भारतीय भाषाओं द्वारा ज्ञान

Knowledge through Indian Languages

Dictionary

Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

शब्दकोश के परिचयात्मक पृष्ठों को देखने के लिए कृपया यहाँ क्लिक करें
Please click here to view the introductory pages of the dictionary

अनुत्तर

सर्वोत्तीर्ण परमशिव तत्व को अनुत्तर कहते हैं। परात्रीशिका शास्त्र के विवरण में इस पद की सोलह प्रकारों से व्याख्या की गई है :-
1. जिससे बढ़ चढ़ कर और कोई तत्व नहीं है।
2. जिसके विषय में प्रश्न उत्तर आदि के लिए कोई अवकाश ही नहीं है।
3. जिस पद पर भेदवादियों द्वारा माने हुए आपेक्षिक मोक्ष अर्थात् अपवर्ग, कैवल्य, निर्वाण आदि का भी आभास नहीं रहता है।
4. नाभि, हृदय, कंठ आदि के क्रम से ऊपर की ओर गति भी जहाँ नहीं होती है।
5. पार करने के योग्य कोई बंधन जहाँ होता ही नहीं।
6. जहाँ पहुँचकर फिर किसी बंधन से मोक्ष भी नहीं होता है।
7. प्रकारता आदि व्यवच्छेदकों से रहित होने के कारण जिसके विषय में ‘ऐसा, वैसा’ आदि शब्दों का प्रयोग भी नहीं किया जा सकता है।
8. व्यवच्छेद हो जाने के बाद प्रकट होने वाली प्रमेयता का जहाँ नाम नहीं। अथवा – निर्विकल्प ज्ञान के अनंतर उदित होने वाले विशेष शब्द प्रयोग का विषय जो बन ही नहीं सकता है।
9. आणव आदि योग के पश्चात् उदित होने वाला भावनामय शाक्त योग भी जहाँ संभव नहीं।
10. त्रिक में नर, शक्ति, शिव आदि का जैसा परस्पर उत्तराधरता का भाव जहाँ सर्वथा है ही नहीं तथा जाग्रत आदि दशाओं की भी कोई उत्तरता या अधरता जहाँ है ही नहीं। उत्कृष्टता और निकृष्टता के भावों से प्रकट होने वाले द्वैत सम्मोह की भी जहाँ स्थिति नहीं है।
11. वर्णभेद कृत उच्चता और नीचता के भाव जहाँ पर हैं ही नहीं।
12. आगे प्रकट होने वाली पश्यंती आदि दशाएँ, अघोर आदि देवियाँ और परापर आदि अवस्थाएँ जहाँ हैं ही नहीं।
13. नुद से अर्थात् गुरूप्रेरणा से जहाँ पार जाना नहीं होता है।
14. संकुचित प्रमातृ भावों में और प्राण वृत्तियों में प्रधानतया आभासमान ज्ञान क्रियात्मक ऐश्वर्य ही जिसमें उत्कृष्टतया चमकता है, वह पर तत्त्व।
15. ‘अ’ रूपिणी कला की प्रेरणा से ही जिस में ऐश्वर्य तरंगें मारता है, वह पर तत्त्व।
16. क्रमात्मक क्रियामयी प्रेरणा के लिए जहाँ कोई भी अवकाश नहीं, वह सर्वथा अक्रम परतत्त्व। (परात्रीशिकाविवरण, पृ. 19 से 29 )।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अनुत्तरसंवित्

प्रकाश और विमर्श का चरम सामरस्यात्मक चर-तत्त्व। समस्त विश्व को अपने भीतर शुद्ध प्रकाश रूप में धारण करने वाला अनुत्तर तत्त्व। विश्वोत्तीर्ण एवं विश्वमय दोनों अवस्थाओं में सर्वदा और सर्वथा संविद्रूप ही बना रहने वाला अनुत्तर चरमशिव। (देखिए परमशिव)। छत्तीस तत्त्वों से उत्तीर्ण शुद्ध, असीम और परिपूर्ण परमेश्वर जो समस्त विश्व का अपनी ही इच्छा से आभास करता हुआ भी सतत रूप से परिपूर्ण एवं शुद्ध संविद्रूप ही बना रहता है। (देखिएसंवित्)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अनुपाय

