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Definitional Dictionary of Philosophy (English-Hindi)
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Figurative Definition
आलंकारिक परिभाषा वह दोषयुक्त परिभाषा जिसमें परिभाष्य पद की जाति और अवच्छेदक गुण बताने की अपेक्षा उपमा और रूपक का प्रयोग किया गया हो। जैसे : `ऊँट रेगिस्तान का जहाज है।`

Figure
आकृति तर्कशास्त्र में, न्यायवाक्य का तीन पदों (साध्य, हेतु और पक्ष) की सापेक्ष स्थिति से निर्धारित रूप चार आकृतियाँ होती हैं। प्रथम आकृति में हेतु-पद साध्य-आधारवाक्य में उद्देश्य और पक्ष आधारवाक्य में विधेय होता है; द्वितीय आकृति में वह दोनों में विधेय होता है; तृतीय आकृति में वह दोनों में उद्देश्य होता है; और चतुर्थ आकृति में वह साध्य-आधारवाक्य में विधेय और पक्ष-आधारवाक्य में उद्देश्य होता है।

Figured Syllogism
साकृति न्यायवाक्य एक निश्चित आकृति में व्यक्त न्यायवाक्य। उदाहरण : सभी मनुष्य मरणशील हैं; राम एक मनुष्य है; ∴ राम मरणशील है। (प्रथम आकृति में व्यक्त एक न्यायवाक्य)

Final Cause
अन्तिम कारण अरस्तू के द्वारा चार प्रकार के कारणों में से अन्तिम, जो कि किसी वस्तु की उत्पत्ति के पीछे उत्पादन-कर्ता का प्रयोजन या उद्देश्य होता है।

Finalism
प्रयोजनवाद वह सिद्धांत कि भौतिक जगत् की उत्पत्ति और उसकी घटनाओं के मूल में कोई प्रयोजन होता है, तथा कुछ भी आकस्मिक या निष्प्रयोजन नहीं है।

Finality
1. परिनिष्पन्नता : अन्तिम होने की अवस्था। 2. सप्रयोजनता : किसी घटना या कर्म के किसी प्रयोजन की पूर्ति के लिए होने की विशेषता।

Final Judgement
कल्पान्त-निर्णय ईसाइयों में प्रचलित एक विश्वास के अनुसार, सृष्टि के अन्त में सभी जीवित और मृतक मनुष्यों के कर्मों पर ईश्वर के द्वारा दिया जाने वाला निर्णय।

Final Perseverance
अन्तिम स्थायित्व (कृपाजनित) जॉन कैल्विन के अनुयायियों की एक मान्यता के अनुसार, ईसा में आस्था के पश्चात् नवजीवन-प्राप्त पापात्माओं को ईश्वरीय कृपा से मिलने वाला अमरत्व।

Finite Mode
परिमित पर्याय स्पिनोज़ा ने परम तत्त्व को `द्रव्य` बताया है और विश्व की समस्त वस्तुओं और जीवात्माओं को उसके अनन्त गुणों में विचार और विस्तार के सीमित विकार माना है। वे सीमित विकार ही `परिमित पर्याय` हैं।

Finitism
1. परिमिततावाद, परिच्छिन्नतावाद : वह मत कि यद्यपि ईश्वर मंगलमय और नैतिक दृष्टि से पूर्णतः शुभ है, फिर भी उसकी शक्ति उन परिस्थितियों के कारण सीमित हो जाति है जिनको बनाने में उसका कोई हाथ नहीं होता। 2. सान्त दृष्टांतवाद, नियतोदाहरणवाद : वह मत कि केवल वे वाक्य ही सार्थक हैं जिनमें समाविष्ट उदाहरणों की संख्या परिमित होती है और इसलिए जिनका सत्यापन किया जा सकता है।


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