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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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सर्वज्ञातृत्व

सत्त्व -पुरुष की अन्यताख्याति (बुद्धितत्त्व एवं पुरुषतत्त्व अत्यन्त भिन्न हैं – ऐसा निश्चय, जो समाधि द्वारा ही साध्य है) होने पर योगी में सर्वज्ञातृत्वरूप सिद्धि होती है (योगसूत्र 3/49)। यह सर्वज्ञातृत्व विवेकज ज्ञान भी कहलाता है। यह विवेकजज्ञान रूप सर्वज्ञता विवेकख्याति की तुलना में निकृष्ट है, क्योंकि यह ज्ञान कैवल्य का साधक नहीं है तथा सभी त्रैगुणिक वस्तुओं से सम्बन्धित है। शान्त, उदित और अव्यपदेश्य धर्मों के रूप में व्यवस्थित सर्वात्मक गुणत्रय का जो अक्रम ज्ञान है, वही यह सर्वज्ञातृत्व है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सर्वतोभद्र

जाग्रत् आदि दशाओं को शिवयोगियों ने अपनी ही विशेष संज्ञाएँ दे रखी हैं। शिवज्ञानियों ने भी ऐसा ही किया है। तदनुसार शिवज्ञानी लोग जाग्रत् दशा को सर्वतोभद्र नाम से कहते हैं। इसे ही शिवयोगी पिंडस्थ नाम देते हैं। पिंडस्थ / सर्वतोभद्र के चार प्रकार माने गए हैं जो उत्तरोत्तर उत्कृष्ट हैं। वे हैं अबुद्ध (साधारण प्राणी), बुद्ध (बौद्ध ज्ञानवान्), प्रबुद्ध (आत्मसाक्षात्कारी) और सप्रबुद्ध (ज्ञान की पूर्णता को प्राप्त) साधक।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सर्वभावाधिष्ठातृत्व

बुद्धि और पुरुष अत्यन्त भिन्न हैं – इस ज्ञान में प्रतिष्ठित योगी में सर्वभावाधिष्ठातृत्व तथा सर्वज्ञातृत्व रूप दो सिद्धियाँ होती हैं (योगसूत्र 3/49)। ग्रहण और ग्राह्य पदार्थ में परिणत त्रिगुण का क्षेत्रज्ञ स्वामी के पास दृश्यरूप से उपस्थित होना ही यह अधिष्ठातृत्व है; इसमें सभी भावों के साथ दृश्यरूप से युगपत् की तरह ज्ञाता का संयोग होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सर्वभूतदमन

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत मत में ईश्‍वर को सर्वभूतदमन कहा गया है। पाशुपत सूत्र के कौडिन्य भाष्य के अनुसार ईश्‍वर देवताओं, मनुष्यों तथा पशुओं के विशेष स्थान, शरीर व विषयों के प्रति रति या वासना का दमन या शमन करता है, अतः सर्वभूत दमन कहलाता है। यह व्याख्या ईश्‍वर के अनुग्रहकृत्य की दृष्‍टि के की गई है। (क.सू.कौ.भा.पृ. 75)।

गणकारिका टीका के अनुसार ईश्‍वर देवताओं, मनुष्यों तथा पशुओं के विशेष स्थान, शरीर व विषयों के प्रति वासना या मोह को बढ़ाता है अतः सर्वभूतदमन कहलाता है। यह व्याख्या भगवान के निग्रह कृत्य को दृष्‍टि में रखते हुए की गई है। (ग.का.टी.पृ. 11)।

ये दोनों ही दृष्‍टिकोण अपनी-अपनी दृष्‍टि से समुचित लगते हैं। प्रथम दृष्‍टिकोण से देखें तो ईश्‍वर मोक्षकारक बनकर समस्त चेतनों पर शक्‍तिपात करके उनके मोह का आवरण हटाकर उनमें समस्त सांसारिक वासना मिटा देता है। दूसरे दृष्‍टिकोण के अनुसार ईश्‍वर स्वयं ही बन्धकारक होने के कारण समस्त भूतों में मोह उत्पन्‍न करके उन्हें बन्धन में डालता है। पाशुपतमत में ईश्‍वर ही समस्त विश्‍व का एकमात्र कारण है। वही मोक्ष व बन्धन, विद्‍या तथा अविद्‍या दोनों का कारण है अतः ऊपर्युक्‍त दोनों व्याख्याएँ उपयुक्‍त हैं।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सर्वभूतरुत ज्ञान