अनुपाय शब्द का जयरथ (तंत्रा. वि. 2/2, पृ. 3) ने ‘अल्प उपाय’ अर्थ किया है, क्योंकि पर्युदास स्थल में नञ् अल्पार्थक माना जाता है, जैसा कि ‘अनुदरा कन्या’ इस प्रयोग में ‘अनुदरा’ शब्द का अर्थ ‘पतली कमर’ वाली होता है। सिद्ध साहित्य में प्रचलित ‘सहज’ शब्द को इस अनुपाय शब्द का पर्याय मान सकते हैं।
तंत्रसार (पृ. 8-9) में अनुपाय प्रक्रिया का विवेचन इस तरह से किया गया है – तीव्र शक्तिपात के होने पर साधक गुरु के एक बार के उपदेश से ही नित्योदित समावेश दशा में लीन हो जाता है। उपाय के रूप में वह षडंग योग में प्रतिपादित तर्क नामक अंग का सहारा लेता है। वह सोचता है कि स्वयं प्रकाश, स्वात्मस्वरूप ही तो परमेश्वर है। इसके लिये किसी उपाय की क्या आवश्यकता है ? यह स्वात्मस्वरूप नित्य, स्वयं प्रकाश, निरावरण तत्त्व है। इसलिये किसी उपाय से इसके स्वरूप की प्राप्ति (लाभ) या प्रतीति (ज्ञाप्ति) होगी, अथवा किसी आवरण को हटाया जाएगा, इन सब बातों का कोई प्रसंग नहीं है। इस स्वात्मस्वरूप में लीन (अनुप्रवेश) होने का भी कोई प्रसंग नहीं है क्योंकि शुद्ध स्वात्मस्वरूप से अतिरिक्त उसमें प्रविष्ट होने वाले की अलग से कोई सत्ता नहीं है। फिर उपाय भी तो उससे अलग नहीं है। इसलिये यह सारा जगत् चिन्मात्र सार है। काल इसकी कल्पना नहीं कर सकता। देश इसको परिच्छिन्न नहीं कर सकता। उपाधि इसका कुछ बिगाड़ नहीं सकती। इसकी कोई आकृति नहीं है। शब्दों की सहायता से इसको समझा नहीं जा सकता ओर न किसी प्रमाण की ही यहाँ प्रवृत्ति हो सकती है। स्वतंत्र आनन्दघन यह स्वात्मस्वरूप ही काल से लेकर प्रमाण पर्यन्त ऊपर बताये गये सभी तत्त्वों को स्वरूप प्रदान करने वाला है। मैं इस स्वात्मस्वरूप से भिन्न नहीं हूँ और इस अहमात्मक स्वात्मस्वरूप में ही यह सारा विश्व प्रतिबिंबित हो रहा है, इस तरह की प्रत्यभिज्ञा के जग जाने पर साधक नित्योदित परमेश्वर स्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। इसके लिये मंत्र, पूजा, ध्यान, चर्या आदि की कोई आवश्यकता नहीं पड़ती।
इस प्रकरण का उपसंहार करते हुए अभिनवगुप्त ने कहा है कि कोई भी लौकिक उपाय शिव को प्रकाशित नहीं कर सकता। क्या घट सूर्य को प्रकाशित कर सकता है? उदार दृष्टि वाला मनुष्य इस तरह से विचार करते-करते ही किसी समय स्वयंप्रकाश शिवस्वरूप में समाविष्ट हो जाता है। संवित्प्रकाश में भी बताया गया है कि आपका तत्त्व अर्थात् स्वरूप तो स्पष्ट रूप से सबकी आँखों के सामने विद्यमान है। ऐसी स्थिति में जो व्यक्ति आपको देखने के लिए भांति-भांति के उपायों की खोज में लगे हैं, वे निश्चित ही आपको नहीं जानते। श्रुति (वा. सा. 16/7, तै. सं. 4/5/1/3) ने इस बात को स्पष्ट किया है कि इसको ग्वालबाले जानते हैं, पनहारिनें इसको जानती हैं और विश्व के सारे प्राणी इसको जानते हैं। इसको देखकर कौन आनन्द-विभोर नहीं हो जाता। मालिनीविजय, स्वच्छन्दतन्त्र, संकेतपद्धति, तन्त्रालोक, महार्थमंजरी प्रभृति ग्रन्थों में इस अनुपाय प्रक्रिया का जो विशद विवेचन मिलता है, इससे यह स्पष्ट हो जाता है कि यह अनुपाय प्रक्रिया सहज योग से भिन्न नहीं है।
Darshana : शाक्त दर्शन

