हिमाचल प्रदेश में ब्यास नदी के तट पर कुल्लू नगर स्थित है। यह बहुत सुन्दर स्थान है। यहाँ पठान-कोट से सीधा मोटरमार्ग भी मण्डी होकर आता है। पठानकोट से कुल्लू एक सौ पचहत्तर मील पड़ता है। यह नगर बाजार, रघुनाथ-मन्दिर, धर्मशाला, थाना, पोस्टआफिस, बिजली आदि से सम्पन्न है। तुषारमण्डित गगनचुम्बी भूधरों से वेष्टित यह स्थल समुद्रतल से 4700 फुट ऊँचाई पर है। विजयादशमी को यहाँ की विशेष यात्रा होती है और दस दिन तक मेला रहता है।
कुल्लूभट्ट
मनुस्मृति की प्रसिद्ध टीका के रचयिता। इनका काल बारहवीं शताब्दी है। मेधातिथि और गोविन्दराज के मनुभाष्यों का इन्होंने प्रचुर उपयोग किया है। इनके अन्य ग्रन्थ हैं-- स्मृतिविवेक, अशौचसागर, श्राद्धसागर और विवादसागर। पूर्वमीमांसा के ये प्रकाण्ड पण्डित थे। अपनी टीका `मन्वर्थमुक्तावली` में इन्होंने लिखा है-- `वैदिकी तान्त्रिकी चैव द्विविधा श्रुतिः कीर्तिता।` [वैदिकी एवं तान्त्रिकी ये दो श्रुतियाँ मान्य हैं।] इसलिए कुल्लूकभट्ट के मत से तन्त्र को भी श्रुति कहा जा सकता है। कुल्लूक ने कहा है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र जातियाँ जो क्रियाहीनता के कारण जातिच्युत हुई हैं, चाहे वे म्लेच्छभाषी हों चाहे आर्यभाषी, सभी दस्यु कहलाती हैं। इस प्रकार के कतिपय मौलिक विचार कुल्लूकभट्ट के पाये जाते हैं।
मन्वर्थमुक्तावली की भूमिका में कुल्लूकभट्ट ने अपना संक्षिप्त परिचय इस प्रकार दिया है:
[गौडदेश के नन्दन ग्रामवासी, सुजनों से वन्दनीय वारेन्द्र कुल में श्रीमान् दिवाकर भट्ट के पुत्र कुल्लूक हुए। काशी में उत्तरवाहिनी गङ्गा के किनारे पण्डितों के साहचर्य में उनके (कुल्लूकभट्ट के) द्वारा विद्वानों के हित के लिए मन्वर्थमुक्तावली (नामक टीका) रची जा रही है।] मेधा तिथि तथा गोविन्दराज के अतिरिक्त अन्य शास्त्रकारों का भी उल्लेख कुल्लूकभट्ट ने किया है, जैसे गर्ग (मनु. 2.6), धरणीधर, भास्कर, (मनु, 1.8,45), भोजदेव (मनु, 8.184), वामन (मनु, 12.106), विश्वरूप (मनु, 2.189)। निबन्धों में कुल्लूक कृत्यकल्पतरु का प्रायः उल्लेख करते हैं। आश्चर्य इस बात का है कि मन्वर्थमुक्तावली में कुल्लूक ने बंगाल के प्रसिद्ध निबन्धकार जीमूतवाहन के दायभाग की कहीं चर्चा नहीं की है। संभवतः वाराणसी में रहने के कारण वे जीमूतवाहन के ग्रन्थ से परिचित नहीं थे। अथवा जीमूतवाहन अभी प्रसिद्ध नहीं हो पाये थे।
कुल्लूक भट्ट ने अन्य भाष्यकारों की आलोचना करते हुए अपनी टीका की प्रशंसा की है (दे० पुष्पिका)
