अवतारवाद का निरूपण पुराणों का प्रधान अङ्ग है। शैव पुराणों में शिव के अवतार तथा वैष्णव पुराणों में विष्णु के अगणित अवतारों का वर्णन पाया जाता है। इसी प्रकार अन्य पुराणों में अन्य देवों के अवतारों की चर्चा है। ये वर्णन निराधार नहीं कहे जा सकते, क्योंकि ब्राह्मण तथा उपनिषदों में भी विविध अवतारों की चर्चा है। शतपथ ब्राह्मण (1.4.3.5) में कूर्मावतार का वर्णन है। अधिकांश वैदिक ग्रन्थों के मत से कूर्म, वराह आदि अवतारों की जो कथा कही गयी है, वह प्रजापति (ब्रह्मा) के अवतार की प्रकारान्तर में कथा है। वैष्णव पुराण इन्हीं अवतारों को विष्णु का अवतार बतलाते हैं।
कूष्माण्डदशमी
आश्विन शुक्ल दशमी। इस दिन शिव, दशरथ तथा लक्ष्मी का कूष्माण्ड (कुम्हड़ा) के फूलों से पूजन किया जाता है। चन्द्रमा को अर्घ्य दान करते हैं। दे० गदाधरपद्धति, कालसार भाग, पृ० 125।
कूष्माण्डी
अम्बिका अथवा दुर्गा का एक पर्याय। कूष्माण्ड की बलि से प्रसन्न होने के कारण दुर्गा कूष्माण्डी कही जाती हैं। पवित्र मन्त्रों का नाम, जैसा वसिष्ठस्मृति में कथन है :
सर्ववेदपवित्राणि वक्ष्याम्यहमतः परम्। येषां जपैश्च होमैश्च पूयन्ते नात्र संशयः।। अघमर्षणं देवकृतः शुद्धवत्यस्तरत् समाः। कूष्माण्ड्यः पावमान्यश्च दुर्गासावित्र्ययैव च।। कूष्माण्डी एक लता भी है, जिसके फलों की बलि देने से पाप दूर होते हैं। याज्ञवल्क्य के अनुसार,
त्रिरात्रोपोषितो भूत्वा कूष्माण्डीभिर्घृतं शुचि। सुरापः स्वर्णहारी च रुद्रजापी जले स्थितः।।
[तीन दिन उपवास करने के बाद कूष्माण्डी के फलों के साथ घृत का सेवन करने से और जल में बैठकर रुद्रजप करने से मद्यपान एवं सुवर्णचोरी का पाप कट जाता है।]
कृकलास
कृकलास (गिरगिट) का उल्लेख यजुर्वेद (तैत्तिरीय संहिता, 5.5.19.1; मैत्रायणी सं०, 3.14.21 तथा वाजसनेयी सं०, 24.40) में अश्वमेध यज्ञ की बलिपशुतालिका में हुआ है। 'कृकलासी' का भी ब्राह्मणों में उल्लेख है। 'त्रिकाण्डशेष' के अनुसार यह सूर्य का प्रतीक है, क्योंकि क्रमशः यह सूर्य के सभी रंगों को धारण करता (बदलता) है, महाभारत (13.70) के अनुसार सूर्यवंशी राजा नृग को ब्राह्मण की गौ का अपहरण करने के कारण कृकलास योनि में जन्म धारण करना पड़ा था।
कृच्छ्रव्रत
मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्थी को इस व्रत का प्रारम्भ होता है। चार वर्ष तक इसका आचरण करना चाहिए। इसके देवता गणेशजी हैं। एक वर्ष तक चतुर्थी को एक समय आहार करके जीवनयापन करना चाहिए, द्वितीय वर्ष रात्रि में भोजन करना चाहिए। तृतीय वर्ष बिना माँगे जो मिल जाय उसे खाना चाहिए तथा चौथे वर्ष चतुर्थी के दिन पूर्णोपवास करना चाहिए। दे० हेमाद्रि, 1.501--504, स्कन्दपुराण।
यह पापों को दूर करता है, इसलिए 'कृच्छ्' कहलाता है। याज्ञवल्क्य का कथन है :
कुछ व्रत कृच्छ्र माने जाते हैं। जैसे सौमायन, तप्तकृच्छ्र, कृच्छ्रातिकृच्छ्र, सान्तपन। यद्यपि ये प्रायश्चित हैं तथापि हेमाद्रि में इनकी गणना व्रतों में की गयी है। शूद्रों के लिए इन व्रतों का निषेध है। कुछ अन्य कृच्छ्र व्रतों का भी वर्णन मिलता है, जैसे कार्तिक कृष्ण सप्तमी से पैताम्भ कृच्छ्र। इसमें चार दिन तक क्रमशः केवल जल, दुग्ध, दधि तथा घृत ही लेना चाहिए, एकादशी को उपवास तथा हरिपूजन का विधान है। वैष्णव कृच्छ्र व्रत के समय 'मुन्यन्न' (नीवार के समान एक धान्य) को तीन दिन तक खाना चाहिए। तदनन्तर तीन दिन तक यावक तथा तीन दिन तक उपवास करना चाहिए।