अनुपाय

आनंदयोग, आनंद-उपाय। बिना किसी अभ्यास से अपने वास्तविक स्वरूप के साक्षात्कार का उपाय। किसी उपाय के बिना ही अपने ही भीतर अपनी परमेश्वरता का स्वयमेव विमर्श करने का प्रकार। बिना किसी योग का अभ्यास किए अपने शिवभाव का स्वयमेव ही समावेश हो जाने का प्रकार। शांभव उपाय ही परिपक्व अवस्था में अनुपाय कहलाता है। (तं. आत्मविलास, 1-142)। त्रिक आचार का यह सर्वोत्तम योग कहलाता है। गुरु शिष्य को केवल समझाता है कि तू तो स्वयं परमेश्वर ही है, तुझे अपने परमेश्वर भाव को पहचान लेने के लिए किसी उपाय की क्या आवश्यकता है, इत्यादि। ऐसा उपदेश शिष्य को इतना हृदयंगम हो जाता है कि वह बिना किसी साधना का अभ्यास किए ही झट से अपने परिपूर्ण परमेश्वर भाव में समाविष्ट हो जाता है। (तन्त्र सार पृ. 7, 9)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अनुभव – भक्‍ति

देखिए ‘भक्‍ति।
Darshana : वीरशैव दर्शन

अनुभाव

बारहवीं शताब्दी के वीरशैव – संतों के अनुसार अपनी साधना तथा ईश्‍वर के अनुग्रह से होने वाली स्वआत्मा की अनुभूति को ‘अनुभाव’ कहा जाता है। पंचज्ञानेन्द्रिय तथा मन से होने वाले लौकिक ज्ञान को ‘अनुभव’ और इनके बिना ही शुद्‍ध बुद्‍धि से होने वाली आत्मानुभूति को ‘अनुभाव’ कहते हैं। जाग्रत्, स्वप्‍न, सुषुप्‍ति तथा मूर्च्छा ये चार अवस्थायें कर्माधीन मानी जाती हैं और इनका अनुभव साधक और असाधक दोनों को समान रूप से होता है। इन चारों से विलक्षण एक तुर्य आत्मानुभूति- अवस्था है, जो कि केवल साधना से साध्य है। साधक को इंद्रिय आदि की अपेक्षा के बिना केवल शुद्‍ध बुद्‍धि से अपने सत्-चित्-आनंद-स्वरूप का साक्षात्कार होता है। यही अनुभाव कहलाता है। यह एक ऐसी अवस्था है, जब कि आत्मानुभूति के अतिरिक्‍त, और किसी का भी ज्ञान नहीं होता। (च.ब.व.841, 1030; ब.व. 918; श.अ.अ.अ. पृष्‍ठ 35-42; कि.सा.भाग 3 पृष्‍ठ 120)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

