धार्मिक क्रिया सम्पन्न करनेवाला व्यक्ति। इसका सांकेतिक रूप किसी कर्म को समाप्त करना है। मनुस्मृति (5.99) के अनुसार :
सांख्यदर्शन के अनुसार पुरुष और प्रकृत के पार्थक्य की स्थिति 'कैवल्य' कहलाती है। इस स्थिति में रहनेवाला मुक्त आत्मा 'केवल' कहलाता है। जैन धर्म में जिसे शुद्ध (केवल) ज्ञान प्राप्त हो गया हो, ऐसे जिन विशेष को 'केवली' कहा जाता है।
हठयोगदीपिका (2.71) के अनुसार 'केवल' कुमम्भक का एक भेद है :
[प्राणायाम तीन प्रकार का कहा गया है: रेचक, पूरक और कुम्भक। कुम्भक भी दो प्रकार का माना गया है : सहित और केवल।]
केश
धार्मिक आज्ञानुसार सिक्खों के धारण करने के पाँच उपादनों में पहला केश है। ये कभी कटाये नहीं जाते। पाँच उपादान पाँच 'ककार' (क वर्ण से प्रारम्भ होने वाले शब्द) कहलाते हैं : केश, कृपाण, कड़ा, कच्छ और कंघा। पूर्ण केश रखने की प्रथा को दशम गुरु गोविन्दसिंह ने प्रारम्भ किया था। खालसा सिक्खों का यह प्रमुख चिह्न है, जो नानकपंथियों से उनको पृथक् करता है।
केशव
विष्णु का एक नाम। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार की गयी है : 'क (जल) में जो सोता है (के जले शेते इति)।' भागवत पुराण के अनुसार परब्रह्मशक्ति को ही केशव कहा गया है: 'ब्रह्म-विष्णु-रुद्र-संज्ञाः शक्तयः केशसंज्ञिताः।' सुन्दर लम्बे केश (बाल) रखने के कारण भी विष्णु को केशव कहते हैं। अथवा केशव ब्रह्मा, ईश रुद्र इन दोनों को अपने स्वरूप में लीन कर जो परमात्मा रूप से एक मात्र अवस्थित रहता है वह 'केशव' है। हरिवंश पुराण (80.66) के अनुसार केशी नामक असुर का वध करने के कारण विष्णु का नाम केशव पड़ा (केशं केशिनं वाति हन्ति इति) :
निम्बार्कों का इतिहास 1350 ई० से 1500 ई० तक अज्ञात है। किन्तु 1500 से इसका पुनरुन्मेष होता है। इसके आचार्य दो प्रकार के हुए : गृहस्थ तथा संन्यासी। इन आचार्यों में केशव काश्मीरी का नाम सर्वप्रमुख रूप से आता है। पुनर्विकासकाल के आरम्भिक नेताओं का युग्म केशव काश्मीरी (निम्बार्कों में अग्रणी) तथा उनके भगिनीपति हरिव्यास देव (निम्बार्कों के अन्य नेता) का था। ये कृष्णचैतन्य एवं वल्लभाचार्य के समकालीन थे। केशव काश्मीरी प्रसिद्ध तार्किक विद्वान् एवं निम्बार्कदर्शन के भाष्यकार थे। उपासना के क्षेत्र में उनकी 'क्रमदीपिका' की विशेष प्रतिष्ठा है जो विशेषकर गौतमीय तन्त्र के आधार पर निर्मित हुई है।
केशवचन्द्र सेन
