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Definitional Dictionary of Indian Philosophy (Hindi) (CSTT)

Commission for Scientific and Technical Terminology (CSTT)

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सांख्य

पांरपरिक मान्यता के अनुसार कपिल के द्वारा उपदिष्ट शास्त्र का नाम। कपिल ने निर्माणचित्त का आश्रय लेकर जिज्ञासु आसुरि नामक ऋषि को आत्मा-अनात्मा सम्बन्धी जो दार्शनिक विश्लेषणात्मक ज्ञान दिया था, वही सांख्य नाम से प्रसिद्ध है। प्रतीत होता है कि ‘सांख्य’ नाम बाद में दिया गया है, क्योंकि कपिलोपदेश के प्रसंग में सांख्यकारिका में तथा पंचशिख के वाक्य में (1/25 व्यासभाष्य में उद्धृत) सांख्य शब्द प्रयुक्त नहीं हुआ है (पंचशिख के वाक्य में ‘तन्त्र’ शब्द है, सांख्य नहीं)।
सांख्य के एकमात्र अवशिष्ट ग्रन्थ सांख्यकारिका को देखने से सांख्यविद्या का मूल स्वरूप तर्कप्रधान दिखाई देता है। वस्तुतः मोक्षविद्या या निर्गुणपुरुषविद्या के पदार्थों पर दार्शनिक दृष्टि से विचार करना – अलौकिक पदार्थों को लौकिक पुरुषों को युक्ति से समझाना – सांख्यदर्शन का मुख्य उद्देश्य है। किसी विषय पर सम्यक् रूप से विचार होने पर उसके अंश आदि का पूर्ण ज्ञान हो जाता है, अर्थात् किस पदार्थ की संख्या कितनी है, उसके भेद कितने हैं – इत्यादि विषय पूर्णतः निर्धारित हो जाते हैं। अतः गणनावाची संख्या शब्द से सांख्य शब्द को व्युत्पादित किया जाता है। कुछ आचार्यों का कहना है कि विवेकवाची संख्या शब्द से सांख्य शब्द निष्पन्न हुआ है। विश्व के सभी कार्य किन-किन कारणों से हुए हैं – सूक्ष्म कारणों से उन स्थूल कार्यों का भेद किस प्रकार का है – ऐसा विचार संख्या कहलाता है; ऐसे विचार की प्रधानता कपिलोपदेश में रहने के कारण कपिल-तन्त्र बाद में सांख्य नाम से प्रसिद्ध हुआ। गुण-दोष-निर्धारण भी संख्या पद से अभिहित होता है; इस दृष्टि से भी सांख्य शब्द को व्युत्पादित किया जा सकता है।
कपिल के प्रथम शिष्य आसुरि का कोई ग्रन्थ नहीं मिलता। आसुरि के शिष्य पंचशिख ने ही सबसे पहले कपिल के उपदेश को सुव्यवस्थित रूप दिया तथा एक ग्रन्थ का प्रणयन किया जो षष्टितन्त्र नाम से प्रसिद्ध है। इसमें सभी सांख्यीय प्रमेयों को 60 भागों में बाँटकर विचार किया गया था, अतः षष्टि-तन्त्र नाम पड़ा – ऐसा स्पष्टतया प्रतीत होता है। पंचशिख के बाद वार्षगण्य, देवल आदि आचार्यों ने सांख्य पर जो ग्रन्थ लिखे, वे लुप्त हो चुके हैं। पुरागों में सांख्याचार्यों के मतों का पौराणिक रूप प्राप्त होता है जो मूल उपदेश की तरह शुद्ध नहीं है। अर्वाचीन काल में ईश्वरकृष्ण द्वारा रचित सांख्यकारिका या सांख्य-सप्तति ग्रन्थ में पूर्वाचार्यों के मतों का अत्यन्त संक्षिप्त सार मिलता है। प्रचलित सांख्यसूत्र किसी मूल ग्रन्थ का बदला हुआ रूप है, जिसके अनेक सूत्र अर्वाचीन काल के आचार्यों के हैं। तत्त्वसमास सूत्र भी प्राचीन प्रतीत नहीं होता।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सादाख्य