अनुभाव

भक्त के ऊपर भगवान् का प्रभाव ही अनुभाव है। भगवान् अपने अलौकिक प्रभाव को किसी विशिष्ट भक्त में प्रत्यक्ष दिखाते हैं। अर्थात् विशिष्ट भक्त स्पष्ट रूप से भगवत् प्रभाव से युक्त परिलक्षित होता है। इसीलिए ऐसा अलौकिक भगवत् प्रभाव वाला भक्त भी अपने भक्त का वैसे ही भजनीय होता है, जैसा कि भगवान् अपने उस विशिष्ट भक्त का भजनीय होता है (अ.भा.पृ. 1040)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

अनुमान

सांख्यकारिका (5) तथा सांख्यसूत्र (1/100) में अनुमान का स्वरूप बताया गया है। लिङ्ग-लिङ्गी-पूर्वक जो ज्ञान है (अर्थात् लिङ्ग-लिङ्गी के ज्ञान से उत्पन्न हुआ जो ज्ञान) वह अनुमान है। इसकी व्याख्या में वाचस्पति ने कहा है कि ‘व्याप्ति’ (व्याप्य-व्यापक-भाव) तथा पक्षधर्मता (लिङ्ग का पक्ष में रहना) के आधार पर अप्रत्यक्ष विषय का जो निश्चय होता है, वह अनुमान है। उदाहरणार्थ, पर्वत में धूम देखकर ‘जहाँ’ जहाँ धूम है वहाँ वहाँ अग्नि हैं इस व्याप्ति का स्मरण होने पर पर्वत में अप्रत्यक्ष अग्नि का जो निश्चय है वह अनुमान है। वाचस्पति ने इस प्रसंग में व्याप्ति के निर्दोष तथा सदोष रूप (उपाधियुक्त होना) की चर्चा की है – जिसका विशद विवेचन न्यायशास्त्र में मिलता है। उपर्युक्त ‘लिङ्ग-लिङ्गीपूर्वक’ शब्द में लिङ्ग=लिङ्ज्ञान तथा लिङ्गी=लिङ्गी का ज्ञान – ऐसा समझना चाहिए।
कुछ व्याख्याकारों ने ‘लिङ्ग-लिङ्ग-पूर्वक’ की व्याख्या अन्य प्रकार से की है। उनके अनुसार इसका अर्थ है – कभी-कभी लिङ्गपूर्वक लिङ्गी (लिङ्गयुक्त) का ज्ञान होता है, जैसे हाथ में त्रिदण्ड को देखकर यह ज्ञान होता है कि यह व्यक्ति संन्यासी है। इसी प्रकार लिङ्गी-पूर्वक लिङ्ग का ज्ञान होता है, जैसे संन्यासी के समीप पड़े त्रिदण्ड को देखकर यह ज्ञान होता है कि यह त्रिदण्ड संन्यासी का है (क्योंकि संन्यासी ही त्रिदण्डधारण करते हैं)। लिङ्ग-लिङ्गी का जो सम्बन्ध है, वह सात प्रकार का है जिसके आधार पर कहा जाता है कि ‘सांख्य सात प्रकार की अनुमिति मानता है’ (द्र. जयमङ्गला आदि)।
अनुमान रूप चित्तवृत्ति का पुरुष के साथ जो सम्बन्ध है (जो तात्त्विक नहीं है), वह प्रमाणफलरूप प्रमा है – यह ज्ञातव्य है।
योगसूत्र के व्यासभाष्य (1/7) में यह कहा गया है कि अनुमान में वस्तु का प्रधानतः सामान्य ज्ञान ही होता है – विशेष धर्मों का ज्ञान नहीं, यद्यपि जिस वस्तु का ज्ञान होता है उसमें सामान्य और विशेष दोनों प्रकार के धर्म रहते हैं। यहाँ अनुमान का स्वरूप इस प्रकार दिखाया गया है (सांख्यकारिकोक्त मत से वस्तुतः कोई भिन्नता या विरोध नहीं है) जो संबद्ध पदार्थ (जैसे धूम रूप हेतु) अनुमेय पदार्थों की तुल्यजातीय वस्तुओं में विद्यमान रहता है (जैसे पाकशाला आदि में जहाँ धूम भी है और वह्नि भी है) तथा भिन्नजातीय वस्तु में नहीं रहता है (जैसे हृद आदि में जहाँ वह्नि भी नहीं है, धूम भी नही है), उसका आश्रय करके अप्रत्यक्ष विषय में जो चित्तवृत्ति रूप ज्ञान उत्पन्न होता है, वह अनुमान है।
अनुमान के तीन भेद माने गए हैं – पूर्ववत, शेषवत् और सामान्यतोदृष्ट (द्र. सांख्यकारिका 5) (विस्तार ‘पूर्ववत्’ आदि प्रविष्टियों के अंतर्गत देखें।)
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अनुशासन

