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Hindu Dharmakosh (Hindi-Hindi)

कुम्भपर्व
बारह-बारह वर्ष के अन्तर से चार मुख्य तीर्थों में लगनेवाला स्नान-दान का ग्रहयोग। इसके चार स्थल प्रयाग, हरिद्वार, नासिक-पंचवटी और अवन्तिक (उज्जैन) हैं। (1) जब सूर्य तथा चन्द्र मकर राशि पर हों गुरू वृषभ राशि पर हो, अमावस्या हो; ये सब योग जुटने पर प्रयाग में कुम्भयोग पड़ता है। इस अवसर पर त्रिवेणी में स्नान करना सहस्रों अश्वमेध यज्ञों, सैकड़ों वाजपेय यज्ञों तथा एक लाख बार पृथ्वी की प्रदक्षिण करने से भी अधिक पुण्य प्रदान करता है। कुम्भ के इस अवसर पर तीर्थयात्रियों को मुख्य दो लाभ होते हैं; गंगास्नान तथा सन्तसमागम।
(2) जिस समय कुम्‍भ राशि पर और सूर्य मेष राशि पर हो तब हरिद्वार में कुम्‍भ पर्व होता है। (3) जिस समय गुरु सिंह राशि पर स्थित हो तथा सूर्य एवं चन्‍द्र कर्क राशि पर हों तब नाशिक में कुम्‍भ होता है। (4) जिस समय सूर्य तुला राशि पर स्थित हो और गुरु वृश्चिक राशि पर हो तब उज्‍जैन में कुम्‍भ पर्व मनाया जाता है। कुम्भ की उत्पत्ति के सम्बन्ध में पुराणों में मनोरंजक कथाएँ हैं। इनका सम्बन्ध समुद्रमन्थन से उत्पन्न अमृतघट से है।इस अमृतघट को असुर गण उठा ले गये थे, जिसको गरुड़ पुनः पृथ्वी पर ले आये। जिन-जिन स्थानों पर यह अमृतघट (कुम्भ) रखा गया वहाँ अमृतबिन्दुओं के छलक जाने से वे सभी प्रदेश पुण्यस्थल हो गये। वहाँ निश्चित समय पर स्नान-दान-पुण्य करने से अमृत-पद (मोक्ष) की प्राप्ति होती है। प्राचीन धर्मशास्त्रग्रन्थों में उक्त कुम्भयोगों का उल्लेख नहीं पाया जाता है।