[मेधातिथि की चातुरी सारगर्भित तथा सारहीन वचनों (पाठों) के विवेचन की शैली में दिखाई पड़ती है। गोविन्दराज ने शास्त्रों के गूढ़ अर्थों की व्याख्या संक्षेप में की है। धरणीधर ने परम्परा से स्वतन्त्र होकर शास्त्रों का अर्थ किया है। (परन्तु मैंने 'मन्वर्थमुक्तावली' में) मानव धर्म (शास्त्र) के सम्पूर्ण तत्त्व को स्पष्ट रूप से कहने का श्रम किया है।]
सर विलियम जोन्स ने कुल्लूक भट्ट की प्रशंसा में लिखा है : "इन्होंने कष्टसाध्य अध्ययन कर बहुत सी पाण्डुलिपियों की तुलना से ऐसा ग्रन्थ प्रस्तुत किया, जिसके विषय में सचमुच कहा जा सकता है कि यह लघुतम किन्तु अधिकतम व्यञ्जक, न्यूनतम दिखाऊ किन्तु पाण्डित्यपूर्ण, गम्भीरतम किन्तु अत्यन्त ग्राह्य है। प्राचीन अथवा नवीन किसी लेखक की ऐसी सुन्दर टीका दुर्लभ है।" दे० पेद्दा रमप्पा बनाम बंगरी शेषम्मा, इण्डियन ला रिपोर्टर (2, मद्रास, 286, पृ० 297)।
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कुबेर
उत्तर दिशा के अधिष्ठाता देवता। मार्कण्डेय तथा वायुपुराण में 'कुबेर' शब्द की व्युत्पत्ति निम्नलिखित प्रकार से दी हुई है :
['कु' का प्रयोग कुत्सा (निन्दा) में होता है। 'बेर' शरीर को कहते हैं। इसलिए कुत्सित शरीर धारण करने के कारण वे 'कुबेर' नाम से विख्यात हुए।]
भागवत पुराण के अनुसार विश्रवा मुनि की इडविडा (इलविला) नामक भार्या से कुबेर उत्पन्न हुए थे। ये धन यज्ञ और उत्तर दिशा के स्वामी हैं। ये तीन चरणों और आठ दाँतों के साथ उत्पन्न हुए थे।
कुश (यज्ञीय तृण)
यह एक पवित्र घास है। इसका प्रयोग यज्ञों के विविध कर्मकाण्डों तथा सभी हिन्दू संस्कारों में होता है। इसकी नोक बड़ी तेज होती है। इसी से कुशाग्र बुद्धि का मुहावरा प्रचलित हुआ। इसकी उत्पत्ति का वर्णन इस प्रकार है :
[सब संपत्तियों से भरपूर बर्हिष्मती नगरी में पहले यज्ञस्वरूपी वराह भगवान् के शरीरकम्पन से जो रोम गिरे, वे ही हरे-भरे कुश और कास हो गये। ऋषियों ने उनको हाथ में धारण कर यज्ञविरोधियों को मार भगाया और अपना अनुष्ठान पूरा किया। (भागवत)]
कुश (राजा)
सूर्यवंशी भगवान् राम के ज्येष्ठ पुत्र। रामायण में इनकी उत्पत्ति का वर्णन मिलता है कि सीताजी के बड़े पुत्र का मार्जन ऋषि ने पवित्र कुशों से किया था इसलिए उसका नाम कुश हो गया।
कुश (द्वीप)
पौराणिक भुवनकोश (भूगोल) के अनुसार सात द्वीपों में एक कुश द्वीप भी है। यह घृत के समुद्र से घिरा हुआ है जहाँ देवनिर्मित अग्नि के समान कुशस्तम्ब वर्तमान है। इसीलिए इसका नाम 'कुश' पड़ा। इसके राजा प्रियव्रत के पुत्र हिरण्यरेता थे। इन्होंने इस द्वीप को सात भागों में विभक्त कर अपने सात पुत्रों को दे दिया।
कुशकण्डिका