योगसूत्र का प्रथम सूत्र है – अथ योगानुशासनम्। विधि, उपदेश, शास्त्र अथवा इस प्रकार के अन्य किसी शब्द का प्रयोग न करके जो ‘अनुशासन’ शब्द का प्रयोग किया गया है, उसका एक विशिष्ट उद्देश्य है। व्याख्याकार कहते हैं कि अनुशासन का अर्थ है -‘शिष्टस्य शासनम्’ – जो पहले से ही प्रतिपादित हुआ था (अतः जो पूर्वाचार्यों को सम्यक् ज्ञात था), उसका पुनः प्रतिपादन ‘अनुशासन’ है। यह कहना साभिप्राय है, क्योंकि योगसूत्रकार पंतजलि यह बताना चाहते हैं कि उनके द्वारा प्रतिपादित मतों के आविष्कर्ता वे नहीं हैं; सभी मत पूर्णतया पूर्वाचार्यों को ज्ञात थे और वे उन मतों का नूतन रूप से प्रतिपादन-मात्र कर रहे हैं, जिससे उनके काल के लोगों को योगविद्या समझने में सुविधा हो। जहाँ तक सिद्धान्तों का प्रश्न है, किसी भी आचार्य की कुछ भी मौलिकता नहीं है – समझाने की पद्धति में ही मौलिकता है। योगसूत्र से पहले इसके आधारभूत हिरण्यगर्भयोगशास्त्र प्रचलित था – यह भी व्याख्याकारों ने कहा है। यह बात काल्पनिक नहीं है, क्योंकि इस शास्त्र के वचन कई प्राचीन ग्रन्थों में उद्धृत हुए हैं।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अनुस्‍नान

पाशुपत विधि का एक अंग।
दिन में तीन बार भस्म स्‍नान करने के अपरांत यदि कभी किसी कारणवश जैसे उच्छिष्‍ट वस्तु के छू जाने से, थूकने से अथवा मूत्र या पुरीष आदि के उत्सर्ग से योगी का शरीर अपवित्र हो जाए तो उसे पुन: भस्मस्‍नान करना होता है, अर्थात् शरीर पर पुन: भस्म मलना होता है। इस तरह से अवश्य रूप से विहित तीन भस्म स्‍नानों के अतिरिक्‍त किसी आगन्तुक अशुद्‍धि को दूर करने के लिए किए जाने वाले तीन से अधिक चौथे या पाँचवें आदि भस्म स्‍नान को अनुस्‍नान कहते हैं। (पा. सू. कौ. भा. पृ. 10)।
Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

