विष्णु स्वामी मत के अनुयायी बिल्वमङ्गल द्वारा रचित एक संस्कृत काव्य, जिसके विषय राधा तथा कृष्ण हैं। कानों में अमृत सींचने के समान यह बड़ी मधुर श्रव्य रचना है।
कृष्णचतुर्दशी (शिवरात्रि)
(1) फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। शिव इसके देवता हैं। भगवान् शिव के चौदह नामों के जप का विधान है। चौदह वर्षपर्यन्त इसका आचरण करना चाहिए।
(2) केवल महिलाओं के लिए इसका विधान है। कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को उपवास करना चाहिए। शिव इसके देवता हैं। एक वर्षपर्यन्त इसका आचरण करना चाहिए।
(3) माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को भगवान् शिव की बिल्वपत्रों से पूजा करनी चाहिए। इस दिन भगवान् शङ्कर की प्रतिमा के सम्मुख गृग्गुल जलाना चाहिए।
कृष्णचरित
वैष्णव पुराणों में कृष्ण के विविध चरितों का वर्णन कई दृष्टियों से हुआ है। कृष्ण पूर्णावतार अथवा षोडशकला-अवतार माने गये हैं। अतः इनके जीवन में विविधता और जीवन के सभी वैषम्य समन्वित हैं। कृष्ण का बाह्यतः विरोधात्मक चरित्र बहुतों को भ्रम में डाल देता है। परन्तु इसके मूल में समन्वयात्मक एकता वर्तमान है। अतः इनके भक्तों के लिए वैषम्य प्रतीयमान है; वास्तविक नहीं। कृष्ण के पूर्णावतार में समग्र जीवन का चित्रण है। भागवत और महाभारत में कृष्णचरित का पूरा विकास पाया जाता है।
कृष्ण चैतन्य
सोलहवीं शती के प्रराम्भ में दो नये सम्प्रदाय चैतन्य एवं वल्लभ उत्पन्न हुए। इनमें चैतन्य का मत प्रथम है तथा इसकी शिक्षाएँ तथा अन्य धार्मिक विधियाँ पूर्व के अन्य सम्प्रदायों के समीप हैं।
कृष्ण चैतन्य का बालनाम विश्वम्भर था। ये बङ्गाल के नदिया (नवद्वीप) नामक प्रसिद्ध सांस्कृतिक केन्द्र में उत्पन्न हुए थे। बचपन में ही ये तर्क एवं व्याकरण के ज्ञान के लिए प्रसिद्ध हो गये। 1507 ई० में ईश्वर पुरी (माध्व संन्यासी) से प्रभावित होकर भागवत पुराण में वर्णित भक्ति को इन्होंने अपने जीवन में गम्भीरता से ग्रहण किया। इसके पश्चात् इन्होंने अपना उपदेश आरम्भ किया तथा इनके अनेक शिष्य हो गये, जिनमें अद्वैताचार्य (एक वृद्ध एवं सम्माननीय वैष्णव विद्वान्) एवं नित्यानन्द (जो बहुत दिन तक माध्व थे) उल्लेखनीय हैं। इसी समय इन पर निम्बार्की एवं विष्णुस्वामियों का बड़ा प्रभाव पड़ा तथा ये जयदेव, चण्डीदास एवं विद्यापति के गीतों में आनन्द लेने लगे। इस प्रकार इन्होंने अपने माध्व शिक्षक से विलग होकर राधा को अपने विचार एवं आराधना में प्रधानता दी। ये अधिकांश समय शिष्यों के साथ मिलकर राधा-कृष्ण की स्तुतियाँ (संकीर्तन) गाने में व्यतीत करने लगे। प्रायः ये शिष्यों को लेकर नगर कीर्तन किया करते। ये नये मार्ग आगे चलकर बड़े ही लोकप्रिय सिद्ध हुए।
1509 ई० में इन्होंने केशव भारती से संन्यास की दीक्षा ली एवं 'कृष्ण चैतन्य' नाम धारण किया। फिर उड़ीसा में जगन्नाथमन्दिर, पुरी, चले गये। कुछ वर्षों तक अपना सम्पूर्ण समय उत्तर तथा दक्षिण भारत की यात्रा में बिताया। वृन्दावन इनको बहुत प्रिय था, जो राधा की रासभूमि थी। ये इस समय नवद्वीपवासियों द्वारा कृष्ण के अवतार माने जाने लगे तथा इनका सम्प्रदाय प्रसिद्ध हो गया। 1516 ई० से ये पुरी में रहने लगे। यहाँ पर इनके कई शिष्य हुए। इनमें सार्वभौम, प्रतापरुद्र (उड़ीसा के राजा) तथा रामानन्द राय (प्रतापरुद्र के मन्त्र) प्रसिद्ध हैं। दो बड़े विद्वान् शिष्य इनके और हुए जिन्होंने आगे चलकर चैतन्य सम्प्रदाय के धार्मिक नियमों एवं दर्शनों के स्थापनार्थ ग्रन्थों की रचना की। ये थे रूप एवं सनातन। और भी दूसरे शिष्यों ने की। ये थे रूप एवं सनातन। और भी दूसरे शिष्यों ने राधा-कृष्ण तथा चैतन्य की प्रशंसा में गीत लिखे। इनमें से नरहरि सरकार, वासुदेव घोष एवं वंशीवादन प्रमुख थे।