परशिव जगत्-सृष्‍टि के लिए जब इच्छा करता है, तब वह स्वयं ‘शिवतत्व’ और ‘शक्‍तितत्व’ बन जाता है। ये दोनों मिलकर आगे उत्पन्‍न होने वाली चित् और अचित् सृष्‍टि के कारण बनते हैं। इन दोनों में से ‘शक्‍ति’ जब अपने ज्ञानांश से ‘इदन्ता’ का प्रथम स्फुरण करती है तब उसको ‘सदाशिव-तत्व’ कहते हैं। उसी सदाशिवतत्व को ‘सादाख्य’ शब्द से संबोधित किया गया है। (शि. मं. पृष्‍ठ 35)। यह सादाख्य सकल (साकार) कहलाता है। सादाख्य का जो सकल स्वरूप है उसका अनुभव सामान्य जनों को नहीं होता, किंतु योगी, ज्ञानी और मंत्रोपासना करने वाले उच्‍चकोटि के साधकों को पूजा, ध्यान आदि के निमित्‍त पर शिव अपनी शक्‍ति के सादाख्य का स्फुरण करता है (वा.शु.तं. 1/28-29; सू.आ. क्रियापद 1/23)।

इसी के माध्यम से साधक शुद्‍ध निष्कल परशिव में समरस होता है। यह ‘शिव-सादाख्य’, ‘अमूर्त सादाख्य’, ‘मूर्त सादाख्य’, ‘कर्तृसादाख्य’ और ‘कर्मसादाख्य’ के नाम से पाँच प्रकार का होता है। (वा.शु.तं. 1-30, 31)। इन पाँच सादाख्यों के पाँच पर्याय नाम हैं, जैसे शिव-सादाख्य का ‘सदाशिव’, अमूर्त सादाख्य का ‘ईश’, मूर्त सादाख्य का ‘ब्रह्मा’, कर्तृ-सादाख्य का ‘ईश्‍वर’ और कर्म सादाख्य का ‘ईशान’ (वा.शु.तं. 1/33-34; सू.आ. क्रियापद 1/24-26)।

Darshana : वीरशैव दर्शन

सादाख्य

क. शिव-सादाख्य
परशिव की जो पराशक्‍ति है, उसको ‘शान्तयतीत कला’ भी कहते हैं। उस पराशक्‍ति के दशमांश से शिवसादाख्य का प्रादुर्भाव होता है। पराशक्‍ति से उत्पन्‍न होने के कारण यह शुद्‍ध है। आकाश में स्फुरित विद्‍युत् के समान यह सर्वतोमुख और सूक्ष्म-ज्योतिस्वरूप है। यह विद्‍युत् वर्ण का है। सभी तत्वों के आलयभूत सदाशिव को ‘शिव-सादाख्य’ कहा गया है। (वा.शु.तं. 1/44-47; सू.आ.क्रियापाद 1/33)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सादाख्य

ख. अमूर्त सादाख्य
शांति-कला की पर्यायवाचक जो ‘आदिशक्‍ति’ है, उस आदिशक्‍ति के दशमांश से अमूर्त-सादाख्य का प्रादुर्भाव होता है। आदिशक्‍ति अमूर्त होने के कारण उससे उत्पन्‍न यह सादाख्य भी अमूर्त कहलाता है। कोटि सूर्य प्रकाश के समान इसका दिव्य तेज है और इसकी आकृति ज्योति के स्तंभ के समान है। प्रपंच की उत्पत्‍ति और विलय का स्थान होने के कारण इसको ‘मूलस्तंभ’ और ‘दिव्यलिंग’ भी कहा जाता है। इन लक्षणों से युक्‍त ‘ईश’ को ही ‘अमूर्त सादाख्य’ कहा गया है। (वा.शु.तं. 1/48-52; सू.आ.क्रियापाद. 1-34-35)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सादाख्य

ग. मूर्त सादाख्य
इच्छाशक्‍ति के, जो कि ‘विद्‍याकला’ भी कहलाती है, दशमांश से मूर्त-सादाख्य की सृष्‍टि होती है। इच्छाशक्‍ति के मूर्तस्वरूप वाली (सूक्ष्म साकार) होने से उससे उत्पन्‍न यह सादाख्य मूर्त कहलाता है। अग्‍नि की ज्वाला के समान इसकी आकृति होती है। इसके ऊर्ध्व भाग में एक मनोहर वक्‍त्र है, जिसमें तीन नेत्र विराजमान हैं। यह सभी अवयवों से संयुक्‍त है। इसकी चार भुजाएँ हैं। ये चारों हाथ कृष्ण-हरिण, परशु, वरद-मुद्रा और अभय-मुद्राओं से सुशोभित हैं। इस प्रकार सभी सुलक्षमों से संयुक्‍त ‘ब्रह्मा’ को मूर्त सादाख्य कहा जाता है (वा.शु.तं. 1/53-57; सू.आ. क्रियापाद 1/36-37)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सादाख्य