अन्तर्दीक्षा

शक्तिपात का मुख्य लक्षण भगवद् भक्ति का उन्मेष है। वह प्रतिभावान् पुरुष में अवश्य ही रहता है। इसीलिये ऐसे पुरुष की दीक्षा तथा अभिषेक व्यापार स्वयं अपनी संविद्देवियों की सहायता से ही संपन्न हो जाते हैं। प्रातिभ ज्ञान का उदय हो जाने से साधक की अपनी इन्द्रिय वृत्तियाँ अन्तर्मुख होकर प्रमाता, अर्थात् आत्मा के साथ तादात्म्य लाभ करती हैं और शक्तिमय बन जाती हैं। शास्त्रों में कहा गया है कि मंत्र, अर्थात् चित्त के बहिर्मुख होने पर जो वृत्तियाँ कही जाती हैं, वे ही उसके अन्तर्मुख होने पर शक्तियाँ कहलाती हैं। ये सब शक्तिभूत इन्द्रिय वृत्तियाँ पुरुष के चैतन्य को उत्तेजित करती हैं। इसी स्थिति को अन्तर्दीक्षा कहा जाता है। इसके प्रभाव से साधक स्वतः स्वातन्त्र्यलाभ कर लेता है। इसके लिये उसे गुरु या शास्त्र की भी अपेक्षा नहीं रहती। तंत्रशास्त्र का यह उद्घोष है कि गुरु कृपा से, शास्त्र के अध्ययन से अथवा स्वतः अपनी प्रतिभा से भी साधक निरावरण स्वात्मस्वरूप को पहचान सकता है। अन्तर्दीक्षा के माध्यम से यह कार्य संपन्न होता है। (भारतीय संस्कृति और साधना, भास्करी 2, पृ. 231)।
Darshana : शाक्त दर्शन

अन्योन्य-अभिभव

त्रिगुण के जो चार व्यापार हैं, उनमें अन्योन्यअभिभव एक है (सांख्यकारिका 12; कोई-कोई पाँच व्यापार मानते हैं; द्र. जयमङ्गला आदि टीकायें)। प्रत्येक परिणाम में तीन गुण मिले रहते हैं और जो अधिक बलशाली होता है, वह अन्य दो को स्वभावतः अभिभूत करता है। अभिभूत दो गुण प्रधान गुण का अनुसरण करते हुए विद्यमान रहते हैं – विरुद्धाचरण नहीं करते। इस अभिभाव्य-अभिभावक-स्वभाव के कारण ही जागृत के बाद स्वप्न और निद्रा अवस्था आती हैं तथा सुख के बाद दुःख और मोह होते हैं। व्यक्तावस्था में सत्त्वादिगुण विषम-अवस्था में ही रहते हैं; इस वैषम्य का अर्थ ही है – किसी एक गुण का प्राधान्य और अन्य दो का अप्राधान्य। प्रधान गुण अप्रधानों का अभिभव करके ही अपना व्यापार करता है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अन्योन्यजननवृत्ति

गुणत्रय की जिन चार वृत्तियों (व्यापारों) का उल्लेख सांख्यशास्त्र में है (द्रं. सां. का. 12) उनमें यह अन्यतम है। जनन का अर्थ यद्यपि उत्पत्ति है, तथापि अन्योन्य-जनन का अर्थ तीन गुणों का एक-दूसरे से उत्पत्ति नहीं हो सकता, क्योंकि सत्त्वादिगुण किसी से उत्पन्न नहीं होते; वे अहेतुमान हैं। अन्योन्यजनन का अर्थ है – परिणाम के उत्पादन में एक-दूसरे का सहायक होना। अन्य दो गुणों की सहायता के बिना कोई भी एक गुण किसी भी परिणाम को उत्पन्न नहीं कर सकता। सांख्यशास्त्र में गुणों की एक वृत्ति ‘अन्योन्याश्रय’ भी है। ‘अन्योन्याश्रय’ से ‘अन्योन्यजनन’ का भेद दिखाने के लिए कोई-कोई व्याख्याकार यह कहते हैं कि ‘अन्योन्यजनन’ वृत्ति का सम्बन्ध ‘सदृशपरिणाम’ से है। यह परिणाम गुणसाम्यावस्था में होता है। इस परिणाम के होने पर भी त्रिगुण हेतुमान नहीं हो जाते, क्योंकि यह सदृश परिणाम प्रकृति ही है। विसदृश-परिणाम का ही वस्तुतः हेतु होता है, सदृश-परिणाम का नहीं। अन्योन्यजनन की अन्य व्याख्या भी है (द्र. माहरहन्ति)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अन्योन्याश्रयवृत्ति

