पञ्चविंश ब्राह्मण में इन्हें एक गृहपति कहा गया है। ये कौषीतकियों के एक यज्ञसत्र के समय गृहपति बनाये गये थे।
कुसुमाञ्जलि
न्यायाचार्य उदयन की रचनाओं में सबसे प्रसिद्ध कुसुमाञ्जलि है, जिसमें कुल 72 स्मरणीय श्लोकों में ईश्वर की सत्ता प्रमाणित की गयी है। नैयायिकों में यह ग्रन्थ बहुत प्रचलित है। इसकी अन्तिम भावपूर्ण और तर्कमयी शुभाशंसा है :
इत्येवं श्रुतिशास्त्रसप्लवजलै र्भूयोभिराक्षालिते येषां नास्पदमादधासि हृदये ते शैलसारोपमाः। किन्तु प्रोद्यतविप्रतीपविधयाप्युच्चै र्भवच्चिन्तकाः काले कारुणिक त्वयैव कृपया ते तारणीया जनाः।।
[हे करुणामय प्रभो, इस ग्रन्थ में मैंने श्रुति-स्मृति-तर्क-युक्तियों के बहुत तीव्र प्रखर जल से नास्तिकों के हृदय को बड़ी मात्रा में धो डाला है, फिर भी पत्थर से भी कठोर उन लोगों के मन में आप स्थान ग्रहण न कर सके। किन्तु "ईश्वर नहीं है", "ईश्वर नहीं है" इस प्रकार उलटे रूप में बड़े वेग से वे सब तत्परतापूर्वक आपका ही चिन्तन करते हैं, अतः अन्त समय पर उनका भी उद्धार करने की कृपा कीजियेगा।]
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कूटसन्दोह
आचार्य रामानुज ने अपने मत की पुष्टि और प्रचार के लिए 'श्रीभाष्य' के अतिरिक्त अनेक ग्रन्थों की रचना की। इन ग्रन्थों में इन्होंने शाङ्कर मत का प्रबल शब्दों में खण्डन किया है। रामानुजरचित ग्रन्थों की लम्बी सूची में एक ग्रन्थ 'कूटसन्दोह' भी है।
कूटस्थ पुरुष
(1) शाक्त प्रणाली में यह धारणा है कि सर्वोच्च अन्तिम अवस्था में विष्णु वा शिव तथा उनकी शक्ति एक ही परमात्मा है, जिनमें कोई अन्तर नहीं है। केवल सृष्टिकाल में दोनों भिन्न होते हैं। सृष्टि की आरम्भिक प्रथम अवस्था में शक्ति जागृत होती है, जैसे नींद से उठी हो। उसके दो रूप हैं : क्रिया तथा भूति। पुनः उसके स्वामी के छः गुणों का उदय होता है, यथा ज्ञान, शक्ति, प्रतिभा, बल, शौर्य एवं सौन्दर्य। उनकी शक्ति लक्ष्मी छहों जोड़े बनकर संकर्षण, प्रद्युम्न एवं अनिरुद्ध (द्वितीय, तृतीय एवं चतुर्थ व्यूह) तथा उनकी शक्ति के रूप में प्रकट होती है। व्यूहों से 12 अर्धव्यूह तथा 12 विद्येश्वर उदित होते हैं। सृष्टि की इस अवस्था में विभवों (विष्णु के अवतारों) का उदय होता है, जो संख्या में 39। साथ ही वैकुण्ठ और उसके निवासियों का उदय होता है।
सृष्टि के आरम्भ की दूसरी अवस्था में शक्ति का भूतिरूप ठोस आकार धारण करता है, जिसे 'कूटस्थ पुरुष' तथा 'मायाशक्ति' कहते हैं। कूटस्थ पुरुष व्यक्तिगत आत्माओं (जीवों) का समष्टिगत रूप है (जैसे अनेकों मधुमक्खियों का एक छत्ता होता है), जबकि माया सृष्टि का भौतिक उपादान है।
(2) सांख्य दर्शन का कूटस्थ पुरुष निर्लिप्त, केवल औऱ द्रष्टा मात्र है। इसका शाब्दिक अर्थ है 'कूट (चोटी) पर बैठा हुआ'।
(3) पञ्चदशी (6.22-27) में परमात्मा के लिए इसका प्रयोग हुआ है :