कुरुक्षेत्र
अम्बाला से 25 मील पर्व स्थित एक प्राचीन तीर्थ। ब्राह्मणयुग में कुरुक्षेत्र बहुत ही पवित्र स्थल माना जाता था। शतपथ ब्राह्मण (4.1.5.13) के अनुसार देवताओं ने कुरुक्षेत्र में यज्ञाहुति दी थी। मैत्रायणी संहिता में भी यही बात कही गयी है। इससे स्पष्ट होता है कि ब्राह्मणयुग के वैदिक लोग कुरुक्षेत्र में यज्ञ करने को सर्वाधिक महत्‍त्व देते थे। यह वैदिक संस्कृति का केन्द्र था, इसलिए यहाँ अधिक यज्ञ होना स्वाभाविक है और इसी कारण इसे 'धर्मक्षेत्र' भी कहा गया है। तैत्तिरीय आरण्यक के अनुसार देवताओं ने कुरुक्षेत्र में एक सत्र पूरा किया था। इसकी वेदी कुरुक्षेत्र में ही थी। इसके दक्षिणी भाग को खाण्डव तथा उत्तरी भाग को तूर्घ्‍न, मध्यभाग को परीण तथा मरु को उत्कर कहा गया है। इससे यह ज्ञात होता है कि खाण्डव, तूर्घ्न तथा परीण कुरुक्षेत्र के सीमान्त प्रदेश थे और मरु प्रदेश कुरुक्षेत्र से कुछ दूर था। महाभारत में कुरुक्षेत्र के पवित्र गुणों का उल्लेख किया गया है। ऐसा ज्ञात होता है कि इसकी सीमा दक्षिण में सरस्वती तथा उत्तर में दृषद्वती नदी तक थी। वनपर्व (86.6) में कुरुक्षेत्र को 'ब्रह्मावर्त' कहा गया है। यही बात वामन पुराण तथा मनुस्मृति में भी किञ्चित् परिवर्तन के साथ कही गयी है। इस प्रकार आर्यावर्त में ब्रह्मावर्त सर्वाधिक पवित्र माना गया है और कुरुक्षेत्र ऐसा ही स्थल है।
ब्राह्मणयुग में सर्वाधिक पवित्र सरस्वती कुरुक्षेत्र से ही होकर बहती थी और मरू भूमि को भी, जहाँ वह अदृश्य हो जाती है, पवित्र स्थल माना गया था। मूलतः कुरुक्षेत्र ब्रह्मा की वेदी कहलाता था, तदुपरान्त इसे समन्तपञ्चक तब कहा गया जब परशुराम ने पिता की हत्या के बदले में क्षत्रियों के रक्त से पाँच सरोवरों का निर्माण किया। फिर उनके पितरों के वरदान से यह पवित्र स्थल हो गया। बाद में महाराज कुरु के नाम पर इसका नाम कुरुक्षेत्र पड़ा।
वामनपुराण के अनुसार कुरुक्षेत्र का अर्धव्यास पाँच योजन तक है। पुराणों में कुरुक्षेत्र को कई नामों से अभिहित किया गया है। इनमें कुरुक्षेत्र समन्तपञ्चक, विनशन, सन्निहत्य, ब्रह्मसर और रामह्रद नाम प्रमुख हैं। अत्यन्त प्राचीन काल में कुरुक्षेत्र वैदिक संस्कृति का केन्द्र था। धीरे-धीरे यह केन्द्र पूर्व तथा दक्षिण की ओर खिसकता गया और अन्ततः मध्यदेश (गङ्गा और यमुना के बीच का प्रदेश) भारतीय संस्कृति का केन्द्र हो गया।
महाभारत के वनपर्व (अ० 83) के अनुसार जो लोग कुरुक्षेत्र में रहते हैं वे सभी पापों से मुक्त हैं। इसके अतिरिक्त जो यह कहता है कि मैं कुरुक्षेत्र जाऊँगा और वहाँ रहूँगा, वह भी पापमुक्त हो जाता है। संसार में इससे अधिक पवित्र स्थल दूसरा कोई नहीं है। कुरुक्षेत्र की धूलि का कण भी यदि कोई महान् पापी स्पर्श करे तो वह कण ही उसके लिए स्वर्ग हो जाता है। अन्यत्र ग्रह, नक्षत्र और तारों के भी पतन का भय बना रहता है, परन्तु जो कुरुक्षेत्र में मृत्यु को प्राप्त होते हैं वे पुनः मर्त्य-लोक में नहीं आते (नारदीय पुराण, 11.64.23-24)।
नारदीय पुराण (उत्तरार्ध, अ० 65) में कुरुक्षेत्र के लगभग सौ तीर्थों का नामाङ्कन किया गया है। इनमें से कुछ का ही विवरण यहाँ दिया जा सकता है। सर्वप्रथम ब्रह्मसर या पवन ह्रद का नाम आता है, जहाँ राजा कुरु योगी के रूप में निवास करते थे। इस झील की लम्बाई पूर्व से पश्चिम 3546 फुट तथा चौड़ाई उत्तर से दक्षिण 1900 फुट है। वामन पुराण का मत है कि इसकी सीमा अर्ध योजन थी। चक्रतीर्थ की भूमि पर कृष्ण ने भीष्म पर आक्रमण करने के लिए चक्र धारण किया था। व्यास स्थली थानेश्वर से 17 मील दक्षिण-पश्चिम में स्थित आधुनिक वनस्थली है। अस्थिपुर थानेश्वर के पश्चिम तथा औजसघाट के दक्षिण में स्थित है। यहाँ महाभारतयुद्ध में वीरगति को प्राप्त हुए सैनिकों का अन्तिम संस्कार किया गया था। कनिंघम के भारतीय पुरातत्त्व सर्वेक्षण के अनुसार चक्रतीर्थ ही अस्थिपुर है और अलबीरूनी के युग के यह कुरुक्षेत्र का सबसे प्रसिद्ध मन्दिर था। सरस्वतीतट पर स्थित पृथूदक वनपर्व में बहुत ही उच्च स्तर का तीर्थ माना गया है। उसमें कहा गया है कि कुरुक्षेत्र पवित्र स्थल है और सरस्वती उससे भी अधिक पवित्र है। सरस्वतीतट पर स्थित तीर्थ सरस्वती से भी अधिक पवित्र हैं और पृथूदक सरस्वती पर स्थित तीर्थों में भी सबसे अधिक पवित्र है। इससे उत्तम कोई तीर्थ नहीं है। शल्यपर्व (39.33-34) में कहा गया है कि जो व्यक्ति सरस्वती के उत्तरी तट पर पृथूदक में पवित्र ग्रन्थों का अध्ययन करते हुए जीवन का उत्सर्ग करता है वह निर्वाण को प्राप्त होता है तथा जन्म-मरण के बन्धन से मुक्त हो जाता है। वामन पुराण (39.20 और 23) में इसे ब्रह्मयोनि तीर्थ कहा गया है। पृथूदक थानेश्वर से 14 मील पश्चिम कर्नाल जिले में स्थित आधुनिक पिहोवा है।
वामन (34.3) और नारदीय पुराण (उत्तरार्द्ध, 65.4.7) में कुरुक्षेत्र के सात वनों--काम्यकवन, अदितिवन, व्यासवन, फलकीवन, सूर्यवन, मधुवन और सीतावन का उल्लेख है जो बहुत पवित्र हैं और पाप का नाश करने वाले हैं। तीर्थों की सूची में कुरुक्षेत्र को सन्तिहती या सन्निहत्य के नाम से अभिहित किया गया है। वामन पुराण (32.3-4) के अनुसार सरस्वती का उद्गम प्लक्ष वृक्ष से हुआ है। वहाँ से कई पहाड़ियों को वेधते हुए वह द्वैतवन में प्रवेश करती है। वामन पुराण (32.6-22) में मार्कण्डेय द्वारा सरस्वती की प्रशंसा की गयी है।

