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Hindu Dharmakosh (Hindi-Hindi)

कुब्जिकातन्त्र
आगमतत्त्वविलास' की तन्त्रसूची में 55 वाँ स्थान 'कुब्जिकातन्त्र' का है। इसमें निगूढ़ तान्त्रिक क्रियाओं का वर्णन है।

कुब्जिकामतन्त्र
एक प्राचीन तन्त्रग्रन्थ। गुप्तकालीन भाषाशैली में लिखित होने के कारण इसका रचनाकाल लगभग सातवीं शताब्दी प्रतीत होता है।

कुबेरतीर्थ
कुरुक्षेत्र के समीप यह स्थान भद्रकाली मन्दिर से थोड़ी दूर सरस्वती नदी के तट पर स्थित है। यहाँ कुबेर ने यज्ञों का अनुष्ठान किया था। इसी प्रकार नर्मदातट पर भी एक कुबेरतीर्थ विख्यात है।

कुबेरव्रत
तृतीय तिथि को इस व्रत का अनुष्ठान किया जाता है। इसमें कुबेर की पूजा होती है।

कुमार-वाल्मीकि
माध्व मतावलम्बी किसी कुमार-वाल्मीकि नामक कवि ने रामायण का कन्नड भाषा में अनुवाद किया है। इसी अनुवाद को 'कुमार-वाल्मीकि' कहते हैं। धार्मिक होने की अपेक्षा यह अनुवाद विनोदपूर्ण अधिक है। मध्वमत के प्रचार में इसने यथेष्ट सहायता पहुँचायी है। कर्णाटक में यह बहुत लोकप्रिय है।

कुमारषष्ठी
चैत्र शुक्ल षष्ठी को इस व्रत का आरम्भ होता है और यह एक वर्ष पर्यन्त चलता है। मिट्टी की द्वादश भुजा वाली स्कन्द की मूर्ति का पूजन इसमें किया जाता है।

कुमारिल
कर्ममीमांसा शास्त्र के उत्कर्ष काल में इसके दो महान् आचार्यों का प्रादुर्भाव हुआ, जिनमें पहले हैं प्रभाकर, जिन्हें 'गुरु' भी कहते हैं तथा दूसरे हैं कुमारिल, जिन्हें भट्ट भी कहते हैं। दोनों ने शबर के भाष्य की व्याख्या की है किन्तु दोनों की व्याख्या में अन्तर है। दोनों ने दो प्रतिद्वन्द्वी सम्प्रदायों को जन्म दिया। प्रभाकर का काल अज्ञात है किन्तु यह निश्चित है कि वे कुमारिल के पूर्व हुए। प्रभाकर का ग्रन्थ 'बृहती' शाबरभाष्य का स्पष्टीकरण मात्र है; उसमें कुछ आलोचना नहीं है। कुमारिल आठवीं शताब्दी के पूर्वार्ध में हुए, उन्होंने शाबरभाष्य पर एक विस्तृत व्याख्या की रचना की जिसके तीन भाग हैं, और उनमें शबर से यथेष्ट अन्तर परिलक्षित होता है।
कुमारिल की रचना के तीन भाग है : (1) श्लोकवार्तिक (पद्य), जो प्रथम अध्याय के प्रथम पाद पर है; (2) तन्त्रवार्तिक (गद्य) जो प्रथम अध्याय के अवशेष तथा अध्याय दो और तीन पर है और (3) टुप्टीका (गद्य) अध्याय 4 से 12 पर संक्षिप्त टिप्पणी है। कुमारिल की प्रणाली पर मण्डन मिश्र ने, जो बाद में शङ्कर के शिष्य (सुरेश्वराचार्य) हो गये थे, अनेकों ग्रन्थों की रचना की।
प्रभाकर एवं कुमारिल दोनों ने अनीश्वरवाद का निर्वाह प्रकृति के सृष्टिक्रम में दैवी कार्य की अनावश्यकता बताते हुए किया है। दोनों इस विषय पर यथार्थवादी दृष्टिकोण रखते हैं। किन्तु दोनों का आत्मा की विशुद्ध चेतनता, प्रत्यक्ष एवं अनुमान आदि तार्किक तत्त्वों में मतान्तर है। कुमारिल ने कर्ममीमांसा एवं उसके बाहर के दर्शनों पर भी सक्रिय प्रभाव डाला। वे बौद्ध मत के कठोर आलोचक थे तथा जब कभी वे विजययात्रा में निकले, उन्होंने इस मत के प्रत्याख्यान करने का यत्न किया।
कुमारिल के अनुसार वेद के शब्द, वाक्य और क्रम नित्य हैं। कुमारिल ने शब्द को द्रव्य माना है। शब्द तो नित्य है ही, उसका अर्थ भी नित्य है और शब्द तथा अर्थ का सम्बन्ध भी नित्य है। शब्द की नित्यता पर जो युक्तियाँ उन्होंने प्रस्तुत की हैं, वे बहुत प्रौढ़ और वैज्ञानिक हैं। कुमारिल ने द्रव्य, गुण, कर्म, सामान्य और अभाव ये पाँच पदार्थ माने हैं। पूर्व मीमांसा के अन्य सिद्धान्त उन्हें मान्य हैं, यद्यपि शबरभाष्य की आलोचना यत्र-तत्र उनके द्वारा हुई है।
कुमारिल का आधुनिक हिन्दूत्व की स्थापना में बहुत बढ़ा हाथ है। उनकी प्रणाली वेदों एवं ब्राह्मणों पर आधृत है। वे उसके बाहर के सभी पक्षों का निराकरण करते हैं।
कर्ममीमांसा में प्रभाकर एवं कुमारिल ने ही प्रथम बार मुक्ति का वर्णन किया है। उनका कथन है कि मुक्तिलाभ धर्म एवं अधर्म दोनों के समाप्त हो जाने पर ही हो सकता है और जो मुक्ति चाहता है उसे केवल आवश्यक कर्तव्यों का पालन करना चाहिए।