घ. कर्तृ-सादाख्य
प्रतिष्‍ठाकला की पर्यायवाचक जो ज्ञानशक्‍ति है, उसमें दशमांश से ‘कर्तृ-सादाख्य’ की उत्पत्‍ति होती है। ज्ञान शुद्‍धस्वरूप है, अतः उससे उत्पन्‍न यह कर्तृ-सादाख्य भी शुद्‍ध स्फटिक की प्रभा के समान प्रतीत होता है। यह भी साकार है। इसके चार शिर, चार मुख, बारह नेत्र, आठ कान, दो चरण और आठ हाथ हैं। इन आठ हाथों में से दाहिने चार हाथों में क्रमशः त्रिशूल, परशु, खड्‍ग और अभय-मुद्राएँ हैं। उसी प्रकार बाएँ चार हाथों में क्रमशः पाश, नाग, घंटा और वरद-मुद्राएँ हैं। इस प्रकार सभी अवयवों से युक्‍त, सर्व आभूषणों से अलंकृत जो ‘ईश्‍वर’ है, उसी को कर्तृ-सादाख्य कहते हैं (वा.शु.तु. 1/58-64; सू.आ. क्रियापाद 1/38-42)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सादाख्य

ड. कर्म-सादाख्य
क्रियाशक्‍ति के, जो कि निवृत्‍तिकला भी कहलाती है, दशमांश से कर्म-सादाख्य का उदय होता है। क्रिया को ही कर्म कहते हैं, अतः क्रियाशक्‍ति से उत्पन्‍न इस सादाख्य को कर्म-सादाख्य कहा गया है। सृष्‍टि और संहार का निमित्‍त कर्म ही होता है, अतः इन कर्मों के स्वामी को कर्म-सादाख्य कहते हैं। इसका स्वरूप इस प्रकार वर्णित है- इस सादाख्य के पाँच शिर, पाँच मुख हैं। प्रत्येक मुख में तीन-तीन नेत्र विराजमान हैं। इसकी दश भुजाएँ और दो पाद हैं, जो कि दोनों कमलों पर विराजित हैं। इसके दाहिने पाँच हाथों में क्रमशः त्रिशूल, परशु, खड्ग अभय मुद्रा और वज्रायुध हैं। बाएँ पाँच हाथों में क्रमशः नाग, पाश, अङ्कुश, घंटा तथा अग्‍नि हैं। इस सादाख्य के दस हाथों के दस प्रकार के चिह्न उसके दशविध उत्कृष्‍ट गुणों का या शक्‍तियों का द्‍योतन करते हैं, जैसे त्रिशूल से सत्व आदि त्रिगुणों का, परशु से शक्‍ति का, खड्‍ग से प्रताप का, वज्रायुध से दुर्भेद्‍य सामर्थ्य का तथा अभय-मुद्रा से अनुग्रह-शक्‍ति का द्‍योतन होता है। इसी प्रकार वाम भाग के हाथों में रहने वाले नाग से विधि अर्थात् आज्ञा शक्‍ति का, पाश से मायाशक्‍ति का, अङ्कुश से विवरण अर्थात् आवरणरहितत्व का (शिव के अपने स्वरूप का आवरण नहीं रहता है), घंटा से नादशक्‍ति का एवं अग्‍नि से संहार-सामर्थ्य का द्‍योतन होता है। इन दस प्रकार के उत्कृष्‍ट गुणों से युक्‍त तथा दिव्य गंध, दिव्यमाला, दिव्य वस्‍त्रों से अलंकृत जटा-मुकुट धारी, शांतस्वरूप के और मंद मुस्कान वाले ‘ईशान’ को ही कर्म-सादाख्य कहते हैं (वा.शु.तं. 1/65-107; सू.आ. क्रियापद 1/43-51)।
Darshana : वीरशैव दर्शन