सभी प्रकार के प्राणियों के द्वारा उच्चारित शब्दों के विवक्षित अर्थों का जो ज्ञान शब्दों को सुनकर योगी को होता है (संकेतज्ञान की सहायता के बिना) वह सर्वभूतरुत ज्ञान कहलाता है (रुत = ध्वनि)। यह एक सिद्धि है। किस उपाय से यह सिद्धि प्रकट होती है, उसका विवरण योगसूत्र 3/17 में मिलता है। उच्चारित शब्द, वाच्य अर्थ और प्रत्यय (ज्ञान अर्थात् शब्द सुनने के बाद जो मनोभाव होता है, वह) में जो परस्पर अध्यास (= अभेदारोप) है (जो शब्द है, वही अर्थ है, वही ज्ञान है – इस प्रकार), उसे त्यागकर उनमें विभागपूर्वक संयम करना ही यह उपाय है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सर्वशून्य-वनोल-कोण्ड

देखिए ‘सर्व-शून्य-निरालंब-स्थल’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सर्वाचार

देखिए ‘सप्‍ताचार’।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सर्वार्थचित्त

जो चित्त सर्वार्थ है, वह सर्वार्थचित्त कहलाता है (यो. सू. 3/11)। ‘सर्व है अर्थ = विषय जिसका’ वह सर्वार्थ। वाचस्पति के अनुसार सर्वार्थता विक्षेप का नामान्तर है। सदैव नानावस्तुग्रहणशीलता रूप जो सर्वार्थता है वह चित्त का ही धर्म है। एकाग्रता की वृद्धि के अनुसार सर्वार्थता का हृास होता रहता है; विपरीत क्रम में भी यह नियम सत्य है। समाधिपरिणाम में उपर्युक्त सर्वार्थता का क्षय (= हृास) एवं एकाग्रता का उदय (= वृद्धि) होता रहता है। एक का क्षय अन्य के द्वारा अभिभूत होने पर ही होता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सर्वार्थता

अर्थ = वस्तु जो त्रैगुणिक है; सभी अर्थ जिसका विषय है, वह सर्वार्थ (योगसू. 4.23)। सर्वार्थ का भाव = सर्वार्थता, अर्थात् सदैव विषयों में लगे रहने का स्वभाव। यह चित्त का धर्म-विशेष है। यह चित्त सर्वार्थ है जो सदैव विषयप्रवण रहता है अर्थात् सर्वार्थता ‘विक्षिप्तता’ का नामान्तर है। एकाग्रता इसकी विरोधिनी है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संवाह्य

1. करणवर्ण, करण चक्र, करणों तथा इंद्रियों का समूह। इस समूह को इसलिए संवाह्य कहा जाता है क्योंकि ये जीव के अभिलषित उद्देश्य की पूर्ति के लिए उसकी शक्ति को विषय तक वहन करने में सहायक होते हैं। इन्हीं की सहायता से जीव अभिमत कार्यों में प्रवृत्त होता है। (शिवसूत्रवार्तिक (भास्कर) पृ. 82)।
2. जीव, कर्मात्मा, पशु। भट्ट भास्कर ने शिवसूत्रवार्तिक (भास्कर) में काकाक्षि गोलक न्याय की सहायता से संवाह्य शब्द का प्रयोग बद्ध जीव के लिए भी किया है। भास्कर के अनुसार अपने वास्तविक स्वरूप का परामर्श न करने के कारण जीव बाह्य विषयों में ही रमण करता रहता है। इस कारण उसकी प्रवृत्ति बहिर्मुखी बनी रहती है। परिणामस्वरूप वह संसृति के चक्कर में फँसा रहता है। इस प्रकार बाह्य विषयों में रमण करते रहने के कारण तथा भिन्न भिन्न योनियों में संसरण करते रहने के कारण जीव के लिए संवाह्य शब्द का प्रयोग किया गया है। (वही)
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सविकल्प ज्ञान