कुमारी
(1) शिवपत्नी पार्वती के अनेकों नाम एवं गुण शिव के समान ही हैं। उनका एक नाम 'कुमारी' भी है। तैत्तिरीय आरण्यक (10.1.7) में उन्हें कन्या कुमारी कहा गया है। स्कन्दपुराण के कुमारीखण्ड में कुमारी का चरित्र और माहात्म्य विस्तार से वर्णित है। भारत का दक्षिणान्त अन्तरीप (कुमारी अन्तरीप) उन्‍हीं के नाम से सम्बन्धित है।
(2) 'कुमारी' नाम 'कुमार' का युग्म (जोड़) या समकोटिक भी है। यह ऐसी उग्र कुमारिका ग्रहों का सूचक है, जो शिशुओं का भक्षण करती हैं।
(3) स्मृतियों में द्वादश वर्षीया कन्या का नाम भी कुमारी कहा गया है :
अष्टवर्षा भवेद् गौरी दशवर्षा च रोहिणी। सम्प्राप्ते द्वादशे वर्षे कुमारीत्यभिधीयते।।
[अष्ट वर्ष की कन्या गौरी और दस वर्ष की रोहिणी होती है। बारह वर्ष प्राप्त होने पर वह कुमारी कहलाती है।]
अन्नदाकल्प' आदि आगम ग्रन्थों में कुमारीपूजन के प्रसंग में कुमारी अजातपुष्पा (जिसके रजोधर्म न होता हो) कन्या को कहा गया है। सोलह वर्ष पर्यन्त वह कुमारी रह सकती है। वयभेद से उसके कई नाम बतलाये गये हैं :
एकवर्षा भवेत् सन्ध्या द्विवर्षा च सरस्वती। त्रिवर्षा तु त्रिधामूर्तिश्चतुर्वर्षा तु कालिका।। सुभगा पञ्चवर्षा च षड्वर्षा च उमा भवेत्। सप्तभिर्मालिनी साक्षादष्टवर्षा च कुब्जिका।। नवभिर्कालसङ्कर्षा दशभिश्चापराजिता। एकादशे तु रुद्राणी द्वादशाब्दे तु भैरवी।। त्रयोदशे महालभ्मीद्विसप्ता पीठनायिका। क्षेत्रज्ञा पञ्चदशभिः षोडशे चान्नदा मता।। एवं क्रमेण सम्पूज्या यावत् पुष्पं न जायते। पुष्पितापि च सम्पूज्या तत्पुष्पादानकर्मणि।। कुमारीपूजन की विधि निम्नलिखित प्रकार से बतायी गयी है :
अथान्यत्साधनं वक्ष्ये महाचीनक्रमोद्भवम्। येनानुष्ठितमात्रेण शीघ्रं देवी प्रसीदति।। अष्टम्याञ्च चतुर्दश्यां कुह्वां वा रविसंक्रमे। कुमारीपूजनं कुर्यात् यथा विभवमात्मनः।। वस्त्रालङ्करणाद्यैश्च भक्ष्यभोज्यै: सुविस्तरैः। पञ्चतत्त्वादिभिः सम्यग् देवीबुद्ध्या सुसाधकः।।

कुमारीतन्त्र
आगमतत्त्वविलास' की तन्त्रसूची में 'कुमारी तन्त्र' का छठा क्रमिक स्थान है। इसमें कुमारीपूजन का विस्तृत वर्णन पाया जाता है।

कुमारीपूजा
नवरात्र में इस व्रत का अनुष्ठान होता है। दे० समयमयूख, 22। विशेष विवरण के लिए दे० 'कुमारी'।


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