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Hindu Dharmakosh (Hindi-Hindi)

कृष्णदेव
विजयनगर के एक यशस्वी राजा (1509-29 ई०)। ये विद्या और कला के प्रसिद्ध आश्रयदाता थे। इनके समय में दक्षिण में हिन्दू धर्म का पुनरुत्थान हुआ। इनके राजपण्डितों ने कर्ममीमांसा का उद्धार किया, वेदों का भाष्य लिखा एवं दर्शन तथा स्मृतियों का संग्रह किया। इनकी राजसभा के दो महान् आचार्य थे दो भाई सायण (वेदों के प्रसिद्ध भाष्यकार) और माधव (दार्शनिक तथा धर्मशास्त्री)।

कृष्ण द्वैपायन
वेदान्त दर्शन अथवा ब्रह्मसूत्र के मान्य लेखक बादरायण थे। भारतीय परम्परा इन्हें वेदव्यास तथा कृष्ण द्वैपायन भी कहती है। किन्तु इनके जीवन के बारे में विशेष कुछ ज्ञात नहीं है। महाभारत के अनुसार ये ऋषि पराशर तथा धीवरकन्या सत्यवती से उत्पन्न हुए थे। माता ने संकोचवश इनको एक द्वीप में रख दिया था, जहाँ इनका पालन-पोषण हुआ। इसीलिए ये द्वैपायन (द्वीप में पालित) कहलाये। भारतीय परम्परा के अनुसार ये वैदिक संहिताओं के संकलनकर्त्ता एवं सम्पादक एवं अठारह पुराणों तथा महाभारत के रचयिता थे। भारतीय साहित्य के इतिहास में इनका स्थान अद्वितीय है। इनके ग्रन्थ परवर्ती भारतीय साहित्य के उपजीव्य हैं। दे० 'व्यास'।

कृष्णदोलोत्सव
चैत्र शुक्ल पक्ष की एकादशी को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। भगवान् कृष्ण की प्रतिमा (लक्ष्मी सहित) किसी झूले में विराजमान करके उसका दमनक नामक पत्तियों से पूजन करना चाहिए। रात्रि में जागरण का विधान है। दे० स्मृतिकौस्तुभ, 101।

कृष्णध्यानपद्धति
अप्पय दीक्षित कृत 'कृष्णध्यानपद्धति' एवं उसकी व्याख्या एक उत्कृष्ट रचना है। यह वैष्णवों में अति प्रिय और प्रसिद्ध ग्रन्थ है।

कृष्णप्रेमामृत
वल्लभ संप्रदाय का एक मान्य ग्रन्थ। इसका निर्माणकाल 1531 ई० के लगभग है। विट्ठलनाथजी ने इसकी रचना की थी। अत्यन्त ललित छन्दों में कृष्ण भक्ति की अभिव्यक्ति इसमें की गयी है।

कृष्ण-बलरामावतार
भगवान् विष्णु का कृष्णावतार अष्टम पूर्णावतार के रूप में माना जाता है। कहा भी गया है: 'एते चांशकलाः पुंसः कृष्णस्तु भगवान् स्वयम्।' सभी अवतार अंशावतार हैं, किन्तु कृष्ण-अवतार पूर्णावतार होने के कारण साक्षात् भगवत्स्वरूप है। कृष्ण के अवतार के साथ उनके बड़े भाई बलराम अंशावतार के रूप में अवतरित हुए थे।
बलराम और कृष्ण की उत्पत्ति के पूर्व पृथ्वी असुर-भार से पीड़ित होकर गौ के रूप में रोती हुई ब्रह्मा के पास गयी एवं ब्रह्मादि सभी देवताओं ने मिलकर पृथ्वी की रक्षा के लिए भगवान् की प्रार्थना की। उस समय कंस एवं जरासन्ध आदि बलवान् असुरों से संसार पीड़ित था। धर्म पतन की ओर जा रहा है। दूसरी ओर दुर्योधन आदि कौरववंशीय राजाओं के अत्याचारों से राजा और प्रजा दोनों में ही भयंकर पापवृद्धि हो रही थी। इधर शिशुपाल, दन्तवक्र, के द्वारा भी संसार अत्यधिक पीड़ित था। इस प्रकार इस भयंकर भार से पृथ्वी के उद्धार के लिए तथा धर्मरक्षणार्थ भगवान् का पूर्णावतार हुआ।

कृष्णभट्ट
आपस्तम्ब गृह्यसूत्र पर जिन भाष्यकारों ने भाष्य लिखे हैं उनमें एक कृष्णभट्ट भी हैं।

कृष्णमिश्र
जेजाकभुक्ति के चन्देल राजा कीर्तिवर्मा (1129-1163 ई०) के राजकवि और गुरु। इन्होंने प्रबोधचन्द्रोदय नामक प्रतीकात्मक नाटक की रचना की। जनश्रुति के अनुसार जब कीर्तिवर्मा ने चेदिराज कर्ण पर विजय प्राप्त की तो युद्ध में रक्तपात देखकर उसके मन में वैराग्य उत्पन्न हुआ। उसी समय कृष्णमिश्र ने कीर्तिवर्मा के मनोरञ्जन के लिए बड़ी पटुता से इस नाटक की रचना की। यह दार्शनिक नाटक है और इसमें अद्वैत वेदान्त के सिद्धान्तों का प्रतिपादन किया गया है। इसकी शैली रूपकात्मक है। इसके पात्र विवेक, प्रबोध, साधन और उनके विरोधी मनोविकार हैं। इसमें दर्शाया गया है कि किस प्रकार मानव सांसारिक विकारों और प्रपञ्चों से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त कर सकता है। इसमें विरोधी मतों और पाखण्डों का खण्डन किया गया है। दे० प्रबोध चन्द्रोदय।

कृष्णलीलाभ्युदय
भागवत पुराण के दशम स्कन्ध का यह कन्नड़ अनुवाद 1590 ई० के लगभग वेङ्कट आर्य नामक एक आचार्य ने किया था। यह कर्णाटक में उसी प्रकार लोकप्रिय है, जिस प्रकार हिन्दी क्षेत्र में प्रेमसागर और सुखसागर।

कृष्णषष्ठी
(1) मार्गशीर्ष कृष्ण षष्ठी को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। एक वर्षपर्यन्त इसका आचरण करना चाहिए। सूर्य का प्रत्येक मास में भिन्न-भिन्न नामों से पूजन होना चाहिए।
(2) मास के दोनों पक्षों की षष्ठी को एक वर्षपर्यन्त इस व्रत का अनुष्ठान होना चाहिए। नक्त भोजन करना चाहिए तथा स्वामी कार्तिकेय को अर्घ्‍य देना चाहिए।


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