कुलचूडामणितन्त्र
एक महत्वपूर्ण तन्त्र ग्रन्थ। इसमें 64 तन्त्रों की सूची दी हुई है, जो 'वामकेश्वरतन्त्र' की सूची से मिलती-जुलती है।

कुलशेखर
तमिल वैष्णवों में बारह आलवारों (भक्त कवियों) के नाम बहुत प्रसिद्ध हैं। कुलेश्वर इनमें ही हुए हैं। दे० आलवार। स्थानीय परम्परा के अनुसार कुलशेखर का जन्म कलि के आरम्भ में मलावीर के चात्मपट्टन या तिरुमञ्ज‍िक्कोलम् नामक स्थान में हुआ था। उन्होंने, 'मुकुन्दमाला' नामक सरस स्तोत्र की रचना की है।

कुलसारतन्त्र
कुलचूडामणितन्त्र' की सूची में उद्धृत एक ग्रन्थ। इसमें कौल सम्प्रदाय के सिद्धान्तों का संक्षेप में वर्णन किया गया है।

कुलार्णव
बहुप्रचलित तन्त्र ग्रन्थ। इसके अनुसार तान्त्रिक गण कई प्रकार के आचारों में विभक्त हैं। उनमें वेदाचार सामान्यतः श्रेष्ठ है, वेदाचार से वैष्णवाचार महान् है, वैष्णवाचार से शैवाचार उत्कृष्ट है, शैवाचार से दक्षिणाचार उत्तम है, दक्षिणाचार से वामाचार प्रशंसनीय है, वामाचार से सिद्धान्ताचार श्रेष्ठ है और सिद्धान्ताचार की अपेक्षा कौलाचार उत्तम है। कौलाचार से उत्तम और कोई आचार नहीं है। इस ग्रन्थ में इन्हीं कौल आचारों और सिद्धान्तों का विस्तृत वर्णन पाया जाता है।

कुलालिकाम्नाय
इस तन्त्र ग्रन्थ में भारत के तीन यानों का उल्लेख है :
दक्षिणे देवयानं तु पितृयानं तु उत्तरे। मध्ये तु महायानं शिवसंज्ञा प्रगीयते।।
[दक्षिण में देवयान, उत्तर में पितृयान और मध्यदेश में महायान प्रचलित हैं।] इन यानों की विशेषता तो ठीक ठीक मालूम नहीं है, परन्तु महायानी श्रेष्ठ तन्त्र 'तथागतगुह्यक' से पता लगता है कि रुद्रयामलादि में जिसे वामाचार अथवा कौलाचार कहा गया है वही महायानियों का अनुष्ठेय आचार है। इसी समप्रदाय से क्रमशः 'कालचक्रयानं' या 'कालोत्तरमहायान' तथा वज्रयान की उत्पत्ति हुई। नेपाल के सभी शाक्त-बौद्ध वज्रयान समप्रदाय के हैं।

