मरुत् देवता के एक अस्त्र का नाम। ऋग्वेद में उद्धृत (1.168.6) मरुतों को 'कृति' धारण करने वाला कहा गया है। जिमर ने इस शब्द का अर्थ 'खङ्ग' लगाया है, जिसे युद्ध में धारण किया जाता था। किन्तु इसका कोई प्रमाण नहीं है कि उस समय कृत्ति एक मानवीय अस्त्र था।
कृत्तिवासा
कृत्ति अथवा गजचर्म को वस्त्र के रूप में धारण करने वाले। यह शिव का पर्याय है। स्कन्दपुराण के काशीखण्ड (अध्याय 64) में गजासुरवध तथा शिव के कृत्तिवासत्व की कथा दी हुई है, यथा
महिषासुर का पुत्र गजासुर सर्वत्र अपने बल से उन्मत्त होकर सभी देवताओं का पीडन कर रहा था। यह दुस्सह दानव जिस-जिस दिशा में जाता था वहाँ तुरन्त सभी दिशाओं में भय छा जाता था। ब्रह्मा से वर पाकर वह तीनों लोकों को तृणवत् समझता था। काम से अभिभूत स्त्री-पुरुषों द्वारा यह अवध्य था। इस स्थिति में उस दैत्यपुङ्गव को आता हुआ देखकर त्रिशूलधारी शिव ने मानवों से अवध्य जानकर अपने त्रिशूल से उसका वध किया। त्रिशूल से आहत होकर और अपने को छत्र के समान टँगा हुआ जानकर वह शिव की शरण में गया और बोला-- हे त्रिशूलपाणि! हे देवताओं के स्वामी! मैं आपको कामदेव को भस्म करने वाला जानता हूँ। हे पुरान्तक! आपके हाथों मेरा बध श्रेयस्कर है। कुछ मैं कहना चाहता हूँ। मेरी कामना पूरी करें। हे मृत्युञ्जय! मैं आपके ऊपर स्थित होने के कारण धन्य हूँ। त्रिशूल के अग्र भाग पर स्थित होने के कारण मैं कृतकृत्य और अनुगृहीत हूँ। काल से तो सभी मरते हैं, परन्तु, इस प्रकार की मृत्यु कल्याणकारी है। कृपानिधि शंकर ने हँसते हुए कहा--हे गजासुर! मैं तुम्हारे महान् पौरुष से प्रसन्न हूँ। हे असुर, अपने अनुकूल वर माँगो, तुमको अवश्य दूँगा। उस दैत्य ने शिव से पुनः निवेदन किया, हे दिग्वास! यदि आप मुझ पर प्रसन्न हैं तो मुझे सदा धारण करें। यह मेरी कृति (चर्म) आपकी त्रिशूलाग्नि से पवित्र हो चुकी है। यह अच्छे आकार वाली, स्पर्ष करने में सुखकर औऱ युद्ध में पणीकृत है। हे दिगम्बर! यदि यह मेरी कृत पुण्यवती नहीं होती तो रणाङ्गण में इसका आपके अंग के साथ सम्पर्क कैसे होता? हे शंकर! यदि आप प्रसन्न हैं तो एक दूसरा वर दीजिए। आज के दिन से आपका नाम कृतिवासा हो। उसके वचन को सुनकर शंकर ने कहा, ऐसा ही होगा। भक्ति से निर्मल चित्त वाले दैत्य से उन्होंने पुनः कहा : हे पुण्यनिधि दैत्य़! दूसरा वर अत्यन्त दुर्लभ है। अविमुक्त (काशी) में, जो मुक्ति का साधन है, तुम्हारा यह पुण्यशरीर मेरी मूर्ति होकर अवतरित होगा, जो सबके लिए मुक्ति देनेवाला होगा। इसका नाम 'कृत्तिवासेश्वर' होगा। यह महापातकों का नाश करेगा। सभी मूर्तियों में यह श्रेष्ठ और शिरोभूत होगा।
कृतिकाव्रत
यह व्रत कार्तिकी पूर्णिमा के दिन प्रारम्भ होता है। इसमें किसी पवित्र स्थान पर स्नान करना चाहिए, जैसे प्रयाग, कुरुक्षेत्र, पुष्कर, नैमिषारण्य, मूलस्थान और गोकर्ण, अथवा किसी भी नगर अथवा ग्राम में स्नान किया जा सकता है। सुवर्ण, रजत, रत्न, नवनीत तथा आटे की छः कृतिका नक्षत्रों की मूर्तियों का पूजन करना चाहिए। मूर्तियाँ चन्दन, आलक्तक तथा केसर से चर्चित तथा सज्जित होनी चाहिए। पूजा में जाती पुष्पों का प्रयोग करना चाहिए।