गुणत्रय के स्वाभाविक व्यापारों में यह अन्यतम है। प्रत्येक गुण दूसरे का आश्रय करके ही अपना कार्य निष्पन्न करता है – यही गुणों की अन्योन्याश्रयवृत्ति है। उदाहरणार्थ सत्त्वगुण रजोगुण की प्रवृत्ति और तमोगुण के नियमन रूप स्वभाव का आश्रय करके ही प्रकाशन रूप कार्य करता है। इसी प्रकार रजोगुण भी प्रकाश और नियमन का आश्रय करके प्रवर्तन रूप अपना कार्य करता है; तमोगुण भी प्रकाश और प्रवृत्ति का आश्रय करके अपना नियमन रूप कार्य करता है। इसी दृष्टि से कहा जाता है कि एक गुण अन्य गुण के सहकारी के रूप से कार्य करता है। व्यासभाष्य (2/18) के ‘इतरेतराश्रयेण उपार्जितमूर्तयः’ वाक्य में गुणों का यह स्वभाव दिखाया गया है। यही कारण है कि केवल सात्त्विक या केवल राजस या केवल तामस कोई वस्तु हो ही ही नहीं सकती।
यह ध्यान देना चाहिए कि गुणों का गुणों के अतिरिक्त अन्य कोई आश्रय नहीं है। गुण अपने मूलस्वरूप में किसी पर आश्रित और प्रतिष्ठित नहीं हैं – यह सांख्यीय दृष्टि है। व्यक्तिभूत त्रिगुण चिद्रूप-पुरुष में आश्रित है – यह कहना संगत ही है। गुणों में आधार-आधेय भाव भी वस्तुतः नहीं है, यद्यपि परस्पर अपेक्षा है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अन्वय

भूतजय एवं इन्द्रियजय करने के लिए भूत एवं इन्द्रिय के जिन पाँच रूपों में संयम करना पड़ता है, उनमें चतुर्थ रूप अन्वय है। इस अन्वय में संयम करने पर ईशितृत्व (या ईशिता) नामक सिद्धि होती है। जब सत्त्वादि त्रिगुण (जो यथाक्रम प्रकाश-क्रिया-स्थितिशील हैं) कार्यपदार्थों के स्वभाव के अनुपाती होते हैं, तब गुण के उस रूप को ‘अन्वय’ कहा जाता है। सभी कार्यद्रव्य त्रिगुण-सन्निवेश के अतिरिक्त और कुछ नहीं है। यह ‘सन्निवेशित होने’ की अवस्था ही अन्वय है। प्रकाशक्रिया स्थितिशील त्रिगुण जब ‘व्यवसाय’ रूप का परिग्रह करते हैं, तब वह (इन्द्रिय के प्रसंग में) अन्वय रूप है। यह व्यवसायात्मक रूप इन्द्रिय, मन और अहंकार का उपादान है। द्र. भोगसूत्र 3/44, 3/47।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अपरा शुद्धविद्या

शुद्ध विधा का वह अवांतर प्रकार, जिसे विद्येश्वरों (मंत्र प्राणियों) की शुद्ध विद्या भी कहते हैं। इस शुद्ध विद्या में रहने वाले प्राणियों को अपनी शुद्ध और ऐश्वर्ययुक्त संविद्रूपता पर पक्की निष्ठा तो होती है परंतु फिर भी उनमें किसी न किसी अंश में माया का दृष्टिकोण बना ही रहता है। परंतु माया की तिरोधान शक्ति का उन पर कोई प्रभाव नहीं होता है, इसलिए इस तत्त्व को महामाया भी कहा जाता है। (इ.प्र.वि. खं. 2, पृ. 200)। देखिए महामाया।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अपरान्तज्ञान

