प्रजातिवादी वे लोग जो अपनी प्रजाति को अन्य प्रजातियों से श्रेष्ठ मानकर अन्य प्रजातियों को हीन भावना की दृष्टि से देखते है और राज्य की सब सुख-सुविधाओं से इनको वंचित करना चाहते हैं। इसके पीछे मुख्य उद्देश्य राज्य की राजनीतिक, सामाजिक एवं आर्थिक व्यवस्था पर अपनी प्रजाति का वर्चस्व बनाए रखना है। इसके सर्वश्रेष्ठ उदाहरण हैं जर्मनी के हिटलर और दक्षिण अफ्रीका के बोथा।
Radical humanism
उग्र मानवतावाद इस विचारधारा के प्रणेता प्रसिद्ध भारतीय क्रांतिकारी मानवेंद्र नाथ राय थे। ये प्रारंभ में अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन से जुड़े हुए थे परंतु कालांतर में अंतर्राष्ट्रीय साम्यवादी आंदोलन से जुड़े हुए थे परंतु कालांतर में साम्यवाद की अधिनायकवादी व्यवस्था से असंतुष्ट होकर इन्होंने एक नई विचारधारा को जन्म दिया जिसका लक्ष्य समाजवाद और मानवतावाद का समन्वय करना था। मानवेंद्र नाथ राय ने इसे `उग्र मानवतावाद` का नाम दिया। इस दशक में साम्यवादी राज्यों में होने वाली उथल-पुथल श्री राय की दूरदर्शिता को प्रमाणित करती है।
Rajya Sabha
राज्य सभा भारतीय संसद का उच्च सदन जिसमें अधिक से अधिक 250 सदस्य हो सकते हैं। इनमें से 12 सदस्य राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत किए जाते हैं और शेष राज्य की विधान सभाओं द्वारा निर्वाचित किए जाते हैं। प्रत्येक सदस्य का कार्यकाल 6 वर्ष होता है। प्रत्येक दो वर्ष के पश्चात् इसके एक-तिहाई सदस्य पदनिवृत्त होते हैं और उनके स्थान पर नए सदस्य निर्वाचित किए जाते हैं। भारत का उपराष्ट्रपति राज्य सभा का पदेन सभापति होता है। विधायी और वित्तीय मामलों में यह सदन लोक सभा की अपेक्षा दुर्बल है परंतु संविधान-संशोधन में इसकी स्थिति लोक सभा के समान है। इसके सदस्य राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के निर्वाचनों में भी भाग लेते हैं। इसे कई ऐसे अधिकार प्राप्त हैं जो लोक सभा को नहीं है अतः एक दुर्बल सदन होते हुए भी यह इंग्लैंड की लार्ड सभा से कहीं अधिक शक्तिशाली है।
Realpolitic
शक्तिपरक राजनीति, यथार्थपरक राजनीति यथार्थवाद पर आधारित राजनीति। चूँकि राजनीति का केंद्र बिंदु शक्ति है अतः यह राजनीति शक्ति संचय व शक्तिप्रसार को राज्य का प्रधान लक्ष्य मानती है। इसके प्रणेता जर्मन विचारक हॉकशॉफर थे।
Real union
वास्तविक संघ ऐसी स्थिति जब दो या दो से अधिक राज्य अपनी आंतरिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए एक दूसरे से मिल जाएँ और अंतर्राष्ट्रीय मामलों में एक इकाई बन जाएँ।
Real will
आदर्श इच्छा इस पद का प्रयोग आदर्शवादी विचारकों (रूसो, बोसांके) के दर्शन में मिलता है। रूसो के अनुसार मनुष्य में दो प्रकार की इच्छाएँ होती हैं :- (1) आदर्श इच्छा, और (2) यथार्थ इच्छा। `आदर्श इच्छा` विवेकपूर्ण और निःस्वार्थ होती है। विवेक पर आधारित होने के कारण यह सभी मनुष्यों में एक समान होती है। अतः सब मनुष्यों की `आदर्श इच्छाओं` के संग्रह से पूरे समाज की सामान्य इच्छा बनती है। `आदर्श इच्छा` के विपरीत `यथार्थ इच्छा` व्यक्तिगत स्वार्थ, लोभ और वासना पर आधारित होती है अतः एक मनुष्य की यथार्थ इच्छा प्रायः दूसरे मनुष्य की यथार्थ इच्छा की प्रतिद्वंद्वी होती है।
Rebellion
विप्लव, बगावत स्थापित राजकीय व्यवस्था के विरुद्ध व्यापक, संगठित एवं सशस्त्र विद्रोह जिसका उद्देश्य वर्तमान व्यवस्था को विस्थापित करना होता है।
Recess appointments
मध्यावकाश नियुक्तियाँ यह पद अमेरिकी संवैधानिक व्यवस्था से संबंधित है। संयुक्त राज्य अमेरिका में राष्ट्रपति द्वारा सभी सर्वोच्च पदों पर नियुक्तियाँ सीनेट के दो-तिहाई बहुमत से संपुष्ट होती है। सीनेट के अधिवेशन में न होने की अवधि में राष्ट्रपति अस्थायी रूप से नियुक्तियाँ कर सकता है जो सीनेट द्वारा संपुष्ट किए जाने तक वैध रहती हैं। ऐसी नियुक्तियों को `मध्यावकाश नियुक्तियों` कहते हैं।
Recognition of absentee government
अन्यत्रवासी सरकार को मान्यता दोनों महायुद्धों में शत्रु के आक्रमण होने पर अनेक यूरोपीय देशों की सरकारें अन्य देशों में शरण लेने को विवश हुईं। स्थानीय राज्यों द्वारा इन्हें अपने-अपने देशों की वैध सरकारों के रूप में मान्यता दी गई। ऐसी सरकारों की मान्यता को `अन्यत्रवासी सरकार को मान्यता` कहा जाता है क्योंकि ये सरकारें अपने देशों की भूमि पर विद्यमान नहीं थीं और न ही अपने देशों के शासन पर इनका कोई तथ्येन नियंत्रण था।
Recongnition of belligerency
युद्धकारिता को मान्यता किसी देश की स्थापित सरकार के विरुद्ध संगठित, व्यापक एवं सशस्त्र विद्रोह होने की अवस्था में विद्रोहकारियों को निम्नालिखित दशाएँ होने पर, अन्य देशों द्वारा युद्धकारियों के रूप में मान्यता दी जा सकती है जिसके फलस्वरूप इन्हें स्वतंत्र राज्यों के समान युद्धकारी अधिकार प्राप्त हो जाते हैं। ये दशाएँ हैं :- 1. विद्रोहकारियों का देश के एक बड़े भाग पर वास्तविक नियंत्रण होना, 2. विद्रोहकारियों का एक सेनाधिपति की अधीनता में सुव्यवस्थित रूप से संगठित होना, 3. इनके द्वारा युद्ध के नियमों का पालन किया जाना, तथा 4. ऐसी दशाएँ उत्पन्न हो जाना कि विदेशों के लिए विद्रोहकारियों के प्रति अपना दृष्टिकोण स्पष्ट करना आवश्यक हो जाए।