कुलीनवाद
कुलीन' का मूल अर्थ है श्रेष्ठ परिवार का व्यक्ति। कुलीनवाद का अर्थ हुआ 'पारिवारिक श्रेष्ठता का सिद्धान्त'। इसके अनुसार श्रेष्ठ परिवार में ही उत्तम गुण होते हैं। अतः विवाहादि सम्बन्ध भी उन्हीं के साथ होना चाहिए। धर्मशास्त्र के अनुसार जिस परिवार में लगातार कई पीढ़ियों तक वेद-वेदाङ्ग का अध्ययन होता हो, वह कुलीन कहलाता है। शैक्षणिक प्रतिष्ठा के साथ विवाह सम्बन्ध में इस प्रकार के परिवार बंगाल में श्रेष्ठ माने जाते थे। सेनवंश के शासन काल में कुलीनता का बहुत प्रचार हुआ। विवाह सम्बन्ध में कुलीन परिवारों की प्रतिष्ठा बहुत बढ़ गयी। इस पर बहुत ध्यान दिया जाता था कि पुत्री अपने से उच्च कुल के वर से ब्‍याही जाय। फल यह हुआ कि कुलीन वरों की माँग अधिक हो गयी और इससे अनेक प्रकार की कुरीतियाँ उत्पन्न हुई। बंगाल में यह कुलीन प्रथा खूब बढ़ी तथा वहाँ एक-एक कुलीन ब्राह्मण ने बहुत ही ऊँचा दहेज लेकर सौ-सौ से अधिक कुमारियों का पाणिग्रहण करते हुए उनका 'उद्धार' कर डाला। शिशुहत्या भी इस प्रथा का एक कुपरिणाम थी, क्योंकि विवाह को लेकर कन्या एक समस्या बन जाती थी। अंग्रेजों ने इस शिशुहत्या को बन्द कर दिया तथा आधुनिक काल के अनेक सुधारवादी समाजों की चेष्टा से कुलीनवाद का ढोंग कम होता गया और आज यह प्रथा प्रायः समाप्त हो चुकी है।
कुलदीपिका नामक ग्रन्थ में कुल की परिभाषा और कुलाचार का वर्णन निम्नाङ्कित प्रकार से पाया जाता है :
आचारो विनयो विद्या प्रतिष्ठा तीर्थदर्शनम्। निष्ठाऽवृत्तिस्तपो दानं नवधा कुललक्षणम्।।
[आचार, विनय, विद्या, प्रतिष्ठा, तीर्थदर्शन, निष्ठा, वृत्ति का अत्याग, तप और दान ये नौ प्रकार के कुल के लक्षण हैं।]
आदानञ्च प्रदानञ्च कुशत्यागस्तथैव च। प्रतिज्ञा घटकाग्रे च कुलकर्म चतुर्विधम्।।
[आदान, प्रदान, कुशत्याग, प्रतिज्ञा और घटकाग्र ये कुलकर्म कहे गये हैं।] राजा वल्लालसेन ने पञ्चगोत्रीय राढीय बाईस कुलों को कुलीन घोषित किया था। बंगाल में इनकी वंशपरम्परा अभी तक चली आ रही है।

कुलेश्वरीतन्त्र
यह मिश्र तन्त्रों में से एक तन्त्र है।

कुल्लजम साहेब
अठारहवीं शताब्दी में विरचित सन्त साहित्य का एक ग्रन्थ। इसके रचयिता स्वामी प्राणनाथ ने इसमें बतलाया है कि भारत के सभी धर्म एक ही पुरुष (ईश्वर) में समाहित हैं। ईसाइयों के मसीहा, मुसलमानों के मदी एवं हिन्दुओं के निष्कलंकावतार सभी एक ही व्यक्ति के रूप हैं। दे० 'प्राणनाथ'।


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