सादारण्य तत्त्व

छत्तीस तत्त्वों के क्रम में तीसरा तत्त्व। इस तत्व से पूर्व शिव और शक्ति तत्वों में किसी भी प्रकार के भेद का अंश प्रकट ही नहीं होता है। इसी तीसरे तत्त्व में आकर आगे होने वाली समस्त शुद्ध सृष्टि तथा अशुद्ध सृष्टि की सत्ता का धीमा सा आभास उभरने लगता है। सृष्टि क्रम में इसी तत्व को पहला तत्व माना जाता है। इसी तत्त्व के आगे ‘सत्’ ऐसा कहना (आख्या) संभव है, क्योंकि इससे ऊपर सत् असत् जैसे आपेक्षिक भावों के आभास के लिए कोई अवसर ही नहीं। इसी कारण सदाशिव तत्व को सादारण्य तत्त्व कहा जाता है। (ईश्वर प्रत्यभिज्ञा-विमर्शिनी 2 पृ. 191)। देखिए सदाशिव तत्त्व।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सानन्दा समापत्ति

ग्रहण (इन्द्रिय) रूप विषय में जो समापत्ति होती है, उसका नाम सानन्दासमापत्ति है – ऐसा कई व्याख्याकार कहते हैं। इसके दो अवान्तर भेद होते हैं – शब्दार्थज्ञान के विकल्प से संकीर्ण तथा इस विकल्प से हीन। समापत्ति = संप्रज्ञात समाधि से जात प्रज्ञा।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सामनस्

देखिए समना।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सामरस्य

ऐसी दशा या भाव जिसमें सभी रस, अवस्थाएँ, भाव आदि एक रस होकर लोलीभाव में रहते हैं अर्थात् अभिन्नतया स्पंदित होते रहते हैं और एकरूपतया चमकते रहते हैं। (स्व.तं. उ. खं. 2 पृ. 191)। परस्पर संघट्ट रूपता, परिपूर्ण एकरूपता या एकरसता। (तं. आत्मविलास, खं. 3, पृ. 223)। सामरस्य भाव को मयूराण्ड रस न्याय से समझाया जाता है। मोर के पंखों के सभी रंग उसके अंडे के भीतर रहने वाले रस में हुआ करते हैं। परंतु वहाँ कोई भी रंग पृथक्तया दीखता नहीं। सभी रंग एकरूपतया स्पंदमान होते हुए वहाँ रहते हैं और जब पक्षिशावक के रूप में परिणत हो जाते हैं तो पृथक् पृथक् रूप को लेकर के अभिव्यक्त हो जाते हैं। रस की अवस्था सभी रंगों के सामरस्य की अवस्था है। परमेश्वर समस्त विश्व की ही सामरस्य की अवस्था है।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सामान्यकरणवृत्ति

करणों की वृत्ति = करणवृत्ति। सामान्य जो करणवृत्ति = सामान्यकरणवृत्ति। सामान्य = साधारण। यहाँ करण का तात्पर्य आन्तर करण से है। बुद्धि (महत्तत्त्व), अहंकार तथा मन रूप आन्तर करणों की जो सामान्य (सभी में अनुस्यूत) वृत्ति है, वही ‘प्राणादि’ कहलाती है (सां. का. 29)। (बुद्धि आदि की निजी वृत्तियाँ भी हैं; द्र. सां. का. 23, 24, 27।) प्राणादि अर्थात् प्राण, अपान, समान, उदान तथा व्यान – ये पाँच वायु-रूप हैं। सांख्यसूत्र (2/31) में भी इन प्राणों का उल्लेख है (द्र. प्राण आदि शब्द)।
इन प्राणों की स्थिति (शरीर के विभिन्न अङ्गों में) एवं क्रिया (व्यापार) का विवरण सांख्यकारिका (29) एवं सांख्यसूत्र (2/31) की व्याख्याओं के अतिरिक्त व्यासभाष्य (3/39) में भी मिलता है। योग के अधिकांश ग्रन्थों में इन पाँच प्राणों के अतिरिक्त नाग, कूर्म आदि पाँच उपप्राणों की स्थिति एवं क्रियाओं का विशद विवरण मिलता है।
तीन अन्तःकरणों की इस सामान्य वृत्ति का स्वरूप है जीवन अर्थात् शरीर -विधारण। शरीरान्तर्वती वायु विभिन्न अङ्गों में अवस्थित होकर स्व-स्व कर्म का जो निष्पादन करती है, वह अन्तःकरणों के प्रयत्न से नियंत्रित होकर ही होता है। यह सामूहिक प्रयत्न ही सामान्य वृत्ति है। अन्तःकरणों की कोई सामान्यवृत्ति हो सकती है – यह मत कई वेदान्तियों की दृष्टि में असंगत है।
प्राण, अपान आदि वायु-विशेष-रूप ही हैं; यह वायु सामान्य-करणवृत्ति नहीं है; अन्तःकरणों का सामूहिक प्रयत्न ही व्यापार या वृत्ति है – यह कई टीकाकारों ने स्पष्टतया कहा है। अन्तःकरणों की जो वृत्ति है वह आभ्यन्तरी ही है; यही जीवन अर्थात् शरीरधारण-प्रयत्न है। यह प्रयत्न ही शरीर वायु का नियामक है – यह तत्त्ववैशारदी में वाचस्पति ने स्पष्टतया कहा है।
प्राण को बाह्यन्द्रियों की सामान्यवृत्ति के रूप में भी किन्हीं आचार्यों ने माना है; पर यह मत उचित प्रतीत नहीं होता, क्योंकि सुषुप्ति में रूपग्रहण-रूप चक्षुव्यापार नहीं रहता पर श्वास-प्रश्वास रूप प्राणनक्रिया चलती रहती है। कुछ व्याख्याकार पंचप्राण को वायुरूप नहीं समझते हैं; वायु की तरह संचरण करने के कारण ये प्राणादि ‘वायु’ कहे जाते हैं – यह उनका मत है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सामान्यतोदृष्ट

