किसी अनुष्ठान में मुख्य मन्त्र के पूर्व जो पाठ किया जाता है उसको कीलक कहते हैं। इसका शाब्दिक अर्थ है 'कील ठोंक कर दृढ़ता से गाड़ना'। कील दृढ़ता का प्रतीक है। कीलकस्तोत्र का उदाहरण दुर्गासप्तशती में देखा जा सकता है, जिसमें चण्डीपाठ के पूर्व कुछ अन्य पवित्र स्तोत्र पढ़े जाते हैं, जैसे कवच, कीलक एवं अर्गला स्तोत्र जो मार्कण्डेय एवं वराह पुराण के उद्धरण हैं।
कीलाल
ऋग्वेद के सिवा अन्य संहिताओं में 'कीलाल' शब्द का प्रयोग 'मीठे पेय' अर्थ में हुआ है। पुरुषमेध यज्ञ की बलिसूची में सुराकार का नाम भी कीलाल के रूप में आया है, इसलिए इस पेय की प्रकृति भी निश्चय ही सुरा के समान रही होगी।
कुंकुम
केसर, जो सुगन्ध और रक्त-पीत रंग के लिए प्रसिद्ध अलंकरण द्रव्य है। देवपूजा में चन्दन के साथ मिलाकर इसका उपयोग होता है। लक्ष्मी, दुर्गा आदि देवियों की पूजा में कुंकुम अलग से भी चढ़ाई जाती है। यह कश्मीर में उपजती है, अतः दुर्लभता के कारण इसके स्थान पर रोली का उपयोग होता है इसलिए अब रोली ही कुंकुम नाम से प्रचलित है। रोली हलदी से बनती है अतः यह भी मांगलिक प्रतीक है, जो स्मार्तों के द्वारा देवी की पूजा में यन्त्र (देवी की प्रतिमासूचक वस्तु) पर चढ़ाया जाता है।
कुक्कुटी-मर्कटीव्रत
भाद्र शुक्ल सप्तमी को इस व्रत का अनुष्ठान होता है। प्रत्येक सप्तमी को व्रत करते हुए एक वर्ष तक यह क्रम चलाना चाहिए। सप्तमी चाहे कृष्णपक्षीय हो या शुक्लपक्षीय। अष्टमी के दिन तिल, चावल (गुड़ से युक्त) ब्राह्मण को दान में देना चाहिए। एक वृत्त में भगवान् शिव तथा अम्बिका की आकृतियाँ बनाकर उनका पूजन करें। 'तिथितत्त्व' (पृ० 37) में इसे कुक्कुटीव्रत कहा गया है। व्रत करने वाले को जीवन पर्यन्त भुजा में सुवर्ण अथवा रजततार से युक्त सूत के धागे बाँधे रहना चाहिए। कथा है कि एक रानी तथा राजपुरोहित की पत्नी मर्कटी अर्थात् वानरी तथा कुक्कुटी अर्थात् मुर्गी हो गया थीं, क्योंकि वे इस धागे को बाँधना भूल गयी थीं। इस कथा का वर्णन कृष्ण ने युधिष्ठिर से किया है।
कुक्कुटेश्वरतन्त्र
आगमतत्त्वविलास' में लिखित तन्त्रों की सूची में सोलहवाँ स्थान 'कुक्कुटेश्वर तन्त्र' को प्राप्त है।
कुण्डलिया
(गिरिधर कविराय कृत) नैतिक उपदेशों से भरी एवं सामाजिक उपयोगितापूर्ण कुण्डलियों की रचना, जो अठारहवीं शताब्दी के एक सुधारवादी हिन्दी कवि गिरिधर कविराय ने की है। हिन्दी नीति साहित्य में गिरिधर कविराय की कुण्डलियाँ बहुत प्रसिद्ध हैं।
कुण्डकोपनिषद्
त्याग-वैराग्य प्रतिपादक एक उपनिषद् संन्यास धर्म की निदर्शक उपनिषदों में यह प्रमुख मानी जाती है।
कुत्स
ऋग्वेदीय मन्त्रों के साक्षात्कर्ता ऋषियों में से एक ऋषि। अष्टाध्यायी (पाणिनि) के सूत्रों में जिन पूर्वाचार्यों के नाम आये हैं उनमें कुत्स भी हैं। पौराणिक कथाओं के अनुसार इन्द्र ने इन्हें बहुत ताडित किया, किन्तु फिर प्रसन्न होकर सुष्ण दैत्य से इनकी रक्षा की। एक बार इन्द्र इनको अमरावती में अपने प्रासाद में ले गया। इन्द्र और कुत्स दोनों आकार और सौन्दर्य में समान थे। इन्द्र की पत्नी शची पहचान न सकी कि उसका पति इन्द्र कौन सा है।
कुत्स औरव
पञ्चविंश ब्राह्मण के अनुसार कुत्स औरव ने अपने पारिवारिक पुरोहित उपगु सौश्रवस का वध इस लिए कर डाला था कि सौश्रवस के पिता इन्द्र की पूजा के अधिक पक्षपाती थे। इस तथ्य का समर्थन ऋग्वेद के कुछ सूक्तों में कुत्स एवं इन्द्र की प्रतियोगिता के वर्णन से प्राप्त होता है।
कुन्दचतुर्थी
माघ शुक्ल चतुर्थी। इस तिथि को देवीपूजा होती है। कुन्दपुष्प, शाक, सब्जी, नमक, शक्कर, जीरा आदि वस्तुएँ कन्याओं को दान में दी जाती हैं। चतुर्थी के दिन उपवास का विधान है। यह गौरीचतुर्थी के नाम से भी प्रसिद्ध है। चतुर्थी को उपवास ही इस व्रत का मुख्य अङ्ग है। उस दिन उक्त दान देने से सौभाग्य की उपलब्ध होती है।