अधिष्ठानतया देहद्वयावच्छिन्न चेतनः। कूटविन्नर्विकारेण स्थितः कूटस्थ उच्यते।। कूटस्थे कल्पिता बुद्धिस्तत्र चित्प्रतिबिम्बकः। प्राणानां धारणाज्जीवः संसारेण स युज्यते।। जलव्योम्ना घटाकाशों, यथा सर्वस्तिरीहितः। तथा जीवेन कूटस्थः सोऽन्योन्याध्यास उच्यते।। अयं जीवो न कूटस्थं विविनक्ति कदाचन। अनादिरविवेकोऽयं मूलविद्येति गम्यताम्।। विक्षेपावृत्तिरूपाभ्यां द्विधाविद्या प्रकल्पिता। न भाति नास्ति कूटस्थ इत्यापादनमावृतिः।। अज्ञानी विदुषा पुष्टः कूटस्थं न प्रबुध्यते। न भाति नास्ति कूटस्थ इति बुद्धवा वदत्यपि।।
श्रीमद्भगवद्गीता (15.16-17) में सच्चिदानन्दस्वरूप पुरुषोत्तम को कूटस्थ कहा गया है :
धर्मशास्त्र में (व्यवहारतत्त्व के अनुसार) मायावी अथवा मिथ्यावादी साक्षी को कूटसाक्षी कहा गया है। याज्ञवल्क्यस्मृति में कूटसाक्षी का लक्षण निम्नांकित है :
द्विगुण वान्यथा ब्रूयुः कूटाः स्युः पूर्वसाक्षिणः। न ददाति तु यः साक्ष्यं जानन्नपि नराधमः। स कूटसाक्षिणां पापैस्तुल्यो दण्डेन चैव हि।।
[वे पूर्व साक्षी कूट कहे जाते हैं जो दूना (बढ़ाकर) अथवा अन्यथा (असत्य) बोलते हैं। जो मनुष्य जानता हुआ भी साक्ष्य नहीं देता है वह भी कूटसाक्षी के समान ही अधम और दण्ड्य है।]
कूर्म
विष्णु का एक अवतार, जिसने भूमण्डल को अपनी पीठ पर धारण कर रखा है। कूर्म या कच्छप जलजन्तु है। धार्मिक रूपक, माङ्गलिक प्रतीक, तान्त्रिक उपचारादि के रूप में इसका उपयोग होता है। बृहत्संहिता (अ० 64) के अनुसार मन्दिर में स्थापित कूर्म की प्रतिमा मङ्गलकारिणी होती है :
दे० 'कूर्मावतार'। पद्मपुराण के अनुसार सत्ययुग में देव और असुरों द्वारा समुद्रमन्थन के अवसर पर मन्दर पर्वत को धारण करने के लिए भगवान् विष्णु ने कूर्म का रूप ग्रहण किया (क्षीरोदमध्ये भगवान् कूर्मरूपी स्वयं हरिः।) भागवतपुराण में भी यही बात कही गयी है।
तन्त्रसार में यह एक मुद्रा का नाम है। इसका वर्णन इस प्रकार है :
वामहस्तस्य तर्जन्यां दक्षिणस्य कनिष्ठया। तथा दक्षिण तर्जन्यां वामाङ्गुष्ठे न योजयेत्।। उन्नतं दक्षिणाङ्गुष्ठं वामस्य मध्यमादिकाः। अङ्गुलीर्योजयेत् पृष्ठे दक्षिणस्य करस्य च।। वामस्य पितृतीर्थेन मध्यमानामिके तथा। अधोमुखे च ते कुर्याद्दक्षिणस्य करस्य च।। कूर्मपृष्ठसमं कुर्याद्दक्षपाणिं च सर्वशः। कूर्ममुद्रेयमाख्याता देवताध्यानकर्मणि।।
हठयोग में एक आसन का नाम कूर्मासन है :
गुदं निरुध्य गुल्फाभ्यां व्युत्क्रमेण समाहितः। कूर्म्मासनं भवेदेतदिति योगविदो विदुः।। तन्त्रों में एक चक्र का नाम भी कूर्मचक्र है।
कूर्मतीर्थ
हिमालय में स्थित एक तीर्थ। बदरीनाथ मन्दिर के पीछे पर्वत पर सीधे चढ़ने से चरणपादुका का स्थान आता है। उसके ऊपर उर्वशीकुण्ड तथा इसी पर्वत पर आगे कूर्मतीर्थ पड़ता है। यहाँ भगवान् विष्णु का कूर्म (कच्छप) के रूप में पूजन होता है। कूर्म भूपृष्ठ का प्रतीक है, जो सभी जीवधारियों को धारण करता है।