अनुमान के तीन भेदों में से यह एक है (अन्य दो भेद हैं – पूर्ववत् और शेषवत्)। भविष्यत् और अतीत वस्तु की सिद्धि के लिए जिस प्रकार पूर्ववत् और शेषवत् अनुमान है, उसी प्रकार सामान्यतोदृष्ट अनुमान भी वर्तमानकालिक वस्तु को सिद्ध करने के लिए है। देशान्तर (=स्थानांतर)-प्राप्ति के साथ गति का नियत सम्बन्ध है, सूर्य (जिसकी गति दृष्ट नहीं होती) चूंकि आकाशस्थ विभिन्न देशों में दृष्ट होता है, अतः सूर्य की गति है – यह सामान्यतोदृष्ट का उदाहरण है।
वाचस्पति कहते हैं कि सामान्यतोदृष्ट पूर्ववत् की तरह अन्वय पर आधारित होता है। (उसमें अन्वयव्याप्ति की प्रधानता रहती है), पर यह ‘अदृष्ट-स्वलक्षण-सामान्य’ है अर्थात् साध्य के समानजातीय दृष्टान्त का प्रत्यक्ष इसमें नहीं होता। उदाहरण – रूपादिज्ञान का अवश्य ही कोई करण होगा, क्योंकि वह क्रिया है; जिस प्रकार छेदन क्रिया का करण होता है उसी प्रकार रूपादिज्ञान रूप क्रिया का भी करण होगा। पर यह करण अभौतिक इन्द्रिय-जातीय है, (जो प्रत्यक्ष योग्य नहीं है), छेदन क्रिया के करण कुल्हाड़े की तरह बाह्य भौतिक द्रव्य नहीं है। यहाँ इन्द्रियजातीय किसी वस्तु के साथ व्याप्ति का ग्रहण नहीं हुआ है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

सामान्यस्पंद

प्रतिष्ठित स्पंद। अंतः एवं मूलभूत स्पंद (देखिए)। परमशिव। परस्पंद। मुख्य स्पंद। (स्पन्दविवृति पृ. 70)। सृष्टि, स्थिति आदि पाँचों कृत्य सामान्यस्पंद की ही भिन्न भिन्न अभिव्यक्तियाँ हैं। इस प्रकार संपूर्ण विश्व सामान्यस्पंद का ही विस्तार है। (मा. वि. वा. 1-276, 277)। परमशिव की शिवता को भी सामान्य स्पंद कहा जाता है; (परात्रीशिकाविवरण पृ. 208)। इसे परम उपादेय माना गया है तथा मूलभूत कारण होने के कारण इसे स्वरूप प्रत्यभिज्ञा करवाने वाला भी माना गया है। (स्व. वि. पृ. 63, 64)।
Darshana : काश्मीर शैव दर्शन

सामिकृत कर्म

अधूरा किया कर्म सामिकृत कर्म है। लोक में सुषुप्ति के पूर्व किए जा रहे कर्म के शेष भाग की पूर्ति पुनः जागरण के अनन्तर की जाती है। ऐसे ही शयन के पूर्व का व्यक्ति “सति सम्पद्य न विदुः सति सम्पद्यामहे”, (इस श्रुति वचन के अनुसार) सुषुप्ति दशा में भगवत् स्वरूप में मिल जाता है, और वही पुनः जग कर शेष कार्य को पूर्ण करता है, दूसरा व्यक्ति नहीं। इस प्रसंग से आत्मा की स्थिरता सिद्ध होती है (अ.भा.पृ. 893)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