भारतीय पुनर्जागरण के आन्दोलन में `ब्रह्मसमाज` का महत्वपूर्ण स्थान है। यह आन्दोलन 1828 ई० में राजा राममोहन राय द्वारा आरम्भ हुआ। आन्दोलन का प्रथम चरण 1841 में समाप्त हुआ। दूसरे चरण के नेता देवेन्द्रनाथ ठाकुर तथा उनके एक नवयुवक सहयोगी केशवचन्द्र सेन थे। दूसरे चरण में समाज काफी प्रगति पर था एवं केशव के सहयोग ने इसे और भी गति दी। ये सम्भ्रान्त वैद्यकुल के व्यक्ति थे तथा इन्होंने आधुनिक उच्च शिक्षा प्राप्त की थी। 1857 ई० में समाज की सदस्यता ग्रहण कर 1859 से इन्होंने अपनी सम्पूर्ण प्रतिभा समाजोन्नति में लगाना आरम्भ किया। देवेन्द्रनाथ ठाकुर इन्हें बहुत पसन्द करते थे। पाँच वर्ष तक दोनों ने साथ-साथ कार्य किया। इसी समय `ब्राह्म विद्यालय` खोला गया जिसमें केशवचन्द्र ने अंग्रेजी में तथा देवेन्द्रनाथ ने मातृभाषा में अपने सिद्धान्तों को समझाया। इसके फलस्वरूप अनेक नवयुवक समाज में सम्मिलित हुए। इस बीच केशव ने `बैंक आफ बंगाल` में नौकरी कर ली किन्तु उसे उन्होंने 1861 में त्याग दिया तथा अपना संपूर्ण समय समाज के लिए देने लगे। `संगति सभा` के अनेक अनुयायियों ने केशव का अनुगमन किया, जिनमें प्रतापचन्द्र मजुमदार प्रधान थे। एक पत्रिका `इण्डियन मिरर` निकाली जाने लगी।
1862 ई० में देवेन्द्रनाथ ने केशवचन्द्र को नया सम्मान दिया। समाज के आचार्य केवल ब्राह्मण हुआ करते थे। देवेन्द्रनाथ स्वयं समाज के आचार्य थे एवं दो और काम उपाचार्य करने वाले थे। देवेन्द्रनाथ ने केशव को आचार्य पद प्रदान किया।
इस समय केशवचन्द्र ने हिन्दू समाज का विरोध सहन करते हुए अपनी स्त्री को समाजसेवा में लगाया। इससे बड़ा लाभ हुआ। ब्राह्मों ने अपनी स्त्रियों को अधिक स्वाधीनता प्रदान करना आरम्भ किया जो आगे चलकर स्त्रीस्वाधीनता आन्दोलन में बहुत ही सहायक हुआ।
दो वर्ष बाद केशव ने बंबई एवं मद्रास में भी 'ब्रह्मसमाज' की स्थापना करायी। जब केशव यात्रा पर थे तभी देवेन्द्रनाथ को कुछ प्राचीन विचारों ने प्रभावित किया तथा उन्होंने केशव के स्थान पर उपाचार्यों को कार्य करने की अनुमति दे दी। केशव के दल ने इसका विरोध किया और इस प्रकार दो समाजों की स्थापना हुई। देवेन्द्रनाथ का समाज 'आदिसमाज' तथा केशव का 'नव ब्रह्मसमाज' कहलाया।
यहाँ से समाज का तीसरा चरण या युग आरम्भ होता है। देवेन्द्रनाथ का साथ छूट जाने पर केशवचन्द्र ने ईश्वर पर भरोसा रखा तथा उन्हें नयी प्रेरणा व स्फूर्ति प्राप्त हुई। उन्होंने अनेक प्रचारक एवं भक्त प्राप्त किये और प्रार्थना में इनको विशेष शान्ति मिली। घर पर ही सदस्यों की भीड़ जमती तथा धार्मिक सेवाओं एवं प्रार्थना में लोग खूब हाथ बटाते। वैष्णव धर्म से, जो इनका पारिवारिक धर्म था, केशव ने इस समय बहुत कुछ लिया। भक्ति, जो हिंदू धर्म में ईश्वरप्रेम एवं उसमें विश्वास का प्रतीक है, इस आन्दोलन का प्रधान अङ्ग बन गयी। 