महात्मा किनाराम का जन्म बनारस जिले के क्षत्रिय कुल में विक्रम सं० 1758 के लगभग हुआ। द्विरागमन के पूर्व ही पत्नी का देहान्त हो गया। उसके कुछ दिन बाद उदास होकर घर से निकल गये और उसके कुछ दिन बाद उदास होकर घर से निकल गये और गाजीपुर जिले के कारो नामक गाँव के संयोगी वैष्णव महात्मा शिवादास कायस्थ की सेवा-टहल में रहने लगे और कुछ दिनों के बाद उन्हीं के शिष्य हो गये। कुछ वर्ष गुरुसेवा करके उन्होंने गिरनार पर्वत की यात्रा की। वहाँ भगवान् दत्तात्रेय का दर्शन किया और उनसे अवधूत वृत्ति की शिक्षा लेकर उनकी आज्ञा से काशी लौटे। यहाँ उन्होंने बाबा कालूराम अघोरपन्थी से अघोर मत का उपदेश लिया। दे० 'अघोर मत' अथवा 'कापालिक'। वैष्णव भागवत और फिर अघोरपन्थी होकर किनाराम ने उपासना का एक अद्भुत सम्मिश्रण किया। वैष्णव रीति से ये रामोपासक हुए और अघोर पन्थ की रीति से मद्य-मांसादि के सेवन में इन्हें कोई आपत्ति न हुई। साथ ही इनके समक्ष जाति-पाँति का कोई भेदभाव न था। इनका पन्थ अलग ही चल पड़ा। इनके शिष्य हिन्दू-मुसलमान सभी हुए।
जीवन में अपने दोनों गुरुओं की मर्यादा निवाहने के लिए इन्होंने वैष्णव मत के चार स्थान मारुफपुर, नयी डीह, परानापुर और महुपुर में और अघोर मत के चार स्थान रामगढ़ (बनारस), देवल (गाजीपुर), हरिहरपुर (जौनपुर) और कृमिकुण्ड (काशी) में स्थापित किये। ये मठ अब तक चल रहे हैं। इन्होंने भदैनी में कृमिकुण्ड पर स्वयं रहना आरम्भ किया। काशी में अब भी इनकी प्रधान गद्दी कृमिकुण्ड पर है। इनके अनुयायी सभी जाति के लोग हैं। रामावतार की उपासना इनकी विशेषता है। ये तीर्थयात्रा आदि मानते हैं, इन्हें औघड़ भी कहते हैं। ये देवताओं की मूर्ति की पूजा नहीं करते। अपने शवों को समाधि देते हैं, जलाते नहीं। किनाराम बाबा ने संवत् 1800 वि० में 142 वर्ष की अवस्था में समाधि ली।
किनारामी (अघोरपन्थी)
दे० 'किनाराम'।
किमिच्छाव्रत
मार्कण्डेय पुराण के अनुसार इस व्रत में अतिथि से पूछा जाता है कि वह क्या चाहता है? इसके विषय में करन्धम के पुत्र अवीक्षित की एक कथा आती है, जिसके अनुसार उसकी माता ने इस व्रत का आचरण किया था तथा उसने अपनी माता को सर्वदा इस व्रत का आचरण करने का वचन दिया था। अवीक्षित ने घोषणा की थी :
[मेरे सब याचक सुन लें, किमिच्छक व्रत करते हुए मैंने प्रतिज्ञा की है-- आप क्या चाहते हैं, मैं वही दान करूँगा।]
किरण
रौद्रिक आगमों में से यह एक आगम है। 'किरणागम' की सबसे पुरानी हस्तलिखित प्रति 924 ई० (हरप्रसाद शास्त्री, 2,124) की उपलब्ध है।
किरणावली
वैशेषिक दर्शन के ग्रन्थलेखक आचार्यों में उदयन का महत्त्वपूर्ण स्थान है। उनका वैशेषिक मत पर पहला ग्रन्थ है 'किरणावली', जो प्रशस्तपाद के भाष्य का व्याख्यान है। यह दशम शताब्दी की रचना है।
किरणावलीप्रकाश
वर्धमान उपाध्याय द्वारा रचित द्वादश शताब्दी का यह ग्रन्थ उदयन कृत 'किरणावली' की व्याख्या है।
कीर्तन सोहिला
सिक्खों की एक प्रार्थनापुस्तक। सिक्खों की मूल प्रार्थनापुस्तिका का नाम 'पञ्जग्रन्थी' है। इसके पाँच भाग हैं-- (1) जपजी, (2) रहिरासु, (3) कीर्तन सोहिला, (4) सुखमनी और (5) आसा दी वार। इनमें से प्रथम तीनों का खालसा सिक्खों को नित्य पाठ करना चाहिए।
कीर्तनीय
चैतन्य सम्प्रदाय में सामूहिक कीर्तन के प्रमुख को कीर्तनीय कहते हैं। इस सम्प्रदाय के मन्दिरों में प्रायः राधा-कृष्णा की मूर्तियों के साथ ही चैतन्य, अद्वैत एवं नित्यानन्द की मूर्तियाँ भी स्थापित रहती है। केवल चैतन्य महाप्रभु की ही मूर्ति किसी-किसी मन्दिर में पायी जाती है। पूजा में प्रधानता संकीर्तन की रहती है। 'कीर्तनीय' (प्रधान संकीर्तक) तथा उसके दल वाले जगमोहन (प्रधान मन्दिर के सामने के भाग) में बैठते हैं तथा झाल एवं मृदंग बजाकर कीर्तन करते हैं। कीर्तनीय बीच-बीच में आत्मविभोर हो नाच भी उठता है। एक या अधिक बार 'गौरचन्द्रिका' के गायन का नियम है।
कीर्तिव्रत
यह संवत्सरव्रत है। इसमें व्रती पीपल वृक्ष, सूर्य तथा गङ्गा को प्रणाम करता है, इन्द्रियों का निग्रह कर एक स्थान पर निवास करता है, केवल मध्याह्न में एक बार भोजन करता है। इस प्रकार का आचरण एक वर्ष तक किया जाता है। व्रत की समाप्ति के पश्चात् व्रती किसी अच्छे सपत्नीक ब्राह्मण का पूजन करता है तथा उसे तीन गौओं के साथ एक सुवर्णवृक्ष दान में देता है। इस व्रत के आचरण से मनुष्य यश तथा भूमि प्राप्त करता है।
कीर्तिसंक्रान्तिव्रत
संक्रान्ति के दिन धरातल पर सूर्य की आकृति खींचकर उस पर सूर्य की प्रतिमा स्थापित करके पूजन किया जाता है। एक वर्ष पर्यन्त यह अनुष्ठान होना चाहिए। इसके फलस्वरूप मनुष्य को यश, दीर्घायु, राज्य तथा स्वास्थ्य की प्राप्ती होती है।