कूर्मद्वादशी
कूर्मद्वादशी पौष शुक्ल द्वादशी। इस तिथि को कूर्म अवतार हुआ था, इसलिए विष्णु-नारायण की पूजा होती है। दे० वराह पुराण, अध्याय 40; कृत्यरत्नाकर, 482-484। घृत से परिपूर्ण ताम्रपात्र में एक कूर्म (कछुए) की मूर्ति स्थापित करके उसके ऊपर मन्दराचल रखकर किसी सुपात्र को दान दिया जाता है। इस अनुष्ठान से भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं।
कूर्मद्वादशीव्रत
भविष्य पुराण के अनुसार यह पौष शुक्ल द्वादशी का व्रत है। इस व्रत में घृत भरे ताँबे के पात्र पर मन्दर पर्वत सहित कच्छप की मूर्ति रखकर पूजा की जाती है।
कूर्मपुराण
साधारणतया यह शैवपुराण है तथा इसमें 'लकुलीश-पाशुपतसंहिता' की कुछ सामग्री उद्धृत है, जो वायुपुराण में भी दृष्टिगोचर होती है। यह कुछ आगमों एवं तन्त्रों की शिक्षा को व्यक्त करता है। वायुपुराण से कुछ न्यूनाधिक यह शिव के अट्ठाईस अवतारों तथा उनके शिष्यों का वर्णन भी प्रस्तुत करता है। इसमें कुछ शाक्त तन्त्रों के भी उद्धरण हैं तथा शक्तिपूजा पर बल दिया गया है। यह अब भी निश्चित रूप से विदित नहीं है कि किस शैव सम्प्रदाय के वर्णन इसमें प्राप्त है (केवल अवतारों को छोडकर, जो लकुलीश मत से सम्बन्धित हैं)।
कूर्मपुराण के पूर्वार्द्ध में तिरपन अध्याय तथा उत्तरार्ध में छियालीस अध्याय हैं। नारदपुराण आदि प्रायः सभी पुराणों में जहाँ कूर्मपुराण की चर्चा आयी है, बराबर सत्रह हजार श्लोक बताये गये हैं। परन्तु प्रचलित प्रतियों में केवल छः हजार के लगभग ही श्लोक पाये जाते हैं। नारदपुराण में जो विषयसूची दी हुई है उसकी आधी से कम ही सूची छपी पुस्तकों में पायी जाती है। ऐसा जान पड़ता है कि कूर्मपुराण के कुछ अंश तन्त्र ग्रन्थों में मिला दिये गये हैं, क्योंकि नारदपुराणोक्त सूची के छूटे हुए विषय डामर, यामल आदि तन्त्रों में पाये जाते हैं।
मूलतः इस पुराण का रूप विशाल था। इसके उपलब्ध अंश से पता लगता है कि इसमें चार संहिताएँ थीं-- (1) ब्राह्मी, (2) भागवती, (3) सौरी और (4) वैष्णवी। इस समय केवल 'ब्राह्मी संहिता' ही मिलती है। इसी का नाम कूर्मपुराण है। मत्स्य और भागवत पुराणों के अनुसार मूल कूर्मपुराण में 18000 श्लोक थे, परन्तु वर्तमान कूर्मपुराण में केवल 6000 श्लोक पाये जाते हैं। इसके कूर्म नाम पड़ने का कारण यह है कि भगवान् विष्णु ने कूर्मावतार धारण कर इस पुराण का उपदेश इन्द्रद्युम्न नामक राजा को दिया था। इस पुराण में शिव ही प्रधान आराध्य देवता के रूप में वर्णित हैं। इसमें यह मत प्रतिपादित किया गया है कि त्रिमूर्तियाँ --ब्रह्मा, विष्णु तथा शिव एक ही मूल सत्ता ब्रह्म के विभिन्न रूप हैं। शिव के साथ ही शाक्तपूजा का भी इसमें विस्तृत वर्णन पाया जाता है।