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Hindu Dharmakosh (Hindi-Hindi)

कृष्ण यजुर्वेद
यजुर्वेद का प्राचीन पाठ, जिसमें मन्त्रों के साथ ब्राह्मण भाग भी मिला हुआ है। मन्त्र-ब्राह्मण के पार्थक्य के समझने में दुरुहता होने के कारण इसको कृष्ण यजुर्वेद कहा जाने लगा। इसके पाठविवेचन में याज्ञवल्क्य ऋषि का गुरु से मतभेद हो गया था, तब गुरु ने उनसे अपना वेद उगलवा लिया (छीन लिया)। बाद में याज्ञवल्क्य मन्त्र ब्राह्मण का 'शुक्ल यजुर्वेद' के नाम से अलगाव कर पाये।

कृष्णसार मृग
काली पीठ वाला पुराना हिरन। धर्मशास्त्र के अनुसार ऐसे मृग जिस क्षेत्र में स्वच्छन्द घूमते हैं, वह तपस्या के योग्य पवित्र माना गया है। शिकारियों के क्रूर हिंसाकर्म से बचे रहने पर हिरन काले पड़ जाते हैं, अतः ऐसा निष्पाप स्थान शुद्ध समझा जाता है।

कृष्णा
कालिन्दी या यमुना नदी का एक नाम पाण्डवों की पत्नी द्रौपदी का नाम भी कृष्णा है। काली देवी भी कृष्णा कही जाती है।

कृष्णा नदी
दक्षिण भारत की पुण्यसलिला नदी। इसके पर्याय हैं कृष्णवेण्या, कृष्णगङ्गा आदि। महाभारत (6.9.33) में इसका निम्नाङ्कित उल्लेख है :
सदा निरामयां कृष्णां मन्दगां मन्दवाहिनीम्।
[कृष्ण सदा पवित्र, मन्द गति और मन्द प्रवाह वाली है।] राजनिघण्टु के अनुसार इसके जल के गुण स्वच्छत्व, रुच्यत्व, दीपनत्व तथा पाचकत्व हैं।

केतु
नव ग्रहों में से अन्तिम। इसकी गणना दुष्ट ग्रहों में है। यह राहु (ग्रसने वाले ग्रह) का शरीर (धड़) माना जाता है। ज्योतिषतत्व में इसकी रिष्टि (कुफल) का वर्णन इस प्रकार पाया जाता है :
केतुर्यस्मिन्नृक्षेऽभ्युदितस्तस्मिन् प्रसूयते जन्तुः। रौद्रे सर्पमुहूर्ते वा प्राणैः संत्यजत्याशु।।
[आर्द्रा, आश्लेषा अथवा केतु जिस नक्षत्र में हो, इन नक्षत्रों में जन्म लेने वाले व्यक्ति को प्राणसंकट होता है।] इसके दशाफल का पूर्ण वर्णन केरलीयजातक नामक ग्रन्थ में पाया जाता है। दूससंचारी धूमकेतु नामक उपग्रह भी केतु कहे गये हैं। ज्योतिष ग्रन्थों के केतुचाराध्याय में उनकी गति औऱ क्रूर फल का विस्तृत वर्णन मिलता है। दे० गर्गसंहिता, बृहत्संहिता आदि ग्रन्थ। आधुनिक ग्रन्थकारों में मथुरानाथ विद्यालङ्कार ने अपने समयामृत नामक ग्रन्थ में केतु के उत्पातों का सविस्तार विवरण किया है।
ऋग्वेद (10.8.1) में सूर्य और उसकी रश्मियों के लिए 'केतु' शब्द का प्रयोग हुआ है (देवं वहन्ति केतवः)।

केदार-गौरीव्रत
कार्तिकी अमावस्या के दिन इस व्रत का अनुष्ठान होता है। इस तिथि को गौरी तथा केदार शिव के पूजन का विधान है। 'अहल्याकामधेनु' के अनुसार यह व्रत दाक्षिणात्यों में विशेष प्रसिद्ध है। इस ग्रन्थ में पद्मपुराण से एक कथा भी उद्धृत की गयी है।

