अपमार्जन दर्शन
नव यथार्थवादियों द्वारा प्रत्ययवादी दर्शन को दिया गया अनादरसूचक नाम, जो उनके कथनानुसार वस्तु-जगत् के स्वतंत्र अस्तित्व का लोप ही कर देता है।
Obscure Definition
अस्पष्ट परिभाषा
वह दोषयुक्त परिभाषा जिसमें दुर्बोध भाषा का प्रयोग किया गया हो, जैसे `जीवन शरीरान्तर्गत एकत्रीभूत अभौतिक पदार्थ है।`
Obstacularity
प्रतिघता
प्राइस (Price) के अनुसार, बाह्य वस्तु में पाई जाने वाली यह विशेषता कि वह उसकी स्थिति में परिवर्तन चाहने वाले की चेष्टा का प्रतिरोध करती है।
Obverse
प्रतिवर्तित
वह निष्कर्ष जो प्रतिवर्तन के द्वारा प्राप्त होता है।
Obversion
प्रतिवर्तन
अनन्तरानुमान का वह रूप जिसमें आधारवाक्य के विधेय का व्याघाती पद निष्कर्ष वाक्य का विधेय होता है और निष्कर्ष वाक्य का
गुण आधारवाक्य के गुण से भिन्न होता है। अर्थात् आधारवाक्य यदि विध्यात्मक हो तो निष्कर्ष निषेधात्मक और यदि आधारवाक्य निषेधात्मक हो तो निष्कर्ष विध्यात्मक होता है किन्तु आधारवाक्य एवं निष्कर्ष के अर्थ और परिमाण में कोई परिवर्तन नहीं होता है।
जैसे : सभी मनुष्य मरणशील हैं - प्रतिवर्त्य (आ वा)
कोई मनुष्य अमरणशील नहीं है - प्रतिवर्तित (निष्कर्ष)
यह आ, ए, इ एवं ओ में वैध होता है।
Obverted Contrapositive
प्रतिवर्तित प्रतिपरिवर्तित
प्रतिपरिवर्तन की क्रिया से प्राप्त निष्कर्ष का प्रतिवर्तन करने से प्राप्त वाक्य, अर्थात् किसी दिए हुए वाक्य का क्रमशः प्रतिवर्तन, परिवर्तन और पुनः प्रतिवर्तन करने से प्राप्त वाक्य।
उदाहरण : सभी उ वि हैं;
कोई उ-अ-वि नहीं है (प्रति.);
कोई अ-वि उ नहीं है (परि.)
∴ सभी अ-वि अ-उ हैं (प्रति प्रतिपरि.)।
Obverted Converse
प्रतिवर्तित-परिवर्तित
परिवर्तन से प्राप्त निष्कर्ष का प्रतिवर्तन करके प्राप्त होने वाला वाक्य या प्रतिज्ञप्ति।
उदाहरण : सभी स प हैं;
∴ कुछ प स है; (परिवर्तित)
∴ कुछ प अ-स नहीं हैं (प्रतिवर्तित परिवर्तित)
Obvertend
प्रतिवर्त्य
वह प्रतिज्ञप्ति जिसका प्रतिवर्तन किया जाना है। देखिए, `obversion`।
Occam'S Razor
ओकम-न्याय, लाघव-न्याय
वैज्ञानिक व्याख्या का एक सिद्धांत जिसके अनुसार `यदि आवश्यक न हो तो बहुत-सारी वस्तुओं की कल्पना नहीं करनी चाहिए` अथवा `यदि कम वस्तुओं से काम चल जाता है तो अधिक वस्तुओं को मानना व्यर्थ है।` यह सिद्धांत भारत में `कल्पना-लाघव` या `लाघव-न्याय` के नाम से बहुत पहले से प्रसिद्ध है और पश्चिम में भी ओकम (William of Occam, 1300-1349) के नाम से प्रसिद्ध होने के बावजूद पहले से प्रयोग में है।
Occasionalism
प्रसंगवाद, संयोगवाद
मन और शरीर के संबंध को समझने के लिये देकार्त के अनुयायियों गुलिंग्स तथा मेलब्रान्श (Malebranche) के द्वारा स्थापित सिद्धांत। इसके अनुसार मन एवं शरीर दोनों परस्पर विरूद्धधर्मी होने के कारण एक दूसरे पर क्रिया-प्रतिक्रिया नहीं कर सकते किन्तु फिर भी दोनों में संवादिता है, इस संवादिता का कारण ईश्वर है। ईश्वर किसी एक में परिवर्तन होने पर दूसरे में भी उसी प्रकार का परिवर्तन उत्पन्न कर देता है। जैसे : जब शरीर में कुछ परिवर्तन होते हैं, तब ईश्वर उन्हीं के अनुरूप मनस् में संवेदना उत्पन्न कर देता है और जब मन में कुछ इच्छाएँ या संकल्प उत्पन्न होते हैं तो ईश्वर उन्हीं के संवाद में शरीर में गति उत्पन्न कर देता है।