चैतन्य न तो व्यवस्थापक थे और न लेखक। इनके सम्प्रदाय की व्यवस्था का कार्य सँभाला नित्यानन्द ने तथा धार्मिक एवं दार्शनिक सिद्धान्तों की स्थापना की रूप एवं सनातन ने। इनका कुछ नया सिद्धान्त नहीं था। किन्तु सम्भवतः चैतन्य ने ही मध्व के द्वैत की अपेक्षा निम्बार्क के भेदाभेद को अपने सम्प्रदाय का दर्शन माना। इनके आधार ग्रन्थ थे भागवत पुराण (श्रीधरी व्याख्या सहित), चण्डीदास, जयदेव एवं विद्यापित के गीत, ब्रह्मसंहिता तथा कृष्णकर्णामृत काव्य। लोगों पर इनके प्रभाव का मुख्य कारण था धार्मिक अनुभव, प्रभावशाली भावावेश (जब ये कृष्ण की मूर्ति की ओर देखते तथा उनके प्रेम पर भाषण करते थे) तथा कृष्णभक्ति की संस्पर्शयुक्त एवं हार्दिक प्रशंसा की नयी प्रणाली। राधाकृष्ण की कथा को ही इन्होंने अपनी आराधना का माध्यम बनाया, क्योंकि इनका कहना था कि हमारे पास मनुष्यों का सबसे अधिक हृदय स्पर्श करने वाली कोई और गाथा नहीं है। इनका मत 'गौड़ीय वैष्णव सम्प्रदाय' कहा जाता है। बँगला भाषा में चैतन्य के ऊपर बहुत बड़ा साहित्य विकसित हुआ है, जो जनता में बहुत लोकप्रिय है।
कृष्णजन्मखण्ड
ब्रह्मवैवर्तपुराण का एक अंश। एक स्वतन्त्र ग्रन्थ के रूप में वैष्णवों में इसका बहुत आदर है। निम्बार्क सम्प्रदाय का यह प्रामाणिक ग्रन्थ माना जाता है।
कृष्णजयन्ती
देवताओं के जन्मोत्सव उनकी अवतरण की तिथियों पर मनाये जाते हैं। इनमें रामजयन्ती, कृष्णजयन्ती एवं विनायकजयन्ती (गणेशचतुर्थी) विशेष प्रसिद्ध हैं। कृष्णजयन्ती विष्णु के अवतार के रूप में मनायी जाती है। कृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी को हुआ था। इस दिन भगवान् की मूर्ति को सजाते हैं, झूले पर झुलाते हैं, संकीर्तन व भजन करते एवं व्रत रखते हैं तथा जन्मकाल (12 बजे रात) व्यतीत हो जाने पर प्रसाद ग्रहण करते हैं। इस समय भागवत पुराण का पाठ किया जाता है, जिसमें भगवान् कृष्ण की जन्मकथा वर्णित है।
अर्ध रात्रि में अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र होने पर यह पर्व कृष्णजयन्ती कहा जाता है, इस योग में कुछ बहेरफेर होने पर इसको कृष्णजन्माष्टमी कते हैं।
कृष्णदास कविराज
चैतन्य साहित्यमाला में अति प्रख्यात ग्रन्थ 'चैतन्यचरितामृत' की रचना कृष्णदास कविराज ने वृन्दावन के समीप राधाकुण्ड में सात वर्ष के अनवरत परिश्रम से 1582 ई० में पूरी की थी। इसमें सम्प्रदाय के नेता कृष्णचैतन्य का सम्पूर्ण जीवन बड़ी अच्छी शैली में वर्णित है। दिनेशचन्द्र सेन के शब्दों में 'बँगला भाषा में रचित यह ग्रन्थ चैतन्य तथा उनके अनुयायियों की शिक्षाओं को प्रस्तुत करनेवाला सर्वश्रेष्ठ ग्रन्थ है।'
कृष्णदास (माध्व)
सोलहवीं शती के एक वैष्णव आचार्य। इन्होंने कन्नड़ भाषा में पद्यात्मक रचना की है, जिसका विषय माध्वसम्प्रदाय तथा दर्शन है।
कृष्णदास अधिकारी
वल्लभाचार्य के अष्टछाप साहित्यनिर्माताओं में से एक भक्त कवि। इनका जन्म गुजरात के पाटीदार वंश में सोलहवीं शती के मध्य हुआ था।
वल्लभाचार्य के प्रभावशाली पुत्र गुसाँई विट्ठलनाथजी का संरक्षण और श्रीनाथजी की पूजा-अर्चा का प्रबन्धभार कुछ वर्ष इनके अधीन था। सम्प्रदायसेवा के साथ ही ये भक्तिपूर्ण पदरचना भी करते थे। उत्सवों के समय इन पदों का शास्त्रीय गायन पुष्टिमार्गीय मन्दिरों में अब भी प्रचलित हैं।
कृष्णद्वादशी
आश्विन कृष्ण द्वादशी को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। द्वादशी के दिन उपवास तथा वासुदेव के पूजन का विधान है। वासुदेवद्वादशी के नाम से भी यह प्रसिद्ध है।