केदारनाथ
शिव का एक पर्याय। इसकी व्युत्पत्ति इस प्रकार बतायी गयी : 'के' (मस्तक में) 'दारा' (जटा के भीतर गङ्गारुपिणी पत्नी) हैं जिनकी। केदारनाथ एक तीर्थ भी है जो उत्तराखण्ड के शैव तीर्थों में यह अत्यन्त पवित्र माना गया है। इसके लिए यात्रा प्रारम्भ करने मात्र से सब पापों का क्षय हो जाता है।
हठयोग में भ्रूमध्य के स्थानविशेष को केदार कहा गया है। हठयोगदीपिका (3.24) में कथन है :
कालपाशमहाबन्दविमोचनविचक्षणः। त्रिवेणीसङ्गमं धत्ते केदारं प्रापयेन्मनः।। इस टीका में स्पष्ट किया गया है :
दोनों भौंहों के बीच में शिव का स्थान है। वह केदार शब्द से वाच्य है। उसी पर अपना मन केन्द्रित करना चाहिए।
वीर शैवमत की व्यवस्था के अन्तर्गत प्रारम्भिक पाँच मठ मुख्य थे। इनमें केदारनाथ (हिमालय प्रदेश) का स्थान प्रथम है। इसके प्रथम महन्त एकोरामाराध्य कहे जाते हैं। भक्तों का विश्वास है कि श्री केदारजी के रामनाथ लिङ्ग से, जो भगवान् शिव के अघोर रूप हैं, एकोरामाराध्य प्रकट हुए थे।
उत्तराखण्ड का केदारेश्वर मठ बहुत प्राचीन है। इसकी प्राचीनता का महत्त्वपूर्ण प्रमाण एक ताम्रशासनपत्र से होता है जो उसी मठ में कही सुरक्षित है। इसके अनुसार महाराज जनमेजय के राजत्व काल में स्वामी आनन्दलिङ्ग जङ्गम इस मठ के गुरु थे। उन्हीं के नाम जनमेजय ने क्षीरगङ्गा, स्वर्गद्वारगङ्गा, सरस्वती और मन्दाकिनी के सङ्गम के बीच के भूक्षेत्र का दान इस उद्देश्य से किया कि आनन्दलिङ्ग जङ्गम के शिष्य केदारक्षेत्रवासी ज्ञानलिङ्ग जङ्गम इसकी आय से भगवान् केदारेश्वर की पूजा-अर्चा किया करें। अभिलेख के अनुसार यह दान उन्होंने मार्गशीर्ष अमावस्या सोमवार को युधिष्ठिर के राज्यारोहण के नवासी वर्ष बीतने पर प्लवङ्गम नामक संवत्सर में किया था। भूतपूर्व टीहरी राज्य के राजा इस पीठ के शिष्य हैं और भारत के तेरह नरेश (जिनमें नेपाल, कश्मीर और उदयपुर भी हैं) प्रति वर्ष अपनी ओर से पूजा और भेंट करते रहे हैं। इस मठ के अधीन अनेक शाखामठ हैं।

केनोपनिषद्
सामवेदीय उपनिषद् ग्रन्थों में छान्दोग्य एवं केनोपनिषद् प्रसिद्ध हैं। इस उपनिषद् का दूसरा नाम तलवकार है। यह तलवकार ब्राह्मण के अन्तर्गत है। कहा जाता है कि डाक्टर वारनेल ने तंजौर में इस तलवकार ब्राह्मण ग्रन्थ को पाया था। इसके 135 से लेकर 145वें खण्ड तक को 'तलवकार उपनिषद्' अथवा 'केनोपनिषद्' माना जाता है। छान्दोग्य एवं केन पर शङ्कराचार्य के भाष्य हैं तथा अन्य आचार्यों ने अनेक वृत्तियाँ और टीकाएँ लिखी हैं। उपनिषद् का 'केन' नाम इसलिए पड़ा कि इसका प्रारम्भ 'केन' (किसके द्वारा) शब्द से होता है। इसमें उस सत्ता का अन्वेषण किया गया है जिसके द्वारा सम्पूर्ण विश्व का धारण और सञ्चालन होता है।

केरलोत्पत्ति
शङ्कर के आविर्भावकाल के निर्णायक प्रमाण ग्रन्थों में केरलोत्पत्ति का भी एक प्रमुख स्थान है। इसके अनुसार शङ्कर का कलिवर्ष 3057 में आविर्भाव हुआ। शङ्कर का जीवनकाल भी इसमें 32 वर्ष के स्थान पर 38 वर्ष लिखा है। किन्तु यह परम्परा प्रामाणिक नहीं जान पड़ती। आचार्य शङ्कर की प्राचीनता प्रदर्शित करने के लिए यह मत प्रचलित किया गया लगता है।

केरेय पद्मरस
कन्‍नड़ वीरशैव साहित्‍य में पद्मराज नामक पुराण का स्‍थान महत्‍त्‍वपूर्ण है। इसमें 'केरेय पद्मरस' की कथा लिखी गई है। इस पुराण की रचना सन् 1385 ई. में पद्मनाङ्क ने की थी।


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