अपरान्त (अपर+अन्त) का अर्थ है जीवन की अन्तिम अवस्था, अर्थात् मृत्यु। मृत्यु कब होगी – इसका ज्ञान (योगज ज्ञान) सोपक्रम (स-व्यापार) एवं निरुपक्रम कर्म में संयम करने पर होता है (योगसूत्र 3/22)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अपरावस्था / दशा

पूर्ण भेद की दशा। वह अवस्था जिसमें प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय के बीच, एक प्रमाता और दूसरे प्रमाता के बीच तथा एक प्रमेय और दूसरे प्रमेय के बीच पूर्ण भेद की दृष्टि का विकास हो चुका होता है। इस अवस्था में माया से लेकर पृथ्वीपर्यंत सभी तत्त्व तथा उनमें रहने वाले भेद दृष्टि प्रधान सभी प्राणी आते हैं। अपूर्णमन्यता, भिन्नता तथा अत्यंत परतंत्रता इस द्वैत प्रधान अवस्था के प्रमुख लक्षण हैं। (शिवदृष्टिवृत्ति, पृ. 14, ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी, 2, पृ. 199)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

अपरिग्रह

द्रव्यों का अपने उपयोग के लिए ग्रहण करना परिग्रह है। ऐसा ग्रहण न करना अपरिग्रह है। वस्तुतः प्राणयात्रा के लिए आवश्यक वस्तुओं से अधिक वस्तुओं का ग्रहण न करना अपरिग्रह है। व्यासभाष्य (2/30) में कहा गया है कि विषयों का दोष देखकर उनको अस्वीकार करना (विषयों का स्वामी बनने की इच्छा का रोध करना) अपरिग्रह है। यह दोष विषयों के अर्जन, रक्षण, क्षय, संग तथा हिंसा में है। (इनमें अर्जनादि चार विषयग्रहीता से सम्बन्धित हैं; हिंसादोष, प्रधानतः विषयप्रदाता आदि से सम्बन्धित है)। अपरिग्रह में सम्यक् स्थैर्य होने पर जन्मकथन्तासम्बोध (विषय ज्ञाता एवं विषयों की पूर्वापरस्थिति का ज्ञान) होता है (योगसूत्र 2/39)।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

अपरिदृष्ट धर्म

चित्तरूप धर्मी चक्र के धर्म दो प्रकार के हैं – परिदृष्ट और अपरिदृष्ट (वे धर्म जो लक्षित नहीं होते हैं)। अपरिदृष्ट धर्म सात हैं (योगसू. 3/15, व्यासभाष्य): (1) निरोध (=वृत्ति निरोध या निरोध समाधि), (2) धर्म (=पुण्य -अपुण्य अथवा अदृष्ट), (3) संस्कार (=वासनारूप संस्कार जिसका कार्य स्मृति है), (4) परिणाम (=चित्त का अलक्षित परिणाम), (5) जीवन (=प्राणधारण -रूप व्यापार जो प्राणी की इच्छा के आधीन नहीं है), (6) चेष्टा (=इन्द्रिय -चालित चित्तचेष्टा), (7) शक्ति (=वह अज्ञात सामर्थ्य जिससे कोई दृष्ट व्यापार निष्पन्न होता है; व्यक्त क्रिया या चेष्टा की सूक्ष्म अवस्था)। जिन अनुमानों से इन अपरिदृष्ट (=अलक्षित) पदार्थों की सत्ता सिद्ध होती है, उनको व्याख्याकारों ने दिखाया है। किसी-किसी का कहना है कि इन धर्मों की व्यासभाष्य में जो ‘अनुमान गम्य’ माना गया है, वहाँ अनुमान का तात्पर्य आगम से है, अर्थात् आगम (शास्त्र) से ही इन अपरिदृष्ट धर्मों की सत्ता सिद्ध होती है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

Languages

Dictionary Search

Loading Results

Quick Search

Follow Us :   
  भारतवाणी ऐप डाउनलोड करो
  Bharatavani Windows App