वस्तु के प्रथम संवेदन में उसके नाम रूप का कोई आभास नहीं होता है। द्वितीय आदि क्षणों में उसके विषय में अनेकों संभव नामरूपों की संकल्पना के अनंतर किसी एक विशेष नामरूप का निश्चय हो जाता है। उस निश्चय के साथ ही साथ उससे नामरूप युगल से भिन्न अन्य सभी संभावित नामरूप युगलों का निषेध होता है। इस प्रकार से तद्रूप एक वस्तु को अतद्रूप अन्य संभावित वस्तुओं से विच्छिन्न (व्यावृत) किया जाता है कि यह घर ही है शराब, मृतपिंड, पत्थर आदि नहीं है। इस अतद्व्यावृत्ति को अपोहन कहते हैं। अन्य सभी के अपोहन के साथ ही साथ किसी एक ही नामरूप युगल के निश्चय को विकल्प कहते हैं। विकल्पात्मक ज्ञान को ही सविकल्पक ज्ञान कहते हैं। समस्त लोक व्यवहार इसी से चलते हैं। इसी में शब्द प्रयोग की योग्यता होती है। विकल्प शून्य वस्तुमात्र के आभास को गूंगा और बहरा ज्ञान कहा गया है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सविचारा समापत्ति

सूक्ष्म -वस्तु -विषयक समापत्ति दो प्रकार की है – सविचारा और निर्विचारा। समापत्ति रूप समाधिज प्रज्ञा जब देश, काल और निमित्त के अनुभव से अवच्छिन्न होती है, तब वह सविचारा कहलाती है (योगसूत्र 1/44)। इस समापत्ति की प्रकृति सवितर्का समापत्ति के सदृश है – सवितर्क का विषय स्थूलवस्तु (कभी-कभी ‘महद्वस्तु’ शब्द भी प्रयुक्त होता है) है और इसका विषय सूक्ष्म है। तन्मात्र से शुरू कर अलिङ्ग -प्रकृति-पर्यन्त पदार्थ ‘सूक्ष्म’ शब्द से गृहीत होते हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सवितर्का समापत्ति

स्थूलवस्तुविषयक जो दो समापत्तियाँ होती हैं, उनमें सवितर्का प्रथम है (द्वितीय जो इससे उच्च कोटि की है, वह निर्वितर्का कहलाती है)। स्थूल को महत् भी कहा जाता है। जिसको विकृति या केवलविकृति कहा जाता है, वही स्थूल है; ऐसे पदार्थ संख्या में सोलह हैं – पाँच भूत तथा ग्यारह इन्द्रियाँ। यह समापत्ति शब्द, अर्थ (वाच्य अर्थ) तथा ज्ञान (शब्दहेतुक मनोभाव) – इन तीनों के विकल्प से संकीर्ण (= मिश्रित) होती है (योगसूत्र 1/42)। इस समापत्ति को योगियों का ‘अपरप्रत्यक्ष’ माना जाता है (निर्वितर्का समापत्ति ‘पर प्रत्यक्ष’ कहलाती है)। कोई-कोई व्याख्याकार कहते हैं कि 1/17 सूत्र में जिस वितर्क का उल्लेख है (स्थूलविषयक आभोग), उसके ही दो भेद सवितर्का-निर्वितर्का रूप समापत्तियाँ हैं। विज्ञानभिक्षु ने कहा है कि वेदान्तियों की जो सविकल्प समाधि है, वही यह सवितर्क है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संवित्

“प्राक् संवित् प्राणे परिणता” (अनेक स्थलों पर उद्धृत भट्ट कल्लट का वचन), “संविदैव भगवती स्वान्तः स्थितं जगद् बहिः प्रकाशयति” (ऋजु पृ. 27) इत्यादि स्थलों में संवित् शब्द पराहन्ता (पूर्णाहन्ता) मयी स्वातन्त्र्य शक्ति का वाचक है। शाक्त मत में यही परम तत्त्व के रूप में मान्य है। लक्ष्मीतन्त्र (14/5) में संवित् को लक्ष्मी का स्वच्छ, स्वच्छन्द रूप बताया गया है। इस शब्द का प्रयोग विमर्श शक्ति के लिये भी किया जाता है। दार्शनिकों ने इस शब्द का प्रयोग विज्ञान अथवा ज्ञान सामान्य के अर्थ में भी किया है। क्रम दर्शन के पंचवाह पद की व्याख्या करते समय व्योमवामेश्वरी, खेचरी प्रभृति समष्टि शक्तियों को और अंतःकरण, वहिःकरण के माध्यम से बहने वाली व्यष्टि शक्तियों को संविद्देवीचक्र के रूप में मान्यता दी गई है।
Darshana : शाक्त दर्शन