कृत्तिकास्नान
इस व्रत में भरणी नक्षत्र के दिन उपवास करना चाहिए। कृत्तिका नक्षत्र वाले दिन पुरोहित द्वारा यजमान तथा उसकी पत्नी को सोने के कलश अथवा पवित्र जल तथा वनस्पतियों से परिपूर्ण मिट्टी के कलश द्वारा स्नान कराना चाहिए। इसमें अग्नि, स्कन्द, चन्द्र, कृपाण तथा वरुण के पूजन का विधान है।
कृत्यकल्पतरु
धर्मशास्त्र का एक निबन्ध-ग्रन्थ। इसके रचयिता गहदवाल राजा गोविन्दचन्द्र के सान्धिविग्रहिक लक्ष्मीधर थे। रचनाकाल बारहवीं शताब्दी है। यह विशाल ग्रन्थ था किन्तु इसकी पूरी पाण्डुलिपि उपलब्ध नहीं है। यह बारह काण्डों में विभक्त था। उपलब्ध पाण्डुलिपियों से ज्ञात है कि इसका ग्यारहवाँ काण्ड राजधर्म और बारहवाँ व्यवहार है। पूरे ग्रन्थ का नाम तो कृत्यकल्पतरु है किन्तु इसके अन्य नाम कल्पतरु, कल्पद्रुम, कल्पवृक्ष आदि भी प्रचलित हैं। इसकी सर्वाधिक पूर्ण पाण्डुलिपि महाराणा उदयपुर के ग्रन्थालय में सुरक्षित है। इसमें बारह काण्ड और 1108 पन्ने हैं। इसके बारह काण्ड निम्नाङ्कित हैं :
1. ब्रह्मचारी 2.गृहस्थ 3. नैयत काल 4. श्राद्ध 5. प्रतिष्ठा, 6. प्रतिष्ठा 7. X 8. तीर्थ, 9. X 10. शुद्धि 11. राजधर्म 12. व्यवहार। दो और काण्ड पाये जाते हैं : 13. शान्तिक और 14. मोक्ष। मनमोहन चक्रवर्ती (जर्नल ऑफ द एशियाटिक सोसायटी ऑफ बंगाल, 1915, पृ० 358-59) का सुझाव है कि लुप्त सातवाँ काण्ड पूजा तथा नवाँ प्रायश्चित था।
कृष्ण
ऋग्वेद की एक ऋचा (8.85.3-5) में 'कृष्ण' किसी ऋषि का नाम है। उन्हें अथवा उनके पुत्र को (ऋग्वेद, 8.26) मन्त्रद्रष्टा कहा गया है। 'कृष्णीय' शब्द गोत्रवाचक है जो ऋग्वेद की दो ऋचाओं में उद्धृत है, जहाँ विश्वक् कृष्णीय के लिए विष्णापू को अश्विनौ ने किसी रोग से मुक्ति देकर बचाया था। इस अवस्था में कृष्ण, विष्णापू के पितामह प्रतीत होते हैं। कौषीतकि ब्राह्मण (30.9) में उद्धृत कृष्ण आंगिरस एवं उपर्युक्त कृष्ण एक ही जान पड़ते हैं।
कृष्ण देवकीपुत्र
छान्दोग्य उपनिषद् में कृष्ण देवकीपुत्र घोर आङ्गिरस के शिष्य के रूप में उद्धृत हैं। परम्परा तथा आधुनिक विद्वान् ग्रियर्सन, गार्वे आदि ने इन्हें महाभारत के नायक कृष्ण के रूप में माना है, जिन्हें आगे चलकर देवत्व प्राप्त हो गया।
कृष्ण हारीत
ऐतरेय आरण्यक में इन्हें एक आचार्य कहा गया है।
कृष्णदत्त लौहित्य
(लौहित्य के वंशज) : जैमिनीय उपनिषद् ब्राह्मण (3.42.1) की एक गुरुशिष्य-सूची में इन्हें श्याम सुजयन्त लौहित्य का शिष्य कहा गया है।
कृष्ण
(महाभारत तथा भागवत के :) इनके ऐतिहासिक स्वरूप का वर्णन उपस्थित करना एक ग्रन्थ रचना का विषय है। महाभारत में कृष्ण एक स्थान पर मानवीय नायक, दूसरे स्थान पर अर्धदेव (विष्णु के अंशावतार) एवं अन्य स्थान पर पूर्णावतार (एक मात्र ईश्वर) के रूप में देख पड़ते हैं, जिन्हें आगे चलकर ब्रह्म अथवा परमात्मा कहा गया।
