junta
क्रांतिकारी परिषद, क्रांतिकारी गुट किसी देश में सैनिक विप्लव अथवा क्रांति के समय विद्रोहकारियों का नेतृत्व एवं संचालन करने वाल गुट। इस पद का प्रयोग प्रायः दक्षिण अमेरिकी गणराज्यों में समय-समय पर होने वाली सैन्य क्रांतियों का संचालन करने वाली परिषद के लिए किया जाता रहा है।
Revolution of rising expectations
बढ़ती आकांक्षाओं की क्रांति तीसरी दुनिया के विकासशील देशों में औद्योगीकरण तथा आधुनिकरण के फलस्वरूप जीवन-स्तर में सुधार और राजनीतिक व्यवस्था में जनता की भागीदारी से जनमानस में आकांक्षाओं की बाढ़-सी आने लगी। आकांक्षाओं की संख्या और इनके बढ़ने की गति और तीव्रता इतनी अधिक थी कि इस स्थिति को `बढ़ती आकांक्षाओं की क्रांति` कहा जाने लगा। वर्तमान शताब्दी के छठे और सातवें दशक में यही स्थिति थी। इस पद का प्रयोग सबसे पहले बारबरा वार्ड ने किया था।
Right of dissolution
विघटन का अधिकार संसदीय शासन-प्रणाली में संसद के जननिर्वाचित अथवा निचले सदन का विघटन उसकी कार्यावधि पूरी होने से पहले भी किया जा सकता है। यह राज्याध्यक्ष का संवैधानिक अधिकार है। प्राय: इसका प्रयोग प्रधानमंत्री की सिफारिश पर किया जाता है। इस संबंध में दो प्रश्न अभी भी विवादग्रस्त हैं :- (1) क्या प्रधानमंत्री की सिफारिश के बावजूद राज्याध्यक्ष संसद का विघटन करना अस्वीकार कर सकता है ? (2) क्या राज्याध्यक्ष किन्हीं परिस्थितियों में, बिना प्रधानमंत्री की सिफारिश के, स्वेच्छा से सदन का विघटन कर सकता है ? संसदीय परंपरा के अनुसार यदि संसद में प्रधानमंत्री का पक्ष स्पष्ट बहुमत में हो तो राज्याध्यक्ष के सामने प्रधानमंत्री की विघटन संबंधी सिफारिश को मानने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाता।
Right of expropriation
स्वामित्वहरण का अधिकार, विसंपत्तिकरण अधिकार सरकार का वह अधिकार जिसके अंतर्गत वह विदेशी स्वामित्व वाली सम्पत्ति को हस्तगत कर उसे अपने स्वामित्व में ले सकती है। ऐसा केवल राष्ट्रीय हित में ही किया जा सकता है और अंतर्राष्ट्रीय विधि के अनुसार इसके लिए उसके मूल स्वामी को उचित मुआवज़ा दिया जाना चाहिए।
Right of innocent passage
निर्दोष गमन का अधिकार अंतर्राष्ट्रीय विधि का यह एक सुस्थापित नियम है कि विदेशी भूभागीय समुद्र से राज्यों के जलपोत एवं युद्धपोत, युद्ध एवं शांतिकाल में बिना तटवर्ती राज्य की अनुमति के आ-जा सकते हैं। शर्त केवल यह है कि यह आवागमन तटवर्ती राज्य की शांति और सुरक्षा के लिए संकटमय न हो। युद्धकाल में तटवर्ती राज्य इस निर्दोष आवागमन को सीमित एवं नियमित कर सकते हैं परंतु इसके लिए बनाए गए नियम सभी युद्धकारियों पर समान रूप से लागू किए जाने चाहिएँ।
Right of interpellation
प्रश्न पूछने का अधिकार किसी विधान मंडल के सदस्यों का कार्यपालिका के सदस्यों से प्रश्न पूछने का अधिकार। इस प्रकार, यह भी कार्यपालिका पर संसदीय नियंत्रण का एक साधन है।
Right of resistance
प्रतिरोध-अधिकार ऐतिहासिक दृष्टि से, सभी युगों में व्यक्तियों ने अपने विवेक और चेतना के आधार पर स्थापित सत्ता का विरोध करने का दावा किया है। इस अधिकार का प्रायः आदर किया जाता रहा है। किंतु ऐसे उदाहरण भी मिलते हैं जहाँ विरोधी को राज्य में उत्पीड़न और यहाँ तक कि मृत्युदंड का भी भाजन बनना पड़ा है। वर्तमान काल में यह अधिकार लोकतंत्रात्मक शासन-व्यवस्था का एक लक्षण माना जाता है। यद्यपि यह व्यवस्था जन प्रतिनिधि-मूलक होती है पर फिर भी, नागरिक व्यक्तिगत अथवा सामूहिक रूप से सरकार के अनुचित, दमनकारी अथवा अन्यायपूर्ण कामों का शांतिमय उपायों से विरोध कर सकने का दावा करते हैं। इसे `प्रतिरोध करने का अधिकार` कहा जाता है। प्रतिरोध के अनेक रूप हो सकते हैं जैसे, प्रदर्शन, अनशन, सविनय अवज्ञा आदि। यह विवादग्रस्त है कि अधिकारियों का घेराव और उन पर दबाव या उनके प्रति अभद्र व्यवहार कहाँ तक प्रतिरोध के अधिकार की सीमा में आते हैं।
Right of visit, search and capture
निरीक्षण, तलाशी एवं प्रग्रहण का अधिकार युद्ध के दौरान महासमुद्र में तटस्थ जलपोतों को रोककर उनके निरीक्षण का अधिकार युद्धकारियों को होता है। यदि निरीक्षण मात्र से संतुष्टि न हो तो जलपोत की तलाशी ली जा सकती है और विनिषिद्ध सामग्री पाए जाने पर उसका तुरंत प्रग्रहण कर जलपोत को अंतिम निर्णय के लिए निकटस्थ नौजित माल न्यायालय (प्राइज़ कोर्ट) के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है। निरीक्षण, तलाशी और प्रग्रहण अंतर्राष्ट्रीय विधि के अंतर्गत युद्धकारियों के सुस्थापित अधिकार हैं।