निम्बार्काचार्य द्वारा रचित एक छोटा स्तोत्र ग्रन्थ। यह निम्बार्कसम्प्रदाय में बहुत लोकप्रिय है। किन्तु यह निश्चित नहीं है कि यह आद्य आचार्य की रचना है या बाद के किसी आचार्य की।
कृष्णानन्द
तैत्तिरीयोपनिषद् पर अनेक भाष्य और वृत्तियाँ हैं। कृष्णानन्द स्वामी की भी एक वृत्ति इस पर है।
कृष्णानन्द वागीश
शाक्त साहित्य के उन्नीसवीं शती के प्रमुख आचार्य। इन्होंने 'तन्त्रसार' नामक ग्रन्थ की रचना की है।
कृष्णामृतमहार्णव
मध्वाचार्य रचित एक ग्रन्थ। इसकी एक टीका आचार्य श्रीनिवास तीर्थ ने 18 वीं शती में लिखी है।
कृष्णार्चनदीपिका
सोलहवीं शती में चैतन्यमत के प्रसिद्ध आचार्य जीव गोस्वामी द्वारा विरचित ग्रन्थ। इसमें श्री कृष्ण की सेवा-पूजा का विधान भली भाँति वर्णित है।
कृष्णालङ्कार
अप्पय दीक्षित कृत 'सिद्धान्तलेश' पर अच्युत कृष्णानन्दतीर्थ कृत टीका। टीका की रचना में इन्हें अद्भुत सफलता प्राप्त हुई है।
कृष्णावतार
दे० 'कृष्ण' तथा 'कृष्ण-बलरामावतार'।
कृष्णाष्टमीव्रत
मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। एक वर्षपर्यन्त इसका आचरण होना चाहिए। शिव इसके देवता हैं। प्रत्येक मास में भगवान् शिव का भिन्न-भिन्न नामों से पूजन तथा प्रत्येक मास में भिन्न-भिन्न नैवेद्य पदार्थों का अर्पण करना चाहिए।
कृष्णोपनिषद्
एक परवर्ती उपनिषद्, जिसमें कृष्ण का दार्शनिक रूप व्याख्यात हुआ है। वैष्णव सम्प्रदाय में इसका विशेष आदर है।
कृष्णपिङ्गला
दुर्गा का एक पर्याय (कृष्ण-पिङ्गल वर्ण युक्ता)। कहीं-कहीं शिव को भी कृष्ण-पिङ्गल रूप में सम्बोधित किया गया है :