कृष्ण का जन्म द्वापर के अन्त में मथुरा में अन्धकवृष्णि गणसंघ में हुआ था। इनके पिता का नाम वसुदेव तथा माता का नाम देवकी था। उन दिनों इनके नाना देवक के भाई उग्रसेन इस संघ के गणमुख्य थे। उनका पुत्र कंस एकतन्त्रवादी था। वह उग्रसेन को उनके पद से हटाकर स्वयं राजा बन बैठा। कृष्ण उसके विरोधी थे। कंस ने कृष्ण को मारने की बड़ी चेष्टा की, जिसकी अतिरञ्चजत कहानियाँ भागवत-पुराण में वर्णित हैं। इनसे कृष्ण के अद्भुत पुरुषार्थ का परिचय मिलता है। अन्त में उन्होंने कंस का वध कर उग्रसेन को पुनः गणमुख्य बनाया। कंस के बध से उसका सहायक और श्वशुर, मगध का शासक जरासंध बहुत क्रुध हुआ। उसने चेदिराज शिशुपाल और यवन कालनेमि की सहायता से मथुरा पर सत्रह बार आक्रमण किया। कृष्ण को विवश होकर मथुरा छोड़ द्वारका जाना पड़ा। कृष्ण के नेतृत्व में यादवों ने सुराष्ट्र में एक नये राज्य की स्थापना की। कृष्ण ने अपनी योग्यता के बल पर अखिल भारतीय राजनीति में प्रमुख स्थान ग्रहण किया।
इसी बीच हस्तिनापुर के कौरवों और पाण्डवों में राज्य के बँटवारे के लिए संघर्ष प्रारम्भ हुआ। कृष्ण पाण्डवों के सहायक थे। पहले इन्होंने प्रयत्न किया कि शान्ति के साथ पाण्डवों को अधिकार मिल जाय। कौरवों के दुराग्रह के कारण युद्ध हुआ। इसी युद्ध का नाम महाभारत है। वास्तव में महाभारत के कथाकार व्यास और सूत्रधार कृष्ण थे। महाभारत के प्रारम्भ में पाण्डव अर्जुन को कुलक्षय की आशंका से जो व्यामोह हुआ उसका निराकरण कृष्ण ने भगवद्गीता के उपदेश से किया, जो नीतिदर्शन की उत्कृष्ट कृति है। कृष्ण बहुत बड़े दार्शनिक भी थे। इसीलिए इनको योगेश्वर एवं जगद्गुरु (कृष्णंवन्दे जगद्गुरुम) की उपाधि मिली। इनकी सहायता से पाण्डव विजयी हुए और युधिष्ठिर (पाण्डवों में श्रेष्ठ) की अध्यक्षता में पाण्डवराज्य की स्थापना हुई। कृष्ण इसके पश्चात् द्वारका लौट आये। गृहयुद्ध से उनके यदुवंश का विध्वंस हुआ। जंगल में एक व्याध के बाण से स्वयं उनका भी निधन हुआ।
कृष्ण का व्यक्तित्व अत्यन्त महत्वपूर्ण और प्रभावशाली था। वे राजनीति के बहुत बड़े ज्ञाता और दर्शन के प्रकाण्ड पण्डित थे। धार्मिक जगत् में भी वे नेता औऱ प्रवर्त्तक थे। उन्होंने समुच्चयवादी (ज्ञान-कर्म-भक्ति-समन्वयी) भागवत धर्म का प्रवर्तन किया। अपनी योग्यताओं के कारण वास्तव में वे युगपुरुष थे, जो आगे चल कर युगावतार के रूप में स्वीकार किये गये।
पुराणों में कृष्ण का वर्णन ईश्वर के पूर्णावतार के रूप में है। पूर्णावतार का साङ्गोंपाङ्ग रूपक भागवत पुराण में पाया जाता है। दुष्टों का अत्याचार, अवतार का उद्देश्य, कारागार में जन्म, योगमाया का जन्म, गोचारण, गोप तथा गोपियाँ, उनका अनन्य प्रेम, दुष्टदलन, कंसवध, रास, वेदान्त शिक्षण आदि का विस्तृत वर्णन और निरूपण इस पुराण तथा अन्य पुराणों में उपलब्ध है। हरिवंश (महाभारत के परिशिष्ट) में कृष्ण की कथा दुबारा कही गयी है।
कृष्ण ने जिस भागवत धर्म का प्रवर्तन किया था, आगे चलकर उसमें वे स्वयं उपास्य मान लिये गये। दर्शन में इतिहास का उदात्तीकरण हुआ और कृष्ण के ईश्वरत्त्व और ब्रह्मपद की प्रतिष्ठा हुई। भागवत-वैष्णव धर्म आज भारत का बहुमानित और प्रतिष्ठित धर्म है। भारत में इसके सम्प्रदायों तथा उपसम्प्रदायों का व्यापक प्रचार हुआ है। दे० 'अवतार'।