होम कर्म में कुश बिछाने तथा वस्तु शुद्ध करने की विधि का ज्ञापक लम्बा गद्यमन्त्र। इसके अनुसार कुशों के द्वारा सभी प्रकार के होम के लिए सम्पादित अग्निसंस्कार की क्रिया को भी कुशकण्डिका कहते हैं। कर्मकाण्ड में यह किया सर्वप्रथम की जाती हैं।
कुशिक
(1) कान्यकुब्ज (कन्नौज) के पौराणिक राजाओं में से एक, जिसके नाम से कौशिक वंश चला। कुशिकतीर्थ कान्यकुब्ज का एक पर्याय है। यह राजधानी ही नहीं, मध्ययुग तक प्रसिद्ध तीर्थ भी था, जिसकी गणना गहडवाल अभिलेखों के अनुसार उत्तर भारत के पञ्चतीर्थों में होती थी।
(2) लकुली (लकुलीश, जो शिव के एक अवतार समझे जाते हैं) के शिष्यों में से एक कुशिक हैं। उनके कुशिक आदि चार शिष्यों ने पाशुपत योग का पूर्ण अभ्यास किया था।
कुशीनगर
उत्तर प्रदेश के देवरिया जिले में कसया नामक कसबे के पास प्राचीन कुशीनगर है। अति प्राचीन काल में यह कुशावती नगरी (कुश की राजधानी) थी। पीछे यह मल्ल गणतन्त्र की राजधानी बनी। यहीं पर बुद्ध ने परिनिर्वाण प्राप्त किया था, अतएव यह स्थान बुद्धधर्मानुयायियों का प्रमुख तीर्थस्थान हो गया है। गोरखपुर से पूर्वोत्तर कसया (कुशीनगर) छत्तीस मील दूर है। खुदाई से निकली मूर्तियों के अतिरिक्त यहाँ माथाकुँवर का कोटा, परिनिर्वाणस्तूप तथा परिनिर्वाणचैत्य, रामभारस्तूप आदि दर्शनीय हैं।
परिनिर्वाणस्तूप में भगवान् बुद्ध की अस्थियाँ प्रतिष्ठापित की गयी थी। मूल स्तूप कुशीनगर के मल्लों ने ही बनवाया था, परन्तु उसके बाद भग्न होने पर अत्यन्त पवित्र होने के कारण इस स्तूप का कई बार पुनर्निर्माण और संस्कार हुआ। परिनिर्वाणचैत्य में भगवान् बुद्ध की परिनिर्वाण-मुद्रा में (लेटी हुई) विशाल लाल पत्थर की प्रतिमा है जिसके आसन के सामने भगवान् बुद्ध के परिनिर्वाण का पूरा दृश्य अङ्कित है। इसी पर एक अभिलेख से ज्ञात होता है कि भिक्षु बल ने इस प्रतिमा का दान किया था। रामभारस्तूप उस स्थान पर बना है, जहाँ मल्लों का अभिषेक होता था और भगवान् बुद्ध का दाहसंस्कार हुआ था। माथाकुँवर के कोट में पालकालीन भगवान् बुद्ध की बैठी हुई एक सुन्दर प्रतिमा है।
कुश्रि वाजश्रवस
शतपथ ब्राह्मण (10.5.5.1) में पवित्र अग्नि के सूक्तों के आचार्य के रूप में तथा बृहदारण्यक उपनिषद् के अन्तिम वंश (शिक्षकों की सूची) में ये वाजश्रवा के शिष्य कहे गये हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि बृहदारण्यक के अन्तिम वंश में उद्धृत कुश्रि तथा शतपथ के दशम अध्याय के वंश में उद्धृत कुश्रि, जिसे यज्ञवचस राजस्तम्बायन का शिष्य कहा गया है, दोनों एक हैं अथवा भिन्न-भिन्न।