कृच्छ्रातिकृच्छ्र
कृच्छ्र का अर्थ है कष्ट अथवा कठिन। कठिन से कठिन व्रत को 'कृच्छोतिकृच्छ्र' कहते हैं। वसिष्ठ के अनुसार :
[जिसमें केवल एक बार जल पिया जाता है वह कृच्छ्रातिकृच्छ्र है। अथवा जिसमें प्रतिदिन एक बार हाथ से जल ग्रहण कर नौ दिनों तक ऐसे ही रहा जाय और तीन दिन पूर्ण (जलरहित) उपवास किया जाय वह कृच्छ्रातिकृच्छ्र है।] सुमन्तु के अनुसार :
द्वादशरात्रं निराहारः स कृच्छ्रातिकृच्छ्रः। एतत्कृक्छ्रातिकृच्छ्रद्वयं द्वादशाहसाध्यमशक्तविषयम्।
[बारह दिन निराहार व्रत करने को कृच्छ्रोतिकृच्छ्र कहते हैं। यह व्रत असमर्थों के लिए बारह दिन का है।] प्रायश्चित्तविवेक में ब्रह्मपुराण से निम्नांकित श्लोक उद्धृत है, जिसके अनुसार यह व्रत इक्कीस दिन का होता है :
घोर पापों के प्रायश्चित स्वरूप इस व्रत का विधान किया गया है।
कृतकोटि
(1) जिसने शास्त्रों की कोटि (सीमा अथवा श्रेष्ठता) प्राप्त कर ली है उसको कृतकोटि कहते हैं। 'त्रिकाण्डशेष' के अनुसार यह काश्यप अथवा उपवर्ष का पर्याय है। यह शङ्कराचार्य की पदवी भी है।
(2) प्रसिद्ध है कि ब्रह्मसूत्र पर बौधायन (एक वेदान्ताचार्य) ने वृत्ति लिखी थी जिसको आचार्य रामानुज ने अपने भाष्य में उद्धृत किया है। जर्मन पण्डित याकोबी का मत है कि बोधायन ने मीमांसासूत्र पर भी वृत्ति लिखी है। प्रपञ्चहृदय नामक ग्रन्थ से यह बात सिद्ध होती है और प्रतीत होता है कि बौधायननिर्मित वेदान्तवृत्ति का नाम 'कृतकोटि' था (प्रपञ्चहृ०, पृ० 39)। पुलवर पुराण, मणिमेखलै आदि द्रविड भाषा के प्रबन्धों में बौधायनकृत मीमांसावृत्ति का कृतकोटि नाम से निर्देश है।
कृतक्रिय
धार्मिक क्रिया सम्पन्न करनेवाला व्यक्ति। इसका सांकेतिक रूप किसी कर्म को समाप्त करना है। मनुस्मृति (5.99) के अनुसार :
[कृतक्रिय ब्राह्मण जल स्पर्श करके, क्षत्रिय वाहन अथवा अस्त्र-शस्त्र छूकर, वैश्य कोड़ा अथवा लगाम छूकर और शूद्र यष्टि (लाठी) स्पर्श करके शुद्ध होता है।]
कृतयुग
वैदिक धर्मावलम्बी हिन्दू विश्व की चार सीमाएँ मानते हैं, जिन्हें 'युग' कहते हैं। ये हैं कृत, त्रेता, द्वापर एवं कलि। ये नाम पासे के पहलुओं (पक्ष) के अनुसार रखे गये हैं। कृत सर्वोत्कृष्ट है, जिसके पलू पर चार बिन्दु होते हैं, त्रेता पर तीन, द्वापर पर दो एवं कलि पर एक बिन्दु होता है, अर्थात् क्रम से प्रत्येक में एक-एक बिन्दु कम होता जाता है। ब्राह्मण ग्रन्थों, रामायण-महाभारत एवं पुराणों में उपर्युक्त पासों के पक्षबिन्दुओं के अनुसार इनके नाम रखने का अर्थ यह है कि कृत सबसे चौगुना लम्बा एवं सर्वगुणसम्पन्न युग है तथा क्रम से युगों में गुण एवं आयु का ह्रास होता जाता है। कृत की आयु 4400 दिव्य वर्ष है, त्रेता की 3300, द्वापर की 2200 तथा कलि की 1100 दिव्य वर्ष है। एक दिव्य वर्ष 1000 मानव वर्ष के बराबर होता है।
कृतयुग हमारे सामने मनुष्यजाति की सबसे सुखी अवस्था को प्रस्तुत करता है। मनुष्य इस युग में 4000 वर्ष जीता था। न तो युद्ध होते थे न झगड़े। वर्णाश्रमधर्म तथा वेद की शिक्षाओं का पूर्णरूपेण पालन होता था। अच्छे गुणों का दृढ़ शासन था। कलि ठीक इसके विपरीत गुणों का बोधक युग है। दे० 'कलियुग।'