22 अगस्त 1869 को मछुआ बाजार (कलकत्ता) में केशवचन्द्र ने एक भवन बनवाया जिसे मन्दिर की संज्ञा दी गयी। यहाँ अनेकों प्रतिष्ठित लोग आने लगे तथा समाज के सदस्य हुए। मन्दिर के निर्माण के कुछ ही दिन बाद इन्होंने बिलायत की यात्रा की। वहाँ इनका बड़ा सम्मान हुआ। इंगलैण्ड में बहुसंख्यक लोगों के बीच केशव ने भाषण किया। ब्रिटेन की महारानी ने भी इनसे भेंट की। ब्रिटिश क्रिश्चियन होम ने इन्हें सर्वाधिक प्रभावित किया।
कलकत्ता लौटकर केशव ने अनेक प्रकार के सुधार प्रारम्भ किये। एक नया समाज 'इण्डियन रिफार्म एसोसिएशन' बनाया, जिसके पाँच विभाग थे--सस्ता साहित्य, दान, स्त्री विकास, शिक्षा और आत्मनिग्रह। अनेक कार्य और संस्थायें इस समय प्रारम्भ की गईं, यथा
नार्मल स्कूल फार गर्ल्स, विक्टोरिया इन्स्टीट्यूशन फार वीमेंन, इन्डस्ट्रियल स्कूल फार ब्वायेज एवं भारत आश्रम, जिसमें स्त्रियों एवं शिशुओं को शिक्षा दी जाती था।
इस समय तक केशव अपने को ईश्वर के आदेश लोगों तक पहुँचानेवाला समझने लगे तथा दूसरों को उन्होंने आदेश देना आरम्भ किया। अतएव समाज के अन्दर केशव का विरोध आरम्भ हो गया। फिर एक बार केशव के जीवन में उदासी आयी, किन्तु ईश्वराराधना में लीन हो इन्होंने सब भुला दिया। केशव ने मृत्यु के पहले फिर एक बार पश्चिम की यात्रा की। इनके अन्तिम समय तक 173 ब्रह्मसमाज की शाखाएँ हो गया थीं, 1500 पक्के सदस्य तथा 500 अनुयायी थे। इनके द्वारा संचालित आन्दोलन ने बंगाल में सुधार और नवजीवन की एक लहर सी फैला दी।
केशवप्रयाग
माणा ग्राम के पास अलकनन्दा में जहाँ सरस्वती की धारा मिलती है उस स्थान को केशवप्रयाग कहते हैं। उत्तराखण्ड के तीर्थों में यह प्रसिद्ध है।
केशव भट्ट
निम्बार्काचार्य की परंपरा के उत्तरार्द्ध में उनके दो शिष्य बहुत प्रसिद्ध हुए; एक केशव भट्ट तथा दूसरे हरिव्यास। इन्हीं दो शिष्यों से दो श्रेणियाँ निकली हैं। गृहस्थ और संन्यासी जो आपसी भेदों के होते हुए भी बड़े आदृत थे। दे० 'केशव काश्मीरी'।
केशव मिश्र
न्यायवैशेषिक दर्शन के आचार्य। इनका उदयकाल 13वीं शती है। इन्होंने तर्कभाषा नामक ग्रन्थ की रचना की है। इसका अंग्रेजी अनुवाद महामहोपाध्याय पं० गंगानाथ झा ने किया।
केशवस्वामी गोपाल
इन्होंने बौधायन श्रौतसूत्र पर भाष्य लिखा है।
केशवाचार्य
निम्बार्काचार्य के शिष्य श्रीनिवास द्वारा कृत ब्रह्मसूत्रभाष्य के व्याख्याता। ये पन्द्रहवीं शती में हुए थे और चैतन्य महाप्रभु के समय में जीवित थे। निम्बार्काचार्य के 'वेदान्तपरिजातसौरभ' का भाष्य 'वेदान्तकौस्तुभ' नाम से श्रीनिवासाचार्य ने लिखा और 'वेदान्तकौस्तुभ' की टीका केशवाचार्य ने लिखी। निम्बार्काचार्य की परंपरा में ये अत्यन्त प्रौढ़ विद्वान् माने जाते हैं। दे० 'केशव भट्ट'।