संवित्

1. शुद्ध चैतन्य। परप्रमातृ तत्त्व। समस्त भावजगत संवित् में ही संवित् के ही रूप में रहता है। जो कुछ भी जिस भी रूप में आभासित होता है वह सभी कुछ संवित् के ही कारण वैसा आभासित होता है क्योंकि संवित् जो कि शुद्ध एवं परिपूर्ण प्रकाश है उसके बिना और कुछ भी नहीं है और भासमान सारा प्रपंच उसी का बाह्य आकार है। (तन्त्र सार पृ. 5, 6 ई .प्र. वि. 2 पृ. 140, 141)।
2. प्रकाश एवं विमर्श का परम सामरस्यात्मक अनुत्तर तत्त्व। देखिए परासंविता अनुत्तर संवित्।
3. शुद्ध असीम एवं परिपूर्ण प्रकाश। पृथ्वी से लेकर सदाशिव पर्यंत सभी तत्त्वों का एकघन स्वरूप। (इ.प्र.वि. 2 पृ. 131)।
4. चैतन्य। अपने आपको अहंरूपतया और समस्त विषयों को इदंरूपतया तथा नीलपीतादिरूपतया प्रकाशित कर सकने वाली चेतना।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

संवेग

योगसूत्र 1/21 में ‘तीव्रसंवेग’ शब्द (तीव्रसंवेगवान् के अर्थ में) है। भाष्य में संवेग का अर्थ नहीं बताया गया है। सूत्र कहता है कि तीव्र संवेगवान् का समाधिलाभ आसन्न होता है। वाचस्पति ने ‘संवेग’ का अर्थ ‘वैराग्य’ किया है, जो सुसंगत नहीं लगता। विज्ञानभिक्षु इसका अर्थ ‘उपाय के अनुष्ठान में शीघ्रता’ करते हैं। ‘संवेग’ का यह अपूर्ण अर्थ है। संभवतः ‘संवेग’ का अर्थ है – क्रिया का हेतुभूत दृढ़तर संस्कार जिसके कारण कोई अनुष्ठान तीव्र रूप से एवं सहजतया किया जा सके। यह अर्थ आयुर्वेदसूत्र ग्रन्थ (अज्ञातकर्तृक) (4/3) में दिया गया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संवेदन

आन्तर बोध के अर्थ में संवेदन का प्रयोग प्रायः मिलता है; द्र. स्वबुद्धिप्रचारसंवेदन (व्यासभाष्य 4/19); स्वबुद्धिसंवेदन (योगसूत्र 4/22); प्रचार संवेदन (3/38)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

संवेदन

इंद्रियों के साथ विषय के संपर्क से नील, पीत, घट आदि बाह्य विषयों का, मन से सुख दुःख आदि का तथा केवल संवित् ही के बल से अपने आपका जो अनुभव प्राणी को होता है उसे संवेदन कहते हैं। अन्य दर्शनों में इसे ‘प्रत्यक्ष’ कहते हैं। परंतु प्रत्यक्ष केवल इंद्रियजन्य ज्ञान ही होता है जबकि संवेदन सुषुप्ति दशा में भी होता है जहाँ इंद्रियों का सहयोग संभव ही नहीं है। अतः संवेदन का क्षेत्र प्रत्यक्ष से कुछ अधिक विशाल है। देखिए स्वसंवेदन।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सवेद्य सुषुप्ति

देखिए सुषुप्ति।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

संशय

संशय योगविघ्नों में एक है (योगसू. 1/30)। दो परस्पर भिन्न कोटियों का ज्ञान होना और किसी एक कोटि का निश्चय न होना संशय है; जैसे दूरस्थ किसी अस्पष्ट पर लम्बे पदार्थ को देखकर यह सोचना कि यह खूंटा है या कोई पुरुष है। संशय विपर्यय से भिन्न है, क्योंकि विपर्यय में एक ही कोटि (जो वस्तुतः नहीं है) का निश्चयात्मक ज्ञान होता है। ‘बुद्धि आत्मा है या नहीं’ – इस प्रकार का ज्ञान अध्यात्मक्षेत्रीय संशय है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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