साम्यावस्था

पंचभूत से शुरू कर बुद्धितत्त्व पर्यन्त व्यक्त पदार्थों में सत्त्व-रजः-तमः-नामक त्रिगुण विषम अवस्था में (प्रधान-अप्रधान-भाव में, अर्थात् कोई एक गुण प्रधान एवं अन्य दो गुण अप्रधान – इस रूप में) रहते हैं – यह देखा जाता है। इन व्यक्त पदार्थों का जो चरम कारण होगा, वह गुणवैषम्य रूप नहीं हो सकता, क्योंकि गुणवैषम्य होने और व्यक्त पदार्थ का आविर्भाव होना अविनाभावी है। यही कारण है कि व्यक्त पदार्थों के मूल उपादान कारण को त्रिगुणसाम्यावस्था के रूप में माना गया है।
कई व्याख्याकारों ने यह भी कहा है कि इस साम्यावस्था में धर्म-धर्मी-भाव नहीं रहता। जिस प्रकार व्यक्त सत्त्वगुण का धर्म प्रकाश है, ऐसा कहा जाता है, उसी प्रकार अव्यक्तभूत (अर्थात् साम्यावस्था में स्थित) सत्त्वगुण का धर्म प्रकाश है – यह नहीं कहा जा सकता; इस अवस्था में प्रकाश ही सत्त्व है। इस दृष्टि के अनुसार साम्यावस्था में प्रकाश (सत्त्व), क्रिया (रजः) और स्थिति (तमः) ही रहते हैं – प्रकाश-क्रिया-स्थिति-धर्मक कोई वस्तु नहीं रहती है। साम्यावस्था में स्थित त्रिगुण देशकालातीत है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

साम्योपायन

ब्रह्म के साथ साम्य की प्राप्ति साम्योपायन है। अर्थात् ब्रह्म के साथ संबंध होने पर पूर्व में तिरोहित जीव के आनंदांश तथा ऐश्वर्य आदि पुनः ब्रह्म के समान ही आविर्भूत हो जाते हैं। इस स्थिति को साम्योपायन शब्द से अभिहित किया गया है (अ.भा.पृ. 1055)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सायुज्य

मर्यादा भक्ति मार्ग में भगवान् के साथ एकत्व प्राप्त कर लेना या भगवान् में प्रवेश सायुज्य मुक्ति है। इसे सार्ष्टि मुक्ति शब्द से भी प्रतिपादित किया जाता है। किन्तु पुष्टि भक्ति मार्ग में अलौकिक सामर्थ्य प्राप्त कर जाना सायुज्य है (प्र.र.पृ. 135)।
Darshana : वल्लभ वेदांत दर्शन

सार्वकामिक

ईश्‍वर का नामांतर।

पाशुपत दर्शन के अनुसार ईश्‍वर समस्त कार्य को अपनी स्वतंत्र इच्छाशक्‍ति से ही उत्पन्‍न करता है। किसी बहीः कारण पर निर्भर नहीं करता है। समस्त जगत की उत्पत्‍ति अपनी इच्छानुसार करता है। जैसे चाहता है वैसे करता है अतः सार्वकामिक कहलाता है। उसे जीवों के अनादि कर्म पर उनकी अनादि अविद्‍या या अनादि वासना पर निर्भर नहीं रहना पड़ता है। वह स्वतंत्र है। अतः जैसे वे चाहता है वैसे ही सब कुछ घटता है। इसीलिए उसे सार्वकामिक कहते हैं। (पा.सू.कौ.भा.पृ.60)।

Darshana : पाशुपत शैव दर्शन

सालम्बन चित्त

जिस चित्त का कोई आलम्बन रहता है, वह सालम्बन चित्त कहलाता है। योगाभ्यास के लिए इच्छापूर्वक जिस विषय पर चित्त को स्थिर किया जाता है, वह आलम्बन है। सालम्बन चित्त में जो भी समाधि होगी, वह सबीज ही होगी – यह ज्ञातव्य है। कोई भी सालम्बन अभ्यास निर्बीज समाधि का साधन नहीं हो सकता, यह व्यासभाष्य (1/18) में कहा गया है।
Darshana : सांख्य-योग दर्शन

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